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नदी को बचाना हमारे समय का सबसे बड़ा धर्म है

Posted by राजीव रंजन
October 21, 2017

नदी और मनुष्य के बीच अत्यंत पुराना और गहरा रिश्ता है। विश्व की लगभग सभी पुरानी सभ्यताएँ; चाहे वह सिंधु‌‌-घाटी सभ्यता हो या नील नदी की सभ्यता अथवा मेसोपोटामिया की, इस रिश्ते की साक्षी हैं। नदी मनुष्य की जरूरतों के लिए जल और उसके परिवहन की माध्यम भर नहीं हैं, बल्कि सहस्राब्दियों के इस साहचर्य ने दोनों में रागात्मक संबंध विकसित कर दिया है। कहीं वह माँ है, तो कहीं प्रेयसी और कहीं देवी या ईश्वरीय शक्ति— जीवन में प्रेम, रस और आध्यात्म की प्रतीक।

नदी माँ है, अपने आँचल में रस का अक्षय भंडार संचित किये हमारी धरती, हमारी क्षुधा और हमारी संस्कृति को अपने प्राण-रस से तृप्त कर उसे पुष्ट करने वाली माँ। वह अन्नदा है। वह पुष्टिदा है। वह सरस है। आनंदमयी है।

शाम की गोधुली में घर लौटती रँभाती गायों को सिकम-भर (जी-भर) जल पिलाकर तृप्त कर देने वाली नदी, उनमें दूध का अमृत-स्रोत भर देने वाली नदी, धरती को सींच कर हरी-भरी कर देने वाली नदी माँ नहीं मातामही है। मातृ-रूपा धरती और गो दोनों का पोषण करने वाली दोनों को सरस करने वाली मातामही।

नदी मानुष्य की सनातन प्रेयसी है

नदी प्रेयसी है। उसमें अथाह रस है। अनिवार्य आमंत्रण है, उसमें उतर जाने, खो जाने, स्वयं को विलीन कर लेने का आमंत्रण । वह स्पर्शाकुल और वाचाल प्रेयसी नहीं है, वह धीरा है, प्रशांत है, कल-कल की मधुर-ध्वनि करने वाली मृदुभाषिणी है।

उसमें तरंग है, आवेग है, बढ़ियाती है, तो दूर-दूर तक विस्तृत हो जाती है और फिर अपनी उर्वरता अपनी मातृका रूप का अवशेष नवीन जलोढ-मिट्टी (मृतिका) छोड़ पुनः नवोढा‌ की तरह संकुचित हो जाती है। फिर अपने पाट में आ सिमटती है। एक नई प्रेयसी की तरह-संकुचित, उत्फुल्ल और आमंत्रणोत्सुक।

नदी चिर यौवना है। उसका यौवन और उसका प्रेम या तो मातृत्व में फलीभूत होता है या मुक्ति में। राम ने सरयू की गोद में जन्म लिया, उससे प्रेम किया और उसी की धार में समाहित हो गए। वे मर्यादा पुरुषोत्तम थे, परात्पर ब्रह्म के सगुण-साकार रूप। उनके लिए यह मार्ग सरल था। हम उनके अंश हैं, माया के वशीभूत। कीर-मर्कट की तरह अपने-अपने पिंजरे और अपनी-अपनी रस्सी में बँधे हुए। हमें अपनी इस नीयति से अधिक लगाव है। इस छान-पगहे का अधिक आकर्षण है। हम उसी में बँधकर डोलते रहना चाहते हैं, अपने खूँटे के ईर्द-गिर्द बित्ते-चार बित्ते की परिधि में अपनी मुक्ति का जश्न मनाते हुए। हम स्वतंत्र हैं, हम मुक्त हैं, हम आधुनिक हैं। राम और सीता जैसे महाकाव्य-युग के पुराने घिसे-पिटे रूपकों से अधिक मानवीय और अधिक सहज। हम उनसे और उन्हें ईश्वर मानकर पूजने वालों से अधिक बुद्धि-विवेक-सम्पन हैं, अधिक वैज्ञानिक और तार्किक हैं। हम पुरानी रूढियों को नहीं मानते। हम उनके समूल उच्छेद के विश्वासी और मानव के जीवन की सहजता के आग्रही हैं। हमारी सहजता का प्रतिमान वही है जो पुराने किसी संस्कारी मन के लिए उद्दाम है, उच्छृंखल है या अनियंत्रित है। हमारे लिए प्रेम में डूब जाना उसमें मुक्ति पा लेना, स्वयं को विस्मृत कर प्रेम की धार में विलीन हो जाना असहज है, अमानवीय है, आत्महत्या है, या फिर हद से हद अस्तित्व का विलयन अथवा चरम क्षण की अनुभूति माध्यम।

