सामुदायिक रेडियो से हो रहा है समुदायों का सशक्तिकरण

Posted by sonia Chopra
October 12, 2017

Self-Published

सामुदाइक रेडियो की अवधारणा आकाशवाणी की रेडियो सेवा को ध्यान में रखकर की गई थी। आकाशवाणी सरकारी तंत्र की सहायता से सूचनाओं का अदान-प्रदान करने के साथ-साथ गीत-संगीत, साक्षात्कार तथा परिचर्चाओं के जरिए जनता से रूबरू होता था। एक लम्बे समय तक यही एकमात्र सूचना, संगीत और मनोरंजन का साधन था।

आकाशवाणी और दूरदर्शन के ज़रिए दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की आवाज़ तो पहुंच जाती थी, लेकिन समुदाय की आवाज़ हमेशा दबकर रह जाती थी। समुदाय को विकास योजनाओं से जोड़ने तथा योजनाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने और उनकी प्रमुख आवश्यकताओं के बारे में शासन-प्रशासन अनभिज्ञ रहता था।

समय के साथ-साथ ग्रामीण समुदायों के जोड़ने की पहल हुई और पंचायतों को सशक्त बनाने के लिए अधिक अधिकार दिए गए ताकि पंचायतों के ज़रिए सरकारी योजनाओं का लाभ हर अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। एक हद तक ऐसा हुआ भी है, लेकिन आज भी जानकारी एवं साक्षरता के अभाव में कई तबके ऐसे हैं, जो पीछे छूट गए हैं। समाज के हर अंतिम व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने और उन्हें जागरूक तथा शिक्षित बनाने के उद्देश्योंं ने ही सामुदाइक रेडियो की परिकल्पना को साकार किया है।

सामुदाइक रेडियो विशुद्ध रूप से समाज सेवा के मकसद से चलाए जा रहे हैं। यह शैक्षणिक संस्थानों तथा गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों के उत्थान के उद्देश्यों के लिए चलाए जा रहे हैं। इनका सबसे बड़ा प्रभाव यह हुआ है कि यह वंचित समुदायों की सशक्त आवाज़ बनकर क्षेत्रीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अखबारों, इलैक्ट्रॉनिक चैनलों और कमर्शियल गीत-संगीत एफ.एम. चैनलों की भरमार के बीच लोकप्रिय होते सामुदाइक रेडियो यह साबित करते हैं कि यह, वंचित समुदायों और शासन-प्रशासन तथा सरकार के बीच संवाद का सशक्त माध्यम बनकर उभरे हैं।

सामुदाइक रेडियो एक ओर जहां लोगों को जागरुक करने का काम कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम लोगों की आवाज़ बनकर उनकी समस्याओं को शासन-प्रशासन तथा सरकार तक पहुंचाने में मदद कर रहे हैं। यह समुदायों को आपस में जोड़ने तथा सामुदाइक भावना से सामूहिक निर्णय लेने के लिए समुदायों को प्रेरित कर रहे हैं। सामुदाइक रेडियो के माध्यम से लोग अपने आसपास घट रही घटनाओं का बारे में जागरूक भी हो रहे हैं।

सहगल फाउंडेशन की संचार निदेशक पूजा ओ. मुरादा का कहना है कि अक्सर देखा गया है कि पारंपरिक मीडिया मसलन टी.वी. और अखबारों में ग्रामीण खबरों, समस्याओं और मुद्दों का अभाव रहता है। ऐसे में हम सामुदाइक रेडियो “अल्फाज़-ए-मेवात” के ज़रिए ग्रामीण भारत को शहरी भारत से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि कम्यूनिटी रेडियो के माध्यम से हम मीडिया को ज़्यादा लोकतांत्रिक और विकेन्द्रीकृत करने का प्रयास कर रहे हैं। रेडियो पर क्षेत्र की समस्याएं ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों को अपनी कविताएं-गीत, पारंपरिक ज्ञान और खासकर लोकगीत गाने और प्रस्तुत करने का मंच भी प्रदान कर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां आज भी मनोरंजन के नाम पर ना तो टीवी है और ना ही अखबार, वहां यह जागरूकता के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान और मनोरंजन का साधन बनकर लोगों के जीवन में बदलाव का द्योतक बन गया है।

