पितृसत्ता की कोढ़ और आधुनिकता की खाज

Posted by Rishabh Kumar Mishra
October 25, 2017

Self-Published

भारतीय समाज में महिलाओं की हैसियत की चर्चा करते हुए प्रायः कहा जाता है कि वे उत्पीड़ित और पिछड़ी हुयी हैं। इसका कारण समाज की पुरातनपंथी धारणाएं हैं जिनकी जड़े धर्म और जाति में व्याप्त हैं। विकल्प स्वरूप ‘आधुनिकता‘ का रास्ता सुझाया जाता है। आधुनिकता के पोषण का दायित्व औपचारिक शिक्षा को इस उद्देश्य के साथ सौंपा जाता है कि शिक्षा और इसके रास्ते नौकरी व आर्थिक स्वायत्तता महिलाओं की मुक्ति का मार्ग है। इस तरह की सरल व्याख्या उत्पीड़न की जड़ को परंपरागत पितृसत्ता में देखती है और इसका निवारण शिक्षा के रास्ते आधुनिकता में खोजती है। सवाल है कि यहां आधुनिकता का आशय क्या है? एन्थोनी गिडेंस के विचारों के मार्फत कहूं तो आधुनिकता स्वायत्त व्यक्ति को जन्म देती है; सार्वजनिक और निजी जीवन में लोकतांत्रिक मूल्यों को पोषित करती है। ये ‘स्वायत्त व्यक्ति, एक समान सामाजिक हैसियत वाले होते हैं। वे लोकतांत्रिक तरीके से एक दूसरे के विचारों और भावनाओं का सम्मान करते हुए संवाद के समान अवसर के द्वारा आम सहमति से निर्णय लेते हैं।‘  स्पष्ट है कि अपने मूल स्वरूप में आधुनिक होना समानता, स्वतंत्रता, स्वायत्तता, सहिष्णुता, संवादपरकता और व्यक्ति की गरिमा जैसे मूल्यों को लिए हुए है। यदि ये मूल्य हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाए तो निश्चित रूप पितृसत्ता के खिलाफ ‘क्रान्ति‘ की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। इसका स्वाभाविक क्षय हो जाएगा। 

हाल में कुछ महिलाओं ने अपने जिन अनुभवों को साझा किया वे इस व्याख्या के साथ मेल नहीं खाती हैं। इसके लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं। पहला, एक दिन एक छात्रा ने झल्लाहट भरे स्वर में शिकायत की-यदि छात्रावास में रात को निर्धारित समय से तनिक भी देर से आओ तो कारण बताना पड़ता है जबकि लड़के कभी भी आ-जा सकते हैं। उसका यह तर्क इस सोच पर आधारित है कि स्त्री और पुरूष के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। समानता के व्यवहार की मांग का प्रकट होना आधुनिकता का लक्षण है। लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से अनुशासन के पहरे का तर्क भी वाज़िब ठहरता है। ‘सुरक्षा‘  का खतरा किससे है? पितृसत्ता के उन प्रतिनिधियों से जिनके लिए लड़की एक वस्तु है और जो इस ताक में रहते हैं कि कैसे इस वस्तु के साथ छेड़-छाड़ की जाए। अर्थात् शिक्षित लड़कों को पढ़े-लिखे होने के बावज़ूद  पुरातनपंथी बने रहने की आजा़दी है। वे व्यक्ति की गरिमा जैसे आधुनिक मूल्य व व्यवहार का उल्लंघन कर सकते हैं। इस जमा़त में केवल लड़के ही शामिल नहीं है। पूरी व्यवस्था में सहमति है। इसी कारण ऐसे अवसरों पर जब महिलाएं समानता के अधिकार की दृष्टि से आवा़ज उठाती हैं तो इसे अनुशासनहीनता की श्रेणी में रखने की आतुरता देखी जाती है। इस उदाहरण के संदर्भ में संबंधित छात्रा में स्वतंत्र चेता व्यक्तित्व का उदय तो हुआ है लेकिन डर, मर्यादा, और नैतिकता की सीमाएं उसकी स्वतंत्र आव़ाज की चौहद्दी बन रही हैं।

दूसरा उदाहरण देखिए। एक लड़की को उच्च शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। कारण दिया जाता है कि भाई का विवाह दिसंबर में तय हो चुका है। सामाजिक मान्यता के अनुसार इससे पहले बहन की शादी करनी होगी। इस कारण उच्च शिक्षा का औचित्य नहीं बनता। यह परिवार इस बात पर गर्व करता है कि अपनी बेटी को जिले से बाहर छात्रावास में रहकर पढ़ने का अवसर दिया। वह लड़की भी अपने को ‘भाग्यशाली‘ मानती है। लेकिन जरा सोचिए कि पढ़ने की इच्छा और अवसर के बावजू़द क्या इस ‘भाग्यशाली‘ लड़की द्वारा घर में बैठकर एक-एक दिन शादी का इंतजार करना ‘आधुनिकता‘ है?  यह किस तरह के शिक्षित और आधुनिक समाज का प्रमाण है? ऐसा समाज जो शिक्षा को कल्याण की परिभाषा तक सीमित रखता है। इसके लिए शिक्षा का अर्थ है कि शिक्षित होने पर महिलाएं अपनी परंपरागत भूमिकाओं को अधिक कुशलता से निभाएंगी। कल्याण की यह दृष्टि महिलाओं की भूमिका और स्थिति को ज्यों का त्यों बनाए रखती है लेकिन वे जिस पायदान पर जहां है वहां उनकी भूमिका को सुदृढ़ करती है। ऐसे नारे कि ‘एक पढ़ी लिखी महिला तीन परिवारों का उद्धार करती है‘ इसका प्रमाण हैं।