हमने नदी को अपने इसी प्रेम-पाश में बाँध लिया है। वह प्रेयसी नहीं, हमारी बंधक है— हमारे अनुरंजन का, भोग का और तृप्ति का साधन मात्र। हम उसे भोग रहे हैं, उससे अनुरंजित हो रहे हैं और तृप्त होने के बजाय अपनी वासना को और अधिक उत्तेजित कर रहे हैं। उसकी आत्मा की मसान पर अपनी ऐषणा की धुनी रमाए फुत्कार रहे है—‘ये दिल माँगे मोर’। हमारे इस ‘मोर’ का कोई अंत नहीं, कोई सीमा नहीं। हम उसके शव में भी अपनी ‘सिद्धि’ देख रहे हैं।

वह हमारे लिए द्रौपदी का अक्षय-पात्र है, और हम परीक्षा लेने के लिए दुर्वासा बन उसके सामने आ डटे हैं। विडम्बना यह कि द्रौपदी के सामने उनके सखा कृष्ण का सहारा था, लेकिन नदी? वह निरुपाय है।

उसका सहस्राब्दियों का सहचर, उसका प्रिय मनुष्य स्वयं दुर्वासा बनकर सामने आ खड़ा है। अपने भोग के लिए उसके सारे वजूद को मिटा डालना चाहता है। उसके बालू, उसके पत्थर, उसकी सीपी, उसके जीव, उसकी गति-तरंग, उसका पाट— सब-कुछ। बूँद-बूँद, कण-कण, ईंच-ईंच।

नदी-घाटी योजनाएँ प्रेम की इस दोहन शैली की परिणति हैं

प्रेम की इस दोहन शैली की परिणति हैं, नदी-घाटी योजनाएँ, जिनके आरंभ से अंत तक की सारी पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी होती है। यह बात अलग है कि

इस प्रेम-प्रोजेक्ट का फिल्मांकन कई बार मध्यांतर में ही फ्लाप हो जाता है और कई बार यह इतना लंबा खिच जाता है कि खलनायक के बजाय नायक की ही मृत्यु हो जाय। फलागम तो अनिवर्यतः नायिका (नदी) को न होकर निर्माता-निर्देशक और कैमरामैन को ही होता है। बाकी रही गीत-संगीत की बात तो प्रोजेक्ट एरिया के विस्थापित लोगों की त्राहि का रम्य-दारुण स्वर इसकी कमी भी पूरी कर देता है। दर्शक को क्या ? फिल्म में एक ‘बीड़ी जलइले’ छाप ‘आइटम सांग’ पर ठुमका दिखा दो वाह-वाह कर उठेगा; ‘टिहरी’ और ‘हरसूद’ उसी पर न्योछावर कर देगा।

रही बात हिट होने की तो ‘मल्टीप्लेक्स’ के जमाने में सब चलता है। अगर फिल्म में थोड़ा हारर, थोड़ा सस्पेंस, थोड़ा मसाला हो और कहानी में प्रेम सिरे से गायब हो तो भी कमाई पक्की है। मामला प्रेम का नहीं उसके प्रचार और प्रदर्शन का है। वह अनुभूति से नहीं फेसियल एक्सप्रेशन और स्माइल के ईंच-सेंटीमीटर से तय होता है।

अंतःसलिला है नदी

नदी केवल धरती के भूगोल में बहने वाली नदी नहीं है। वह जितनी बाहर है, उतनी ही भीतर भी। वह अंतःसलिला है। हमारे भीतर निरंतर बह रही है। अनेक-अनेक सहस्राब्दियों से अनेक नाम, अनेक रूप नदी। अपनी सहस्र-सहस्र भुजाओं वाली नदी। हिम की तरह शीतल और खौलते हुए जल की तरह उष्ण जल वाली नदी। समुद्र जैसे खारे और दूध की तरह सुस्वादु जल वाली नदी। सिंधु-ब्रह्मपुत्र की तरह विशाल और वरुणा-असी की तरह मृत-प्राय नदी। यमुना और काली की तरह गँदली और भागीरथी-अलकनंदा की तरह झिर-झिर निर्मल नदी। कर्मनाशा की जैसी अभिशिप्त और नर्मदा की तरह पुण्यशीला नदी। इन नदियों के कोई घाट, कोई तटबंध, कोई प्रवाह क्षेत्र, कोई विभाजक रेखा नहीं है। यहाँ सब घुला-मिला, सब सहज और सब एक दूसरे में डूबा हुआ है। सब समरस, सब समशील, सब अविभाजित, सब अखण्ड, सब आनंदमय, जिह्वा संवेद्य षड्-रस से परे, अद्भुत और अपूर्व।

