पुरुष मन की व्यथा

Posted by Ujjawal Kumar
October 22, 2017

Self-Published

जब कहने के लिए मन में हज़ार बातें हों और सुनने वाला कोई नहीं हो तब क्या कयामत टूटती है यह किसी पुरुष मन से भी पूछो. स्त्री के अकेलपन को शब्दों से अलंकृत करना हो तो कई शब्द मिल जाते हैं, मगर पुरुष अपने मन की वेदना कैसे कहे. चंद शब्द बाद ही दोस्त यार कहने लगते हैं, अरे यार लड़कियों की तरह बात करना बंद कर. ऐसी प्रतिक्रिया से मन में यह प्रश्न उठता है, क्या शब्द पर भी किसी ख़ास लिंग का अधिपत्य है ?

पुरुष भी तमाम तरह के ख़्वाब सजाता है अपने जीवन में मगर उसका मन डरता है यह कहने में कि, मेरी भी एक राजकुमारी होगी जिसके जुल्फों में उंगलिया फेरते-फेरते तमाम गम भूल जाऊंगा. जब कभी अपनी बात न कह सका तो फ़ैज़ और मुनीर नज़्म के सहारे अपने सारे एहसास उसके हृदय में घोल दूंगा. कभी किसी दिन सुहाने वीरान जंगल में ले जा कर कह दूंगा उस  राजकुमारी से कि तुम ही तो वो प्रकृति हो जिससे मेरे अस्तित्व की रचना होगी. मेरे सपनों का सजीव रूप मैं तुममे अपना विलय कर देना चाहता हूँ. क्या ऐसे शब्द  कह देने से पुरुष का ह्रदय स्त्री ह्रदय जैसा हो जाता है ? अब तक हमने समाज से जाना है कि यह लड़कियों की भाषा है.

जब कभी कोई पुरुष अपनी प्रेमिका की बात अपने किसी पुरुष साथी से कहता है तो उसके साथी कहतें हैं कि, जा उसके साथ एक रात बीता ले ऐसे विचार आने बंद हो जायेंगे. बस इतना भर का ही रिश्ता होता है किसी मन से किसी मन का ? यह डर भी उसे बार बार होता है कि, ऐसी बातें किसी से साझा करने से उसकी पौरुषता पर लोग शंका करने लागेंगे. ऐसे डर से ही  पुरुष, पुरुष बने रहने के लिए अपने मन की रचनाओं का रोज ही क़त्ल करता है.

फिल्मों में, लेखन में और समाज में पुरुष अपनी मन की कथा को ढूढते रहता है परन्तु उसे निराशा ही मिलती है. इस भीड़ में पुरुष मन की व्यथा सुनने वाले भी लोग होने होने चाहिए.  

 

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