महिला आरक्षण बिल की संसद में ‘9 दिन में चले अढाई कोस’ की स्थिति ही है

12 सितंबर 1996 में पहली बार एचडी देवगौड़ा सरकार ने संसद में 33% महिला आरक्षण का मसौदा रखा था। इसे बीते 12 सितंबर 2017 को 21 वर्ष पूरे हो गए और हम इसे केवल राज्यसभा से ही पास करा पाए हैं, यानी आधी लड़ाई अभी बाकी है।

हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण बिल को पास कराने के लिए नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा। इसके पीछे उन्होंने पूर्ण बहुमत होने का तर्क दिया लेकिन ऐसा ही बहुमत 2014 से पहले सोनिया गांधी के पास भी था पर तब उन्होंने यह बिल पास नहीं कराया। बहरहाल यह किसी एक पार्टी का मसला नहीं है इसके लिए सभी बराबर की ज़िम्मेदार हैं। खुद बीजेपी ने 2014 के चुनावी वादों में महिलाओ को आरक्षण दिलाने की बात कही थी, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इस वादे को भी अपने और वादों की तरह भूल गए।

महिला आरक्षण की ज़रूरत 1975 में टुवर्ड्स इक्वॉलिटी नामक रिपोर्ट के आने के बाद महसूस हुई, इस रिपोर्ट में महिलाओं की हालत का जिक्र करते हुये उनके सशक्तीकरण के लिये आरक्षण की बात कही गयी थी। इसके बाद 1993 में ग्राम पंचायत एवं स्थानीय निकाय चुनावों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करा दिया गया।

12 सितंबर 1996 में जब देवगौड़ा सरकार ने महिला आरक्षण बिल पेश किया था तो इसका सबसे ज़्यादा विरोध लालू प्रसाद यादव व मुलायम सिंह यादव ने किया। इसके पीछे उन्होंने इसके OBC महिलाओं के हक के खिलाफ होने का तर्क दिया और यह पास नहीं हो सका, वैसे उनका तर्क आज भी समझ से परे है।

फिर वर्ष 1997 में एक और बार इसे सदन में पेश किया गया, इस बार शरद यादव ने इस पर महिलाओं को बांटने वाला विवादित बयान दे दिया। उनका कहना था कि “यह परकटी महिलाएं हमारी महिलाओं के बारे में क्या समझेंगी” उनका यह तर्क भी बस कुतर्क ही था।

जब 1998 में अटल जी की सरकार ने इसे पास कराना चाहा तो आरजेडी नेता सुरेंद्र यादव इतना गुस्सा हो गए कि उन्होंने महिला आरक्षण के मसौदे को ही फाड़कर फेंक दिया। इसके बाद 1999 और 2003 में एनडीए सरकार ने दोबारा कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हो सके।

लंबे संघर्ष के बाद इसे 2008 में कांग्रेस ने एक बार फिर पेश किया और बहुत संघर्ष के बाद 9 मार्च 2010 को सोनिया गांधी के आदेश के बाद राज्यसभा में तो महिला आरक्षण का बिल पास करा लिया गया, लेकिन जब लोकसभा में इसे भेजा गया तो बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे जैसे बड़े नेताओं ने इसका खुलकर विरोध किया, जिसके बाद यह केवल राज्यसभा से ही पास हो सका।

आज इस घटना को कुल मिलाकर 21 वर्ष हो गए हैं और यह बिल अभी भी राजनीति की मार झेल रहा है। आज देश में महिलाओं की संख्या 60 करोड़ से ज़्यादा है और भारतीय संसद की लोकसभा में 543 में केवल 66 महिला प्रतिनिधि हैं, यानी लगभग 12% महिलाएं लोकसभा और 10% राज्यसभा में हैं। ज़ाहिर है कि संसद में इनके संख्या, इनकी आबादी की तुलना में बहुत कम है।

महिलाओं द्वारा लड़ी जा रही यह लड़ाई आज 21 वर्षों में केवल राज्यसभा में ही जीत हासिल कर पाई है और जिस गति से यह चल रही है उसका औसत तो यही कहता है कि अगले 21 वर्ष शायद और लग जाएं इसे पूरी तरह से जीतने में।

जब तक विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की पितृसत्तात्मक सोच वाले लोग यह नहीं समझते कि महिलाएं आरक्षण के ज़रिए उनसे कुछ छीन नहीं रही हैं, बल्कि वह तो बस साथ चलने (बराबर चलने) की मांग कर रही हैं, तब तक ये लोग ऐसे ही कुतर्कों से उनकी राह में मुश्किलें पैदा करते रहेंगे।

फोटो आभार: getty images

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