नूंह जिले के गांवों में डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी 10 प्रतिशत से कम घरों में टेलीविजन हैं, ऐसे में जो महिलाऐं पढ़ना-लिखना नहीं जानती रेडियो सुनकर सारी जानकारियां पाती हैं। पिछले 5 सालों से रेडियो अल्फाज़- ए- मेवात ना केवल समुदाय की महिलाओं से जुड़ा है बल्कि समाज के हर वर्ग मसलन- बच्चों, किशोरों ,किसानों, वृद्धों को विभिन्न रेडियो कार्यकमों के ज़रिए सूचना और जानकारी देकर आत्मनिर्भर बनने में सहयोग कर रहा है ताकि वे सही निर्णय लेकर समाज में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें।

रेडियो ने सफलतापूर्वक पांच साल का सफर पूरा कर लिया है और इन पांच सालों में इलाके में सामुदायिक रेडियो से आये बदलाव की झलक साफ दिखाई देती है। आज इंटरनेट रेडियो (जिसे वेब रेडियो, नेट रेडियो, स्ट्रीमिंग रेडियो और ई-रेडियो) का नया दौर चल रहा है, यानि ध्वनि तरंगों के माध्यम से रेडियो का कोई भी चैनल दुनिया में कहीं पर भी सुना जा सकता है। डिजिटल इंडिया के सपने को साकार करने के लिए रेडियो का मोबाइल ऐप भी बनाया गया है और उसे स्टोरी टैलर के माध्यम से श्रोता कहीं पर भी सुन सकते हैं।

रेडियो अल्फाज़-ए-मेवात की प्रोग्राम लीडर आरती मनचंदा ग्रोवर बताती हैं, “श्रोता रेडियो पर प्रसारित कार्यक्रमों का संक्षिप्त ​रूपांतरण ऐप के ज़रिए अपने मोबाइल पर कहीं भी और कभी भी सुन सकते हैं। पंचायत की भूमिका, महिलाओं की पंचायतों में भूमिका व टी.बी. की बीमारी का पूरा इलाज करवाने के महत्व पर कार्यक्रमों के अलावा ग्रामीण समुदाय को शिक्षा, चिकित्सा, साफ-सफाई, जल एवं पर्यावरण संरक्षण, आधुनिक खेती, समेत अनेक मुद्दों की सफलता के उदाहरण मोबाइल ऐप पर उपलब्ध कराए गए हैं।”

इस मोबाइल ऐप में बच्चों की शिक्षा, ग्रामीण महिलाओं का सशक्तिकरण जैसे गंभीर मुद्दों को कहानियों के माध्यम से पेश किया गया है, ताकि स्कूली बच्चों से लेकर, किशोरियां और महिलाएं बेहिचक अपनी समस्याओं का निदान पा सकें। डिजिटल इंडिया के दौर में लोग गांव हो या शहर, घर हो या खेत-खलिहान, लोग मोबाइल का प्रयोग फोन करने के साथ-साथ रेडियो सुनने के लिए भी करते हैं। गांवों में यह सरल व सुलभ साधन है और इसके लिए स्मार्टफोन की भी ज़रूरत नहीं है। एफ.एम. तो सभी मोबाइल पर उपलब्ध है।

क्षेत्र की किशोरियों को सशक्त बनाने और उनके सपनों को उड़ान देने के लिए रेडियो अल्फाज़–ए–मेवात, यूनिसेफ और बीबीसी मीडिया एक्शन ने मिलकर नई रेडियो श्रृंखला “फुल ऑन निक्की” की शुरूआत की है। समुदाय को सशक्त और जागरूक बनाने और कार्यक्रमों को जन-उपयोगी बनाने के लिए रेडियो में ऐसे कार्यक्रमों को प्रमुखता दी जाती है जिसमें, विशेषज्ञों और विभागों के उच्च अधिकारी लाइव चर्चाओं के माध्यम से स्वयं लोगों की समस्याओं का निदान करते हैं और यथोचित सलाह देते हैं।

