क्या धर्म प्रेम और शांति का मार्ग है

Posted by Shesh Nath Vernwal
October 7, 2017

Self-Published

आखिर हमें धर्म की क्या आवश्यकता है?लोग लगातार कह रहे हैं कि हम उनके धर्म पर बात नहीं करें। इससे उनकी भावनायें आहत होती है। किसी को क्या अधिकार है कि किसी व्यक्ति के धर्म पर छिटा-कसी करे? महोदय! हमें  आपके धर्म से कोई आपत्ति नहीं होती, यदि वह आपका व्यक्तिगत मामला होता। हमें आपके धर्म से तब भी कोई आपत्ति नहीं होती, यदि आपके धर्म से दुनिया और समाज में कोई फर्क नहीं पड़ता। पर वास्तव में ऐसा नहीं है।

जब जाति पर बात करो तो पता चलता है कि इसकी उत्पति कि जड़ में आपके पवित्र ग्रंथ हैं। महिलाओं की स्थिति, आडम्बर, अंधविश्वास, हवन, छुआछुत, धार्मिक भ्रस्ताचार, ठगी, लोगों को मानसिक रूप से पंगु बना के रखना, दंगे आदि सभी बातों की जड़ में आपके यही ग्रंथ हैं। मैं नहीं चाहता कि आपके धर्म की आलोचना करूँ, बेवजह आपकी भावना को ठेस पहुंचाऊँ। पर आपके धर्म और पवित्र किताबों ने कोई रास्ता नहीं छोड़ा।

इसमें आपकी भी कोई गलती नहीं है, बल्कि यह पीढ़ी डर पीढ़ी चलता आ रहा है और दिन-ब दिन इसका रूप और भी विकृत होता जा रहा है।  धार्मिक पहचान और धार्मिक चिन्हों के लिए लोग एक दुसरे को मार-काट रहे हैं। शिक्षित-अशिक्षित की बात नहीं है, पढ़े-लिखे, समझदार, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर, अधिकारी, मंत्री, जज आदि सब इसकी चपेट में हैं।

सरकार भी इससे कोई अछूता नहीं है। दरअसल सरकार में बैठे लोग जानबूझकर मार-काट को बढ़ावा दे रहे हैं। कई बार तो वही अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए दंगे कि स्थिति भी पैदा कर रहे हैं। कभी गाय मुद्दा होता है, कभी तलाक, कभी भागवत गीता मुद्दा होता है, तो कभी मंदिर-मस्जिद-चर्च की जमीन पर कब्ज़ा, कभी बाबरी-मस्जिद, तो कभी राम जन्म-भूमि।

..तो भले मानस, आपका धर्म जितना भोला दिखता है, उतना वह है नहीं। उसकी शांति की बातों में जहर समाया हुआ है क्योंकि जिस पवित्र किताब में वह शांति की बात करता है, उसी किताब में वह युद्ध की बात भी करता है।

इतिहास गवाह है धर्म नामक वायरस ने जितना लोगों की ज़िन्दगी को जितना खतरे में डाला है, उतना तो परमाणु बम भी नहीं। बम एक बार गिरा, फिर सन्नाटा।धर्म का शूल तो रोज चुभता है और उससे मानवता का खून रिसता रहता है।

आप भी उस धर्म विशेष के हिमायती इसलिए बन रहे होते हैं कि गलती से एकबार आप उस धर्म में पैदा हो गए। यदि आप दुसरे धर्म में पैदा हुए होते तो आप उस धर्म विशेष के लिए मरने-मारने कि बात कर रहे होते और उसी धर्म कि पवित्र किताबों को सीने से लगाये रखते।

वैसे आपका कोई दोष नहीं है, बल्कि आप भी इस दुष्चक्र में फंस गए हैं या समाज ने आपको इसमे फंसा दिया है। जो धर्म चुनने कि स्वतंत्रता आपको अपनी समझदारी और विवेक से नहीं देती, बल्कि जन्म के साथ ही ठप्पा लगा देती है।

आपकी बस एक ही गलती है, और वह यह कि आप इस दुष्चक्र को समझना नहीं चाहते, और न ही इससे निकलना चाहते हैं। आप इससे निकलेंगे, तो कई और भी निकलेंगे। इससे निकलने के लिए सबसे जरुरी चीज है, इस दुष्चक्र की पड़ताल करना और कारण को जानना। इसकी पहली शर्त है अपने आँख से धर्म का चश्मा हटाना और दिमाग पर से पूर्वाग्रह और धर्म नामक ब्रांड के प्रति मोह को त्यागना।

आप इसलिए उस धर्म पर जान दे रहे हैं कि उस धर्म में आप पैदा हो गए और उसकी पवित्र बातों में इसलिए विश्वास करने लगे कि वह आपके ठप्पे से जुड़ा है। ऐसी स्थिति घातक है। न केवल आपके लिए, बल्कि सम्पूर्ण समाज और मानवता के लिए।

पर जब आप अपना स्वतः ज्ञान, तर्क और विवेक अपनाएंगे, तो पाएंगे कि धार्मिक पहचान और चिन्ह तो कृत्रिम है। आप बेकार में इसे प्राकृतिक मान बैठे थे। जब आप ऐसा करेंगे, तब आपको ज्ञात होगा कि धर्म जिसे आप शांति और कल्याण का मार्ग समझ रहे हैं, दरअसल वही अशांति और मानव त्रासदी कि प्रमुख जड़ों में से एक है।

तब आप ही बतायें, हम कैसे आपके धर्म को बक्श दें, और पवित्र किताबों की आलोचना बंद कर दें? आपकी भावना का ख्याल हमें ज़रूर है, पर उससे ज्यादा ख्याल हमें मानवता का है, पुरी दुनिया-समाज की है। और जो भी हमारे देश, समाज, दुनिया और मानवता के लिए खतरा है, उसपर बात करते एक आपकी कोमल भावनायें आहत हो जाये, तो कृपया हमें माफ़ कर दीजियेगा, पर सोचियेगा जरुर हमारे बारे में भी। हमारी मज़बूरी के बारे में, अपने धर्म से ऊपर उठकर। क्या पता आपकी भावनायें, आहत होना बंद हो जाएँगी और धर्म-जनित बुराईयों के खात्मे के लिए हमें एक नया साथी मिल जायेगा।

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