हम बाहर की नदीयों को जोड़ना चाहते हैं। मृत हो चुकी नदियों को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। एक नदी का जल दूसरे में स्थानांतरित करना चाहते हैं। लेकिन हमारे भीतर की नदी छीज रही है, सूख रही है, विभाजित हो रही है। हमें उसकी चिंता नहीं। हाथों में लहराती तख्तियाँ, उठी हुई बाहों के साथ उछलते नारों और दंगों की चोट से टूटते अखंड कगारों की चिंता हमें नहीं।

स्वाद, रंग, घाट की होड़ में बिखरती समन्विति की चिंता हमें नहीं। हम अपने भीतर के देवत्व को फाँसी देकर मंदिरों, मठों, गिरजाघरों में उसकी मूर्तियाँ सजाना चाहते हैं। उसकी लाश पर मस्जिदों की ऊँची मीनारें और भव्य मजारें बनाना चाहते हैं। भीतर के रस के अखंड और शाश्वत प्रवाह को नष्ट कर जगह-जगह कृत्रिम फब्बारे लगाना चाहते हैं। हमरे भीतर की नदी छीज रही है। हमारे भीतर का रस सूख रहा है। हमारे भीतर का देवत्व बधिक के गँडासे के सामने उकुडूँ बैठा है, पर हमारे लिए वह देवता नहीं देवी का निर्माल्य है या कुर्बानी का बकरा। हम जोर-जोर से ‘हर-हर महादेव’, ‘अल्ला हु अकबर’ और ‘सत श्री अकाल’ के नारे लगा रहे हैं। हमारे स्वरों के बीच की समरसता विलुप्त हो चुकी है। हमारे भीतर की अंतःसलिला में अलग-अलग रंग और अलग-अलग स्वाद वाली सदानीरा नदियाँ अब आपस में डूबकर अपूर्व रंग और अद्भुत स्वाद की सृष्टि नहीं करतीं, बल्कि अपने-अपने तटों में सिमट कर चल रही हैं। कोई भागीरथी, कोई अलकनंदा, कोई नर्मदा, कोई गंगा, कोई ब्रह्मपुत्र नहीं, हमारे भीतर बहने वाली हर धारा या तो मल-वाहिनी असी है या पुण्य-क्षीणा कर्मनासा। यह हमारे भीतर के मल को ढो रही है। हमारी यांत्रिकता, लिप्सा और स्वार्थपरता के सारे अपशिष्ट इसमें घुल रहे हैं। यह दिन-ब-दिन विषाक्त होती जा रही है। हमारे लोभ, मद, मोह, तृषा, भोग, वासना, एषणा, हिंसा, व्यभिचार, पापाचार, के भार ने इसे बोझिल बना दिया है। यह झिर-झिर, निर्मल परदर्शी नहीं, हमारे भीतर की कुँठाओं के रंग में रंगी है। यह कठौती वाली गंगा है। इसके घाट पर बैठा कोई तुलसीदास अब यह दावा नहीं कर सकता कि ‘सुरसरि सम सबकर हित होई’।

       नदी केवल हमारे पोषण का माध्यम नहीं हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति और जीवन का स्पंदन भी है, जिसे हम संस्कृति कहते हैं उसका सारा उदात्त, सारा श्रेष्ठ या पुरानी शब्दावली में कहूँ तो आत्मा इस नदी के तट पर ही जन्मी है।

यहीं पाली बढ़ी और यहाँ से धीरे धीरे सुदूर पूर्व से पश्चिम सीमांत तक निरंतर विकसित होती रही। भारत ही नहीं दुनिया की तमाम संस्कृतियाँ इसी की दें हैं । इसलिए नदी का सूखना आत्मा के रस का सुखना है । नदी की मृत्यु एक संस्कृति की मृत्यु है । अपनी संस्कृतियों की रक्षा के लिए जरूरी है नदियों को बचाना, बिना नदियों के हम संस्कृतियों की रक्षा नहीं कर सकते । हमारे इतिहास की धाराएँ सूख जाएंगे । कला के तमाम रूपक खो जाएंगे और मर जाएगी हमारी कापना की धार । हम जल के लिए विलाप करते शुष्क मरूस्थल में तब्दील हो जाएंगे। पुराने अरबों की तरह बर्बर, लुटेरे और असंस्कृत । हमारी पुराकथाएँ, गाथाएँ और अध्यात्म-दर्शन ही नहीं हमारी चेतेना के तमाम नए कार्य-व्यापार भी इन सेगिस्तानों की धूल भारी आंधीयों में या तो उड़ा दिये जाएँगे या फिर रेत के किसी टीले के अंदर दफन हो जाएंगे । इसलिए नदी को बचाना जीवन में प्रेम को, सरसता को, कला को, इतिहास को और अंततः समूची मानव संस्कृति को बचाना है। नदियों की रक्षा मानवता की रक्षा है । यह हमारे समय का सबसे बड़ा धर्म है ।