महिला स्वास्थ्य और शौच को शर्म से नहीं समस्या से जोड़िए

आज़ादी के बाद भी, आधुनिक और सुपर पावर बनने के रेस में होने के बाद भी भारत में महिलाओं से जुड़े विषयों पर बात करना शर्म का ही विषय है। इस पर बात करना सम्मान का विषय नहीं है। इस तरह के विषय एक नहीं कई हैं जिन पर बात करना ग्रामीण इलाकों में ही नहीं शहरी इलाकों में भी लोगों को शर्मशार कर देता है। इसके चलते महिलाओं को निजी और सार्वजनिक जीवन में कई बीमारियों, यातनाओं और कभी-कभी शारीरिक, मानसिक शोषण से भी गुज़रना पड़ता है। इन विषयों पर बात भी करना “शर्मनाक” हो जाता है।

मसलन, भारत के कई गांव, शहर और महानगरों के घरों की छत पर महिलाएं अपने अंडरगार्मेंट्स चोरी-छुपे कुछ इस तरह सुखाती हैं कि जैसे कोई अपराध कर रही हो। किसी की नज़र ना पड़ जाए, ब्लाउज़ या पेटिकोट के नीचे और कई बार बाथरूम के दरवाजे के पीछे टंगे रहने या सूखने वाली इसी मानसिकता को “शर्म” कहते हैं, जो इस हद तक शर्मनाक हो जाती है कि जाने-अनजाने इससे महिलाओं के स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है।

भारत में महिलाओं की इन समस्याओं को लेकर शर्म तो है लेकिन गंभीरता बिल्कुल नहीं है। जैसा कि स्त्री रोगों के जानकार बताते हैं कि ठीक से धूप में ना सुखाए गए हल्के गीले अंडरगारमेंट्स पहनने से जानानांगों में फंगल इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है जो भारतीय महिलाओं में आम बात मानी जाती है। ऐसी आदतों से महिलाओं को अपने जीवन में कम से कम दो-तीन बार तो इस तरह के इन्फेक्शन होते ही हैं, पर “शर्म” है कि जाती ही नहीं।

कुछ इसी तरह भारतीय समाज ने सावले या काले रंग के कारण शर्म और हीनभावना को विकसित किया, जो लड़कियों और लड़कों दोनों के ही दिमाग में जगह बना चुकी है। लड़कियों को फेयर, सौम्य और सुंदर दिखना है तो लड़कों को हैडसम और कूल दिखना है। आज ग्रामीण और शहरी इलाकों में चेहरे में निखार लाने की क्रीम, फेयरनेस ट्रीटमेंट के नाम पर गर्व के साथ बेची-खरीदी जाती है।

इसी भारतीय समाज का एक सच काली पालीथीन या पेपर में बांधकर, इशारे से कोने में बुलाकर बेचा जाता है। क्योंकि बेचने वालों को और खरीदने वालों को सैनिटरी नैपकिन देना और लेना अजीब लगता है, उन्हें ‘शर्म’ आती है। ये सार्वजनिक शर्म की वो आदत है जो भारत की महिलाओं के मासिकधर्म के विषय पर सीधे तौर पर जुड़े मिथ्यों और बीमारियों को बढ़ावा देती है। इस दिशा में सरकारी योजनाओं के माध्यम से और सैनिटरी नैपकिन के इस्तेमाल के प्रचार भी किये जाते रहे हैं। परंतु, इस विषय पर जागरूकता, झिझक और इच्छाशक्ति की कमी के कारण ये आधी आबादी के चेहरे पर अभी तक मुस्कान नहीं ला पाए हैं। मासिक धर्म की ‘शर्म’ के कारण लड़कियां स्कूल तक छोड़ देती हैं।

“शर्म” के इन्ही विषयों में शामिल है महिलाओं यानि कि आधी आबादी के लिए शौच संबंधी सुविधा पर बात करना, खासकर कि ग्रामीण इलाकों में। यह उस शर्म और झिझक का चित्रण है जिसको महिलाएं सार्वजनिक जीवन में हमेशा झेलती आई हैं। वो कभी इशारे में या धीमी जबान में आकर बात करती है, अगर साथ में कोई महिला है तो साथ चलती है और कोई पुरुष है तो अपनी चलने की गति या तो वो धीमी कर देते हैं या आगे किसी मोड़ पर जाकर रूक जाते हैं।

इसकी एक बड़ी वजह महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालयों की कमी होना है और जो हैं भी वो इस्तेमाल करने लायक नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के आकंड़े बताते हैं कि भारत में मोबाइल फोन ज़्यादा है और महिलाओं के शौचालय कम। कई ग्रामीण स्कूलों में बच्चियों के स्कूल ना जाने का कारण यह है कि वहां शौचालय नहीं हैं। सुलभ इंटरनेशनल के प्रमुख बिंदेश्वरी पाठक बताते हैं, “मुझे एक महिला जिला कलेक्टर ने बताया कि वो दिन भर पेशाब रोकर गांवों का दौरा करती हैं, क्योंकि ऐसी कहीं कोई सही जगह नहीं मिल पाती जहां वो टॉयलेट कर सकें।” ये भारत की एक ऐसी समस्या है जिससे अधिकांश महिलाएं जूझती हैं। महिला रोगों के जानकार बताते हैं कि लगातार पेशाब रोकने से मूत्र की थैली में इंफेक्शन हो सकता है।

भारत सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय निर्माण के प्रयास होते रहे हैं, लेकिन अन्य योजनाओं के तरह ही अनियमितताओं से घिरा होने के कारण ये कुछ खास सफल साबित नहीं हुआ है। हमारे देश भारत में जहां “शर्म” को औरत का गहना और “कष्ट” को औरत की नियती मान लिया जाता है, वहां महिलाओं को इस शर्म से मुक्ति कब मिलेगी, पर इसके लिए ईमानदार कोशिशें लगातार करनी ही पड़ेंगी।

ज़रा सोचिए समान्य दिनों में ये हाल हैं तो प्राकृतिक आपदाओं के समय क्या स्थिति बनती होगी? क्योंकि ये समान्य मानवीय प्रक्रिया प्राकॄतिक आपदाओं में रूक तो सकती नहीं हैं। स्वच्छ भारत अभियान में समाज की इस “शर्म” को “सम्मान” से जोड़ने की कोशिश करने की ज़रूरत सबसे अधिक है। इससे आधी आबादी की एक बड़ी समस्या का समाधान उनके चेहरे पर मुस्कान ला सकता है जिसकी वो हकदार हैं।

स्वच्छ भारत अभियान को तभी सफल माना जाना चाहिए जब वो आस-पास फैली गंदगी के साथ-साथ समाज के लोगों के दिमाग में जमी हुई गंदगी को भी साफ करे।

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