गुरु : क्या ? क्यों ?

Posted by Vaishali Pandey
October 4, 2017

Self-Published

गुरु तुम्हारा व्यक्तित्व है इतना सरल,
शुभ्र धवल विश्वास तुम्हारा हमें बनाये और प्रबल।
शिक्षा के विस्तार से जब तुम हमको पोषित करते हो,
तीव्र वेग से उड़ने को तुम हमको प्रेरित करते हो।
अहं की माया मेघ घना बन जब हम पर गहराती है,
विनय ज्ञान की तरु छाया तब अंचल को फैलाती है।
दण्ड की पगडण्डी पर चलकर ही हमने उड़ना सीखा,
बिना चाक(chalk) ये जीवन बन जाता नीरस फीका,
इस छाया से बाहर जाकर हम “स्व” को खोजा करते हैं,
“हम” के बीज पाकर हम “स्व” की अपेक्षा करते हैं।
हमें स्वर्ण बनाने में तुम तो तपते हो नित नव पर,
कुंदन तो हम बन जाते हैं तुम्हें पिलाकर गरल तरल।
मिली कभी ईश्वर से तो पूछूंगी उससे प्रश्न सरल,
गुरु तुम्हारा व्यक्तित्व क्यों उसने बनाया इतना सरल,
कि शुभ्र धवल विश्वास तुम्हारा हमें बनाये और प्रबल,
और प्रबल ।।

 

 

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