“छठ की परंपरा से हमें सिखना चाहिए हर जाति का सम्मान करना”

Posted by Ashish Rajbhar in Hindi, Society
October 26, 2017

सबसे पहले यह समझने की ज़रूरत है कि संस्कृति क्या है? आम भाषा में कहा जाए तो “ the way of living” मनुष्य के जीवन जीने का वह तरीका जो उसने सभ्यता के सालों के विकास बाद विकसित किया। अपने खान-पान और जीवन जीने के लिए ज़रूरी वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए  आसपास, प्रकृति और समाज के अन्य वर्गों के साथ जो उसने संबंध स्थापित किया वह संस्कृति है। यह बात अलग है कि आज हमारा स्वभाव परस्पर सहयोग करना नहीं एक-दूसरे का और प्रकृति का दोहन करना ही है परंतु छठपूजा उसी परस्पर सहयोग के लिए प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का सांस्कृतिक महोत्सव है।

छठपूजा पर संध्या अर्घ के समय सभी लोग अपने परिवार के छोटे-बड़े लोगों के साथ घाट, तालाब, नदी के किनारे जमा होते हैं यह वह समय होता है जब प्रकृति के साथ हमारे जुड़ाव और समाज के साथ हमारे गठजोड़ का अद्भुत संगम हमारे सामने होता है। लोग घुटने तक पानी में खड़े होकर हाथ में सूप ( एक प्रकार की बांस की बनी टोकरी ) लिए, उसमें हर प्रकार के फल और सब्ज़ी रखकर जो हमे प्रकृति ने दिए हैं, सूर्य की तरफ सम्मान से देखते हैं जो खुद प्रकृति में हर एक जीवन का आधार है। प्रकृति ने जो भी कुछ दिया है उसके लिए प्रकृति को धन्यवाद देते हैं। इसमें किसी भी तरह का कर्मकांड, मंत्र का प्रयोग नहीं होता है बस चारों तरफ लोकगीत, आस्था और प्रकृति का संगम दिखता है।

पूजा में प्रयोग होने वाले कुम्हार के बनाये मिट्टी के बर्तन और सबसे शुद्ध चीज़ बांस का बना वह सूप जिसे समाज में सबसे निचले स्तर पर धकेले गए डोम समुदाय के लोगों द्वारा बनाया जाता है। यह उदाहरण जात-पात और वर्गवाद जैसी रुढ़िवादी सोच को भी तोड़ता है और बताता है कि हम कैसे एक दूसरे पर निर्भर करते हैं और हमें सभी के प्रति आभार का भाव रखना चाहिए।

जापानी संस्कृति में अभिवादन है ‘इतादाकिमासू’ जिसका अर्थ होता है उन सभी हाथों ( किसान, व्यपारी)  का धन्यवाद जिसने मेरा भोजन मेरी थाली तक लाने में मदद की,  छठपूजा में भी वैसा ही कुछ भाव है। छठपूजा एक शुद्ध रिश्ता है है प्रकृति और समाज के साथ जिसमें एक ही नियम है सद्भाव और शुद्धता और समाज के किसी भी कुरूप नियम की ज़रूरत नहीं है बस मनुष्य का प्रकृति के साथ जो संबंध है उसी का उत्सव है। इसलिए यह धार्मिक अनुष्ठान से ज़्यादा संस्कृति (जीवन जीने का तरीका ) का उत्सव है जिसमें नदी, सूर्य और समाज के साथ हर वर्ग के लिए एक आभार का भाव है।

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