तू न थमेगा कभी .. कर शपथ ….. ये है … अग्निपथ ….

Posted by arpita singh
October 6, 2017

Self-Published

हरिवंश राय  बच्चन की लिखी  हुई ये लाइन सही मायनो में अपने आप को साबित करती है जब हम बात करते है छोटे छोटे शहरो में रहने वाली और अपनी आँखों में बेहतर शिक्षा और सुंदर भविष्य का खवाब लेकर जीने वाली लड़कियों की.. जो कैद है पित्र  और भाई सत्ता के नाम पर घर की चहारदीवारी  के अंदर ……अभी किसी रिश्तेदार की शादी में जाना हुआ .उत्तर प्रदेश का  एक छोटा सा जिला बाँदा .. अपनी आस पास की  बहनों से बात करने पर पता चलता  है. उनके अंदर भरे उस  लावे का… उस पित्र सत्ता के खिलाफ जो न उन उन्हें घर  से बाहर निकने की आज़ादी देता है और न अपने की की खुली हवा में साँस  लेने की  ..सुनकर परेशांन  हो गई .आखिर क्यों है ये सब … अजीब ही रिवाज़ है और अज़ब ही मानसिकता जो एक लड़की के जिंदगी  को अपनी जागीर समझते है . गाँव में रहने वाली अपनी एक बहनों  से बातचीत का कुछ अंश उन्ही के शब्दों में यहाँ लिख रही हूँ  चाहती हूँ  की उनके  मन का लावा कही तो फूटें …. कोई तो सुने उनकी दीवारों के अंदर गूंजती आवाज़ों को …

कभी कभी रोना आता  है या यु कहे एक खीझ सी उठी है मन में समाज के हर उस दोहरे रवैये को लेकर जो लड़के और लड़कियों में भेदभाव करते है और लड़कियों की बराबरी  को लेकर उठाई  गई हर मुहीम का मजाक ये कह कर उड़ाते है की क्या होगा इससे ..कुछ न बदलने वाला इससे . समाज में ऐसा ही होता है और ऐसा ही होता रहेगा … लड़कियों की आगे  की पढाई  यु कह कर ठप  कर दी जाती है की क्या करेगी आगे  पढकर चूल्हा चौका ही तो सम्हालना है .. बाहर  पढने भेजने का रिस्क क्यों ले कुछ उंच नीच हो गई तो कौन करेगा शादी. , ये कौन  समझाए इन बीमार मानसिकता वालों  को की लड़कियों को आगे जितना पढाओगे समाज उठाना ही आगे  बढेगा ,उन्हें घर में कैद कर के रखने से कुछ नहीं हासिल होगा .. लाखों का दहेज़ खर्च कर तुम उससे अपने घर की चहार दिवारी से एक दूसरे घर की चहारदिवारी में वही काम  करने के लिए भेज रहे हो जो वो तुम्हारे यहाँ करती थी वही चूल्हा  और चौका …लाखों के रुपये खर्च करने के बावजूद उसकी जिंदगी में क्या बदलाव आया . क्या इसलिए ही उसका जन्म  हुआ है.. लड़कियों  बोझ किसने बनाया … इन्ही बीमार मानसिकता वाले ने न.. उससे आगे  पढने से  रोक दिया  और दहेज़ का भी ताना उससे की लाखों का खर्च कर के ही विदा होगी… किस  बेटी को अच्छा  लगता है अपने सामने  अपने माता पिता को दहेज़ के लिए इतनी जद्दोज़हत करते  देखकर .. जितना खर्चा समाज में अपना दहेज़ देकर रुतबा  बनाने में उसकी शादी के लिए करते हो उतना उसकी शिक्षा में लगाओ.. उससे उन चार चाहरदीवारी से आजाद तो करो और देखो  इस समाज में कितने मीठी बयार बहती है… इस चहरदीवारी  की दीवारे इतनी सख्त है की गलती से कोई बिटिया इससे लाँघ भी जाये तो उसके दिमाग  में ये दीवारें सख्ती से खडी  होती है,,, कोई बिटियाँ अगर गलती से घर से4 किलोमीटर भी भेजी जाये पढने के लिए तो उसे  इस एहसान के बोझ से  दबा दिता जाता है की जैसे उस पर एहसान  किआ गया हो उसके हिस्से की शिक्षा देकर .. उसे ये सीख बार बार दी जाती है की अपने पुराने दिन मत भूलना.. घर की मन मर्यादा का पूरा ख्याल रखना.. जैसे समाज की हर अच्छी बुरी मर्यादा  को सहेजने औए बचाने का जिम्मा उसके  सर ही हो.. हर  बुरे की जड़ वही हो,,, दुःख होता है न,.. समाज के दोहरे रवैये को लेकर.

इसी दोहरी मानसिकता के लोग  दरअसल अपनी पुरुषवादी कवच से बाहर  निकल केर देखना ही नहीं चाहते .. जानते है उनकी असली ताकत इसी पुरुषवादी खोल को बचाए रखने में ही है.. अगर लड़कियां घर से बहर निकली उतनी  ही बराबरी  की बातें करेगी .. बेहतर है उन्हें  उनके अधिकारों से परिचित ही न होने दिया जाएँ … उन्हें बार बार सझाया जाएँ लड़की हो तो ऐसे ही रहना पड़ेगा.. क्यूंकि  समाज में ऐसा ही होता है और ऐसा ही होता रहेगा.. कौन  समझाए  इन बीमार दिमागों  को की समाज  बनता किनसे  है मुझसे और आपसे ही न .. बीमार आप है… हम नहीं… इक लड़की का रखवाला एक पिता होता है .. फिर एक भाई और फिर पति… लड़की न हो गई एक सोने  के गहनों से लड़ी फदी गठरी हो गई जिसे बारी बारी  से उसकी रखवाली  का ज़िम्मा एक दूसरे को दिया जा रहा है .. और वो भी  अहसान के साथ वो भी लड़किओं के उपर  ही .. एक पिता जिसे लड़की की आगे  की पढाई बंद करवा कर घर बिठा दिया क्यूंकि आगे की  पढाई के लिए पैसा खर्च कौन करे , दहेज़ में जो पैसा लगाना है

एक भाई जिसे अपनी लड़की दोस्तों को घर बुलाकर रोकने से परहेज़ नहीं है पर अपनी बहन के लड़के दोस्तों होने और उनसे मिलने से परहेज़ है…. एक पति जो बाहर तो मॉडर्न होने का दिखावा करता  है और  घर में  एक गिलास पानी खुद से लेने में अपनी शान में गुस्ताखी समझता  है… मानो  खुद अकबर का  पोता हो और उसकी पत्नी अकबर की  दासी …. क्यों नहीं इन बीमार लोगो को समझ आता  की लड़कियों के आगे  पढने में भला  इन्ही बीमार दीमागों का है लड़की आगे पढेगी  .. अपने पैरों में खड़ी होगी … अपनी पसंद का करियर  चुनकर एक बेहतर कल का निर्माण  करेगी .. फिर इन्ही बीमार दीमागो को दहेज़ की जद्दोजहत से मुक्त करने का काम  भी करेगी…. वो घर बाहर हर जगह बीमार दिमाग  मौजूद है… कितना लम्बा सफ़र तय करना है उससे इन खोखली बेड़ियों को  खोलने के लिए… जिन्हें तोड़ने के लिए बस एक झटके की दरकार  है.. फिर हिल जायेगा  वजूद इन बीमार दिमाग   वालो का और ढह जायेगा उनका किला जिसमे वो सुरक्षित महसूस करते थे ….

 

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