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कृपया पटाखों को धर्म से न जोड़ें, पटाखे फोड़ना मेरा धर्म नहीं है!

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इतन आहात सुप्रीम कोर्ट के पटाखे पर बैन लगाने जैसे आदेश ने नहीं किया, जितना आहात मुझे चंद अधेड़ उम्र के लोगों ने बचकाने बयान देकर किया है। कोई कैसे अपने अन्दर एक बड़ी शख्सियत को ओढ़ कर इतने ओछे बयान दे सकता है, सच मुच आश्चर्य होता है। इन बयानों को देख कर, पढ़ कर, सुन कर मैं अपने प्राइमरी स्कूल में चला गया था जहाँ हमारी गलती होने पर बजाय गलती स्वीकार करने के दलील दी जाती थी कि उसने भी तो कल किया था।

मगर क्या इस तरह के आरोप प्रत्यारोप से कुछ होगा? इसका एक सबसे अहम कारण यह भी है कि हमने अपनी अक्ल से भी ऊपर का माला अपने अहंकार और अपनी सिमित सोच को दे रखा है। जो अक्ल तक बात आने ही नहीं देती और खुद ऐसे बेतुके बयान दे कर मामला सुलझाने की नाकाम कोशिश करता है।

जो लोग इसे धर्म से जोड़ रहे हैं उन धार्मिक लोगों को बता दूँ पटाखे फोड़ना मेरा धर्म नहीं है। मेरा धर्म उत्सव मनाना है, खुशियाँ बाँटना और खुशियाँ मनाना है। हाँ पटाखें खुशियों के प्रतिक हो सकते हैं, मगर मेरी खुशियाँ चंद बारूद की मौहताज़ नहीं हो सकती। बारूद जलाने के आलावा भी कई तरीके हैं मेरे पास खुशियाँ मानाने के मेरी दीवाली तो बन जाएगी। हाँ जिनके पास नहीं है उनकी तिनख मिज़ाजी समझ सकता हूँ।

जिस सालों पुराने धर्म पर इतराते हैं, जिस संकृति पर गर्वित होते हैं। उसे बचाया इस देश की प्रकृति ने, इस देश की मिट्टी ने और यहाँ की हवाओं ने है। आज जब बात इनके बचाव की आई तो हमने पल भर में इन्हें पराया कर दिया। एक विशाल महल के निर्माण के लिए ज़मीन की आवश्यकता होती है। देश के तामम बुद्धि जीवियों को यह बात समझनी होगी, एक धर्म का अस्तित्व तभी रह सकता है जब उसकी धरती जीवित हो उसके मानने वाले लोग जीवित हो। न जाने कब हम हमारे जीवन में व्यावहारिक सोच को आने देंगे?

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