धक धक हृदय

Posted by Gopal Arjun Yadav
October 17, 2017

Self-Published

हृदय जिसे दिल भी कहते हैं या यूँ कहें कि इन दिनों केवल दिल ही कहते हैं। गिने चुने लोगों की ज़ुबां से कभी कभार हृदय सुनने को मिल जाता है। चार कमरों वाला एक मकान होता है दिल। दिल की महत्ता को तो सभी भली भांति जानते हैं। दिल ही तो है जो किसी की ज़िंदगी-मौत का फैसला करता है। जब तक बिना थके हारे ये दौड़ता है, मनुष्य को उसकी मनमानी करने की खुली छूट देता है मगर जैसे ही थकावट मालूम होती है तो ये अपने इंजन को धीरे कर देता है और अगर इतना ज्यादा थक जाए कि सर्विसिंग कराने पर भी दोबारा पटरी पर न आ सके तो ये सवार की सुविधा के लिए यमराज को कुछ ले दे के यमलोक में एक 2 बी.एच. के. का फ़्लैट बुक कर देता है और अमरीश पुरी के अंदाज़ में कहता है,”जा सिमरन जी ले अपनी ज़िंदगी।” 
 
अब ज़रा वैज्ञानिकों वाली काम की बातें कर लिया जाये।
इन दिनों दिल के बीमार बड़े बढ़ गए हैं। अरे, अरे, मैं आशिक़ों की बात नहीं कर रहा रहा उसके लिए आपको अगले पैराग्राफ का रुख़ करना होगा। यहाँ तो मैं वास्तिक मरीज़ों की व्यथा ज़ाहिर कर रहा हूँ। एक शोध के अनुसार  विश्व में ज़्यादातर मौतें हृदय संबंधी बीमारियों से होती हैं। ये शोध करने वाले भी अज़ीब मज़ाक करते हैं। अरे भई होगी क्यों नहीं। दिल अगर धुकुर-धुकुर करना बंद कर दे तो इंसान टपक ही जायेगा न। अब बात की जाये अपने देश भारत की तो यहाँ आँकड़ों के मुताबिक तक़रीबन 13 करोड़ लोग (जिनकी उम्र 25 से 60 के बीच में है) दिल की किसी न किसी बीमारी से जूझम-जूझ कर रहे हैं। मुझे आज तक एक बात समझ नही आयी कि ये जो आँकड़े जारी किये जाती हैं, नाजाने की बनिये की दुकान से तौलवा के ले आते हैं कि हमेशा कम ही रहता है जबकि असल मे आँकड़ो कहीं ज्यादा लोग पीड़ित होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन माने की वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन जिसे लोग आमतौर पर WHO के नाम से जानते हैं, हाँ इनका मानना है कि दुनिया में हर दिन 9 हजार लोगों की ज़िंदगी किसी न किसी हृदय से सम्बंध रखने वाली बीमारी के मुँह में चली जाती है। यानी कि हर 10 सेकेंड में यमलोक का एक फ़्लैट बुक हो जाता है। अकेले हमारे देश की राजधानी दिल्ली में 20 लाख लोग इस परिवार(हृदय सम्बन्धित बीमारियाँ) की ज़द में हैं। हार्ट सर्जनों का कारोबार दिन दुनी रात चौगुनी की तर्ज़ पर बढ़ रहा है। हर साल हमारे यहाँ 2 लाख के करीब हार्ट सर्जरी की जाती हैं जो लगातार बढ़ती हुई मानो कोई पहाड़ चढ़ने की कोशिश में है।
 
दिल की बात हो और आशिक़ी का ज़िक्र न हो तो ये बेमानी होगी और आशिक़ों की बात न करके मैं उनके कोप का भागी नहीं बनना चाहता। अब जो बात होगी उसका ऊपर के आँकड़ों से कोई मेल-मिलाप, लेना-देना या तुलना नही हो सकती तो कोई भी फ़िज़ूल की कोशश से  बचें। सिनेमा के विस्तार ने एक नई बीमारी ईजाद की जिसे आम जन ‘लवेरिया’ कहते हैं। शकल-सूरत और कद-काठी से मलेरिया के खानदान की मालूम होती है मगर इससे उलट इसका मलेरिया से दूर दूर तक कोई वास्ता नही है। लवेरिया किसी ख़ास ऐज-ग्रुप को टारगेट नही करता। क्या 12 साल का किशोर,  22 साल का वयस्क, क्या 52 साल का अधेड़ और क्या 82 साल का वृद्ध सबको ये अपनी ज़द में लेकर बखूबी रंगीन रंगों में सराबोर करता है। आज के हालात देखकर  लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब लॉली पॉप खाने वाले बच्चे भी इसके प्रभाव से परिचित होंगे और इसके गवाहीदार होंगे। लवेरिया ग्रसित लोगों में कोई अगर पन्ने पर दिल बनाता है तो लाल रंग की हृष्ट-पुष्ट आकृति बनाकर उसमें ‘कामदेव’ की एक तीर चुभो देता है और खून की दो-चार बूंदे भी टपका देता है। ऐसी आकृति बनाने का चलन कब से है और कहाँ से आया है मैं आज तक नही जान पाया। लावेरिया से पीड़ित लोगों के न तो कोई आँकड़े ही जारी किये गए हैं और न ही मरने वालों की कोई सूची है। तमाम परेशानियों के बावज़ूद ‘लवेरिया’ निरन्तर बढ़ते हुए माउंट एवरेस्ट फ़तह की पुरजोर कोशिश में है।
 
नोट:- यह लेख मनोरंजन की दृष्टि से लिखा गया है फिर भी हृदय संबंधित बीमारियों तथा उनसे होने वाली अनहोनियों के आँकड़े एक प्रतिष्ठित अख़बार में छपी ख़बर से लिये गए हैं। वैसे होनी तो नही चाहिए फिर भी अगर प्रस्तुत लेख से किसी की भी भावनाएँ आहत होती हैं तो मैं सहृदय क्षमायाची हूँ।

 

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