अल्फाज-ए-मेवात के स्टूडियो के मोबाइल नंबर 9813164542 पर कोई भी फ़ोन करके विशेषज्ञों या अधिकारियों से बात करके अपनी समस्याओं का निदान पा सकता है। अल्फाज़-ए-मेवात सामुदाइक रेडियो, एस.एम. सहगल फाउंडेशन द्वारा 2012 में नूंह के गांव घागस में स्थापित किया गया था। अल्फाज़-ए-मेवात, घाघस से 20 किलोमीटर की परिधि में आने वाले 225 गांवों के ग्रामीणों को रोज विभिन्न सूचनापरक और मनोरंजन  कार्यक्रमों का प्रसारण कर जानकारी प्रदान करता है।

पूजा मुरादा, निदेशक रेडियो अल्फाज़-ए-मेवात (अध्यक्ष- कम्युनिटी रेडियो ऐसोसिएशन) बताती हैं कि पांच साल पहले 3 घंटे प्रतिदिन के प्रसारण से शुरू हुआ उनका सामुदायिक रेडियो आज 13 घंटे प्रतिदिन प्रसारण कर रहा है। 2015 में इसे, क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण, पंचायती राज संस्थाओं के सशक्तिकरण और सुशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए मंथन अवार्ड से नवाजा जा चुका है। मंथन अवार्ड के लिए 36 देशों से 412 से अधिक सामुदायिक रेडियो ने भाग लिया था।

उनका कहना है, “समुदाय के सहयोग और लगातार प्रयासों से ही यह संभव हो पाया है। रेडियो के सफल संचालन के लिए एक कोर टीम का गठन किया गया है, जो रेडियो कार्यक्रमों की विविधता, सामग्री का चयन, विशेष दिनों में खास कार्यक्रमों का प्रसारण, कार्यशालाओं एवं लाइव चर्चाओं की रूपरेखा और समुदाय एवं सरकारी विभागों से फीडबैक की रूपरेखा तैयार करती है। उसी के अनुरूप रेडियो की प्रतिदिन की गतिविधियों का संचालन किया जाता है।

यहां की महिलाएं और किशोरियां इतनी सशक्त हुई हैं कि वो अब रेडियो कार्यक्रमों की लाइव चर्चाओं में भाग लेती हैं, अपनी राय प्रकट करती हैं। गांव में कुछ महिला समूह ऐसे भी हैं जो रेडियो कार्यक्रमों को बनाने में भी सहयोग देते हैं। आज इन महिलाओं की सोच में बड़ा बदलाव आना शुरु हुआ है।

पूजा मुरादा का कहना है कि, सामुदाइक रेडियो चलाना बड़ा चुनौतीपूर्ण है। प्रसारण के लिए नित नई एवं विविधतापूर्ण सामग्री जुटाना, फंड की व्यवस्था एवं सामुदाइक रेडियो लिए स्टाफ को बनाये रखना चुनौती भरा काम है। लेकिन हमारे रिपोर्टर और एंकर स्थानीय समुदाय से सम्बंध रखते हैं, इसलिए कार्यक्रमों को बनाने में समुदाय की सलाह और फीडबैक प्राप्त करने में उन्हें आसानी होती है। स्थानीय समुदाय से भी कई लोग परिचर्चाओं में हिस्सा लेते हैं और अपने रिकार्ड किये हुए प्रोग्राम सुनने एवं सुनाने में तथा स्थानीय समुदाय को रेडियो से जोड़ने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सोहराब, शाकिर, फाकत, मुफीद और अनुराधा हमारे रेडियो चैम्पियन हैं और कार्य निष्पादन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

 

 

 

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