गांवों के अंतिम छोर पर बसे वो लोग कौन हैं?

Posted by अमित अनंत
October 17, 2017

Self-Published

 
गांव का सारा पानी, गंदगी जहां बहकर इकट्ठा होता है, वहीं कुछ घर हैं। ये घर जो मिट्टी और घांस-फूस के दम पर बने थे आज अंतिम सांसें ले रहे हैं। इन घरों में रहने वाले लोग इतने काबिल नहीं हैं कि ईंट-सीमेंट से बने छत की कल्पना कर लें। और हां! सरकारें भले हीं कागजों पर इनके लिए आवास की व्यवस्था कर दी हो पर हक़ीक़त में वो गांव के ठेकेदारों के किसी रिश्तेदार या संबंधियों के बने होंगे। इन घरों में रहने वाले लोग हर रोज़ शहर की ओर शाम की दाल-रोटी की तलाश में निकलते हैं। हर शहर में कोई “लेबर चौराहा” ज़रूर होगा ये इन्हीं लोगों के नाम पर बने हैं जहां इनकी भीड़ देखी जा सकती है। शाम तक जब रात की ज़रूरत भर की भी आमदनी नहीं मिलती तो तो घर जाकर वो बदहाल स्थिति देख सकें इसलिए वो जी भर सस्ती वाली शराब पीते होंगे। और हम रसूखदार लोग इनके इसी काम पर गालियां देते हैं। हम हीं है वो लोग! जो इनकी कमरतोड़ मेहनत के हिस्से को ख़ुद पचाना चाहते हैं। इनके हिस्से के नाम पर हम कुतर्क पेश करते हैं।
इलाहाबाद के एक बड़े ख़ूबसूरत उद्यान के कुछ दैनिक मज़दूरों से बात हुई, इस बातचीत में पता चला कि किस तरह वहां उनका शोषण किया जा रहा है। उनकी मज़बूरी का फायदा उठा कर उद्यान प्रभारी उनकी मज़दूरी के दो हिस्से करता है। छोटी छोटी ग़लतियों पर पूरे माह का वेतन काट लिया जाता है। उनको संगठित नहीं होने दिया जाता है। मीडियाबाजी होने पर उनको इस काम से भी हाथ धोना पड़ता है। ये अपवाद नहीं हैं ये आम है।
हम “सब पढ़ें सब बढ़े” का स्वांग रचे हैं, हम सभी के लिए शौचालय के नाम पर गर्व करते हैं। प्राथमिक शिक्षा से जुड़ने का मेरा अपना अनुभव रहा है। इन बच्चों को बस बेवकूफ बनाया जा रहा है। शौचालयों के नाम पर दीवारें खड़ी हैं। आप मानव संसाधन विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर जाएं इनके विषय में रिपोर्ट तलाशें! 2013-14 के बाद कि कोई सरकारी रिपोर्ट नहीं मिलती। शिवाय रंगीन आकर्षक वेबसाइट । अपवाद छोड़ दें तो ज़मीन पर आकर देख़ लें हक़ीक़त क्या है।
इनके घर के बच्चे मज़दूर ही पैदा होते हैं। आजतक इनको जो भी मिला है वो बस इनके वोट की क़ीमत होगी। इनके इंसान होने की क़ीमत इनको कौन देगा? कब तक हम इनको भीख खिलाते रहेगें?
सामाजिक-आर्थिक स्थिति की बात क्या करें? आज़ादी के 75 साल बाद इनके मंदिर में प्रवेश के मिले अधिकार पर जश्न मनाते हैं। इनकी अपनी अपनी ईद होती है, अपनी दिवाली और और अपनी होली। इनके अपने मेले होते हैं जहां हम जाना पसंद नहीं करते। आज भी इनकी ज़िंदगी दैनिक है, कोई दूरगामी उद्देश्य नहीं। इनके ज़िन्दगी में किसी गांधी किसी नेहरू और किसी मार्क्स का कोई मतलब नहीं, हर विचारधारा इनकी दुश्मन है।

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