क्या हम सब का साथ सब का विकास से खुद को बहलाए जा रहे हैं?

Posted by Himanshu Chhabra
October 21, 2017

Self-Published

कंधे पर झोला लिए और झोले में परिवार की ज़िम्मेदारियां लिए खड़ा, यह है 8 वर्ष का जादुर । उम्र इसके लिए महज एक नंबर के अलावा कुछ भी नहीं है, क्योंकि 3-4 साल पहले हुई बाप की मौत ने इसके नरम हाथों, कंधो और पाँवो को सख्त बना दिया और इनपर बोझ थमा दिया। चाहे बाप की मौत ने इसके हाथों से खिलौने छीन लिए, कंधो से किताबों भरा बस्ता छीन लिया, खेलने-कूदने की आज़ादी छीन ली लेकिन वो मासूमियत आज भी कायम है मानो अभी अभी इन नन्ही आँखों ने सपने देखना शुरु किया हो । शायद इसी मासूमियत ने ही मुझे जादुर से बातचीत करने के लिए मजबूर किया । बातचीत से पता चला कि इसके घर में 2 बहनें और बीमार माँ है । चलते चलते मैंने सवाल किया कि तुम यह कचरा क्यों उठाते हो ? तो जवाब आया कि माँ कहती हैं कि घर में पैसा नहीं है तो खाना कहां से खायेगें ? पूछने पर यह भी बताया कि दिन में 2 वक़्त का ही खाना खा पाते हैं। उसकी दबी आवाज़ दर्द बयां करने के लिए काफी थी । जादुर से हुई मुलाकात ने एक नया अनुभव दिया।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि हाल ही में वैश्विक भुखमरी सूचकांक (Global hunger index) में भारत को 119 देशों में से 100वां स्थान मिला है । हो सकता कि आपको यह जानकर शर्म महसूस हो कि इस मामले में इराक, उत्तर कोरिया, बांग्लादेश आदि देश भारत से ऊपर हैं । International food policy research institute के मुताबिक भारत में कुल धनराशि में से आधे में से ज़्यादा धन सिर्फ 1% आबादी के पास है। यानि की अमीर और अमीर हुए जा रहा, गरीब और गरीब हुए जा रहा । आज़ादी के 70 साल बाद भी, रोज़ 3000 बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं । लाखों टन सरकारी अनाज गोदामों में पड़ा पड़ा सड़ जाता है। और हम हैं कि सब का साथ सब का विकास के झुनझुने से खुद को बहलाए जा रहे हैं।

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