” धार्मिक हिंसा “

Posted by pratik
October 26, 2017

Self-Published

” धार्मिक हिंसा “

धार्मिक हिंसा, एक ऐसा शब्द, जो धर्म को अधर्म के साथ ला खड़ा कर देता है, भगवान को भगवान से ही जुदा कर देता है, खुदा को खुद उसके कठघरे में खड़ा कर देता है। आज के माहौल में तो ये हालात आम हो गए है, अब तो लोग धर्म के नाम पर भी हिंसा की और झुकने लगे है। सब बस इसी ख्याल में आज एक दूसरों से लड़ रहे की कहीं उनका धर्म खतरे में ना पर जाए, कही उनकी धर्म की ब्रांड वैल्यू कम ना हो कहीं उनके भक्तों के बाजार में मंदी ना पर जाए लेकिन ये मुर्ख इतना भी नहीं समझते की लोगों की औकात ही क्या जो खुदा के आँगन में वीरानियाँ बिछा सके, उनके अस्तित्व को मिटा सकें।

आज हिन्दु हिंदुत्व के लिए लड़ रहा, मुसलमान इस्लाम के लिए लड़ रहा और ईसाई ईसा के लिए लड़ रहा। लेकिन क्या इसकी कोई जरूरत है? उनको किसी ने इजाजत दी है? नहीं, जी नहीं उनको कोई हक नहीं की वो धर्म के नाम पर, धर्म की आड़ में अधर्म का रास्ता अपनाये, खुदा के नाम पर खुद खुदा के बंदों से जा भिरे।

हिंदुत्व कभी नहीं सिखाता बैर रखना, इस्लाम कभी नहीं सिखाता किसी को जख्म देना और ईसा कभी नहीं चाहते किसी के आँखों में आंसू फिर ये झगड़ा क्यों,तो फिर ये फसाद क्यों? शायद इसका जवाब भी खुद धर्म है। धर्म के नाम पर जो अधर्म का खेल खेला जा रहा उसका इल्जाम सीधे तौर पे धर्म पर भी लगाया जा सकता है। लेकिन क्यों, धर्म पर इल्जाम क्यों? उस धर्म को मानने वालों पर इल्जाम क्यों नहीं? उस धर्म को बुनने वालों पर इल्जाम क्यों नहीं?

इसका जवाब थोड़ा पेचीदा है और थोड़ा बनावटी भी। इसकी जड़ तक जाए बिना इसका जवाब खोजना शायद मैदान में सुई ढूंढने के बराबर सा होगा। आखिर ये धर्म का खेल शुरू कहाँ से हुआ? भगवान् को किस ने देखा? उनकी मुलाकात किससे हुई? क्या दुनिया में भगवान से पहले भी किसी का दबदबा था? भगवान् नें आखिर एक जैसे दिखने वालों को धर्म के आधार पे कैसे बाँटा?

कई ऐसे सवाल हैं जिसकी जड़ बहुत मजबूत तो हैं लेकिन जवाब थोड़े ढीले-ढाले से लगते हैं। वैसे सवाल तो कई है जहन में मेरे भी जिसे ढूँढना अभी बाकी है। सोंच रहा हूँ थोड़ा जवाब की तलाश मैं खुद कर लेता हूँ फिर आगे की सुरुआत एक नई और जोरदार तरीके से करूँगा। लेकिन जाते-जाते बस इतना ही बोलना चाहता हूँ की, ये जितने भी धर्म के आंड़ में दंगे-फसाद होते हैं शायद उसका कारण ये हो की “कोई भी धर्म अपनी अंदर की बुराइयों की ओर झांकना नहीं चाहता”।

. प्रतीक प्रताप सिंह

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