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नाबालिक पत्नी के साथ सेक्स करने का फैसला, अधूरा न्याय है -प्रत्युष प्रशांत

Posted by Prashant Pratyush
October 27, 2017

अंतराष्ट्रीय बालिका दिवस के दिन सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में एक बड़ा फैसला किया जिसमें न्यायालय ने 15  से 18  की उम्र में बनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध के मामले को रेप करार दिया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नए बाल विवाहों को रोकने तो कारगर हो सकता है, लेकिन बाल विवाह का दंश भुगत रही लड़कियों को अधर में भी छोड़ता हैं, साथ ही साथ कई व्यावहारिक सवालों को जन्म भी देता हैं जिसपर विचार करने की जरूरत समाज और सामाजिक संस्थाओं दोनों को है।

विश्व भर के बाल-विवाह के कुल आंकड़ों का लगभग 40 फीसदी भारत में ही है। यूनिसेफ की 2009 की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश 73 फीसदी, राजस्थान 68 फीसदी, उत्तर प्रदेश 64 फीसदी, आंघ्र प्रदेश तथा बिहार में क्रमश: 71 और 67 फीसदी बाल विवाह होते है। इन तमाम बाल विवाहों के मामलों के व्यावहारिक पक्षों यह भी है कि लड़कियों की इच्छा नहीं होने के बाद भी उनको बाल विवाह के नर्क में धकेल दिया जाता है। इस स्थिति में पति से बलात्कार के मामले में वो न्याय पाने के लिए कितनी स्वतंत्र हो पायेगी यह यक्ष प्रश्न है?

हमारे देश में तमाम बाल विवाह के मामलों में लड़के-लड़कियों के माता-पिता की सहमति होती है,तो यहीं माता-पिता लड़की द्वारा पति पर बलात्कार का केस करने के फैसले में उसका कितना साथ देगे। इसके अलावा मात्र 18  साल की लड़की के पास कोई आर्थिक आधार नहीं होता, फिर वो किसके सहारे शिकायत दर्ज करने का फैसला कर सकेगी। # ME TOO  कैम्पेन में परिवार के सदस्यों द्दारा अनैतिक यौन व्यवहार के विरुद्ध शिकायत लड़कियां अपने माता-पिता या अभिभावक को नहीं बता पाती है, इस तरह के भी सामने आ रहे है। फिर मात्र 18  साल की लड़की से अधिक उम्मीद कैसे कर पा रहे है? इसमें एक व्यावहारिक समस्या यह भी है कि इस तरह की शिकायत दर्ज करने पर लड़की को न सिर्फ परिवारिक बल्कि सामाजिक उत्पीड़न भी झेलना पड़ता है, कहीं न कहीं लड़की स्वयं से भी एक संघर्ष की स्थिति में होती है। इस स्थिति में शिकायत करने वाली लड़की अपने जीवन के अन्य समस्या का समाधान कैसे कर सकेगी?

इससे जुड़ा हुआ एक सवाल यह भी है कि पति द्दारा बलात्कार का मामला बनते ही लड़की के माता-पिता पर भी बाल विवाह कराने का मामला दर्ज होगा। इस स्थिति में मात्र 18 साल की लड़की जिसका कोई आर्थिक आधार नहीं है उसका पारिवारिक अधिकार यानी सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ सवाल उसके सामने होगा। मात्र 18  साल की लड़की के एक फैसले से जो स्थिति पैदा होगी वो इससे कैसे निपट पायेगी? पति पर बलात्कार का मामला दर्ज करने पर उसकी सामाजिक छवि को जिस तरह तार-तार किया जायेगा, शायद ही वह कभी दूसरे शादी का फैसला समान्य स्थिति में ले सकेगी। स्पष्ट तौर पर सामाजिक और आर्थिक आधार पर स्वतंत्र हुई बिना बाल विवाह का दंश झेलती लड़की न्याय पाने के लिए स्वयं को तैयार नहीं कर सकती है। साथ-ही-साथ यह भी समझना जरूरी है कि भारतीय सामाजिक समाजीकरण में विवाह और उससे जुड़ी धारणांए पति-पत्नी के संबंध को लेकर समानता की कम और आदर्श को लेकर अधिक मजबूत है मसलन, पति पेरमेश्वर, सुहाग की निशानी जैसे समाजीकरण मजबूती से जड़ जमाये हुए है। इस स्थिति में अपने शारीरिक शोषण के विरुद्ध महज 18  साल की लड़की से इन तमाम हालातों में मुखर होने की उम्मीद करना, थोड़ा अव्यावहारिक ही लगता है।

जाहिर है कि सर्वोच्च न्यायालय के मौजूदा फैसले को व्यावहारिक रूप से अमल में लाने के लिए सामाजिक संस्थाओं पर व्यापक स्तर पर बाल विवाह कानून के संबंध में जागरूकता पर निर्भर रहना पड़ेगा। जहां समाज में लड़कियों की यौन इच्छा की कोई मान्यता नहीं है साथ ही भारतीय मिथकीय या धार्मिक परंपरा में किसी बलात्कारी को दंडित किए जाने का कोई जिक्र नहीं है। हाल के दिनों में सेक्स की अदालत वेब विडियों सीरीज में सेक्स से जुड़ी मान्यताओं और महिलाओं की स्थिति के कई परतों को उड़ेघ कर सामने प्रस्तुत किया है। जो उत्साहवर्षक कम चिंताजनक अधिक है। परिवार के निजी दायरे में ही नहीं सार्वजनिक दायरे में भी पुरुष महिलाओं पर अपना विशेष अधिकार का भाव रखते है, महिलाओं के अधिकार और स्वतंत्रता की बात ही उन्हें बौखला देती है। यह बौखलाहट धर्म, जाति और वर्ग के दायरे से मुक्त नहीं है।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि कोर्ट का यह फैसला बाल विवाह विरोधी कानून को व्यवहार में सख्ती से लागू करा सकने में बेहद कारगर साबित हो सकता है। पर कानून को लागू करने के साथ-साथ व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत अधिक है। बाल विवाह कानून पर कठोर होकर कम उम्र की लड़कियों को वैवाहिक यौन दासता से मुक्त रखा जा सकता है। लेकिन 18 साल की लड़की का नये कानून का अपने हक में प्रयोग करना शंकाओं को पैदा करता है। इस कानून से बाल विवाह और बाल विवाह के कारण फंसने वाली लड़कियों को राहत मिलेगी इसलिए इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए।