नोस्टाल्जिया

Posted by aman abbas
October 29, 2017

दबे पाओं ठंड दस्तक दे रही है। में अपने कमरे में अकेला पड़ा किताबों में मसरूफ़ रहता हूँ। सुना है आज जामिया यूनिवर्सिटी में कोई मेला लगा है। बोहोत लोग आए होंगे। ख़ूबसूरत लड़कियों से कहचाखच भरी हुई जामिया केसी लगती होगी? में आज से करीब तीन साल पहले पहली बार वहां गया था। ये वो ज़माना था के जब हमारे भी दोस्त हुआ करते थे। फ़ोन करके बुलाया था मुझे। में हर चीज़ से बेख़बर बुलावे पर चला भी गया था।
अच्छा लगा था जाकर। पूरी जामिया दुल्हन की तरह सजी हुई थी। हर तरफ़ हज़ारो अंजान चेहरे। उस वक़्त तो मुझे बोहोत उत्साहित करते थे मगर अब शायद उत्साह ख़त्म हो गया है। हर तरफ दोस्तों के झुंड के झुंड हंस रहे थे तो कहीं पर प्यार करने वाला जोड़े सबसे कोने वाली बेंचो पर बैठे अपनी अलग ही दुनया में खोये हुए थे। में ये सब पहली बार देख रहा था। बोहोत उत्साहित था मैं। अब उस वक़्त की हल्की सी झलकियां ही मेरी आँखों मे बची रह गईं हैं। कैसे हैम तीन दोस्त सब लोगो से अंजान वहां पागलों की तरह घूम रहे थे। शायद वो वक़्त वाक़ई एक अच्छा वक़्त था। उस वक़्त चीज़ों की ज़्यादा फिक्र नहीं थी। जहां दिल किया या जहां दोस्तोँ ने बुलाया बेख़याली ही में चल पड़े। वो वक़्त हसीन लड़कियों के ख्वाबों से भरा वक़्त था। वो वक़्त हिज्रो वस्ल से न आशना था। अब भी में उस वक़्त की ख़ुशबो को महसूस कर रहा हूँ। मगर अब फ़क़त ख़ुशबू ही रह गयी है। लम्हात गुज़रते जा रहें हैं सिर्फ ख़ुशबू के सहारे ।आज सुबह पापा ने बताया के जामिया में आज फ़ंक्शन हो रहा है । दिल हो तो चले जाना। शायद उन्हें भी ये गुमान है के दिन भर एक कमरे में पड़े रहने या किताबों में मग़ज़ मारी करते रहना दुरुस्त नहीं। मेने सोचा चलो आज पाप की बात मानकर ही वहां हो आया जाए लेकिन थोड़ा और सोचने के बाद इस नतीजे पर पुहंचा के अगर कोई साथ जाने वाला हो तो चला जाऊंगा। लेकिन शायद नहीं। नहीं जाऊंगा। जाऊं भी क्यों। लोगो की कसीर तादाद ख़ुदा जाने क्यों मुझे एक अजीब हालत में डाल देती है। अजीब सी कश्मकश का सामना करना पड़ता है किसी महफ़िल में जाने के बाद।
तो आज भी में या तो कोई जॉन एलिया की ग़ज़ल पढ़ लूंगा या इंतेज़ार हुसैन साहब का कोई अफ़साना।
या फिर बोहोत ज़्यादा करम फरमाया भी गया तो किसी खूबसूरत टीचर को याद।
इससे मेरे कमरे में जो ख़ुशबो किसी वक़्त की निशानदेही करती महक रही है वो थोड़ी दब जाएगी। एक नई ख़ुशबो एक नया रंग चढ़ जाएगा कमरे की बेरंग दीवारों पर।
न जाने क्यों लेकिन ये शेर जो के अबू तुराब भाई ने लिखा है वो तहरीर करने का दिल चाह रहा है

दिल से अब भाते हैं मुझको इस्तियारे रंग के
ज़िन्दगी भी कटति जाती है सहारे रंग के।

-अमान अब्बास