एक तीसरा उदाहरण भी है। एक परिचिता सरकारी महकमें में बड़े ओहदे पर हैं। वे बताती है कि उनके विवाह के लिए योग्य वर की तलाश जारी है। कुछ वर मिल भी रहे हैं। लेकिन वेतनमान रास्ते का रोड़ा बन रहा है। तफ्सील से जानना चाहा तो मालूम हुआ कि उनके और परिवार के अनुसार लड़के का वेतन लड़की के वेतन से ज्यादा होना चाहिए। ऐसी स्थिति वाले लड़के नहीं मिल पा रहे हैं। एक लड़की और उसके परिवार में इस विश्वास का होना प्रमाण है कि आधुनिकता के प्रभाव में पढ़ी-लिखी और नौरकरीपेशा, होना महिलाओं की पहचान का हिस्सा बन चुका है लेकिन पितृसत्ता के प्रभाव में पुरूष से पीछे रहना या दब कर रहना भी सच्चाई है। इस सच्चाई को केवल पुरूषों के समुदाय ने ही नहीं बनाए रखा है बल्कि महिलाएं भी पितृसत्ता के इस बीज का संभाले हुए हैं। आधुनिक संस्थाएं लगातार पाश्चात्य तरीके के मूल्यों द्वारा विश्व के समातंर खड़े होने को तत्पर है लेकिन समाज की जड़ों में बसी पितृसत्ता हर बार मुखालफ़त कर देती है। शायद इसीलिए पढ़े-लिखे और नगरीय समाज की महिलाओं के ऊपर पुरूष से कमतर रहने का बोझ है। इसी कारण सब कुछ होने के बावजूद गृहिणी होने, घर-सज्जा में दक्ष होने और सुदंर होने के दबाव से वे मुक्त नहीं हो पायी है। आज भी शिक्षित और नगरीय समाज में इनके प्रति शारीरिक और मानसिक हिंसा विद्यमान है।

 

 

आधुनिकता ने ‘स्मार्ट‘ महिला की स्वीकार्यता को बढ़ावा दिया है लेकिन भारतीय समाज में कितनी स्मार्टनेस स्वीकार है? यह पितृसत्ता तय करती है। इसके विपरीत यदि पितृसत्ता मांग करती है महिलाओं को परंपरागत मूल्यों और व्यवहारों से युक्त होना चाहिए तो आधुनिकता यह सवाल खड़ा करती है कि वे कितनी और किस स्तर तक परंपरागत हों ? इसी द्वन्द्व का प्रभाव लेख में दिए गए उदाहरणों में हैं। पहले उदाहरण में पितृसत्ता सुरक्षा का वेष धर कर आधुनिक जमाने की लड़की के सामने उपस्थित है। वह सवाल उठा रही हैं लेकिन संघर्ष नहीं करेगी। दूसरे उदाहरण में पितृसत्ता जब कल्याण बनकर खड़ी होती है तो एहसान के बोझ तले दबी लड़की स्वयं को भाग्यशाली समझती है कि उसे कम से कम ‘पढ़ने-लिखने‘ का अवसर मिला लेकिन स्वतंत्र और वैयक्तिक जीवन से जुड़े निर्णय में घर वालों की मर्जी चलेगी। तीसरे उदाहरण में समान अवसर के प्रभाव में स्त्री ने सामाजिक हैसियत तो अर्जित की है लेकिन पितृसत्ता कंटीला पौधा एक ‘आधुनिक लड़की‘ की चेतना में जमा हुआ है। इसी कारण वह अपने से अधिक योग्य वर को तलाश रही है। निहितार्थ है कि आधुनिकता और परंपरा के घालमेल ने पितृसत्ता की शाखाओं का विस्तार किया है। स्त्री-पुरूष के बीच निजी और सार्वजनित जीवन में नए प्रकार की असमानताएं उपजी हैं। स्त्रियां ‘सांस्कृतिक प्रतीक‘ होने की छवि से मुक्त नहीं हो पायीं है। इसी कारण स्वतंत्र निर्णय और चुनाव का अभ्यास करने में वे हिचकिचाती हैं। आधुनिकता आधारित अभिवृत्ति और व्यवहार को अपनाने की दो बाधाएं है। प्रथम जो परंपराएं, विश्वास और मान्यताएं चलन में हैं, वे इससे मेल नहीं खाती। दूसरे इन्हें किसी अन्य संस्कृति, विशेष रूप से पाश्चात्य देशों से आयातित मानकर, सांस्कृतिक दृष्टि से ‘मिसफिट‘ घोषित कर दिया गया है। हम ‘संस्कृति‘ को छोड़कर आधुनिक बनने का तर्क नहीं पचा पाए हैं। साथ ही अपनी संस्कृति के प्रति अति लगाव में उसके दार्शनिक, वैज्ञानिक और अस्मितामूलक पक्ष के बजाय उसकी पुरातनपंथी मान्यताओं और रूढ़ियों के अभ्यास को बनाए रखना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में कई बार बीच का रास्ता निकालते हुए परंपरा में आधुनिकता की खोज का प्रयास किया जाता है। इस दौरान परंपरा की आलोचना के साथ ही उसे मूल्य/महत्ता प्रदान की जाती है। यह पद्धति सतही तौर पर ठीक है लेकिन भारत की जातीय, भाषायी, धार्मिक और क्षेत्रीय विविधता के परिप्रेक्ष्य यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि किसकी परंपरा के बरक्स आधुनिकता की खोज की जा रही है?

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