“फेस्टिवल ऑफ़ फेलियर” ज़िन्दगी की छोटी छोटी हारों का जश्न

Posted by Bimal Raturi
October 16, 2017

सफल लोगों की जिंदगियों को करीब से देखें तो हम पाएंगे कि उस की पहली असफलता को उस आदमी ने किस तरह से लिया था और किस तरह से उस पर काम किया जिससे बाद में उस ने अपनी ज़िन्दगी को सफलता के मुकाम पर जा कर खड़ा किया |“असफलता जैसा कुछ नहीं होता, होता है तो बस अनुभव और आप की उन पर प्रतिक्रिया”  जैसी बातों पर केन्द्रित उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित हिंदी भवन में “यो ज़िन्दगी” संस्था द्वारा “फेस्टिवल ऑफ़ फेलियर” यानि हार का जश्न मनाया गया |

“फेस्टिवल ऑफ़ फेलियर” के बारे में यो ज़िन्दगी के संस्थापक बिमल रतूड़ी ने बताया कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2011 से 2015 के बीच 40,000 युवाओं ने पूरे भारत में आत्महत्या की | 15 से 29 आयु वर्ग में भारत दुनिया भर में पहले स्थान पर आता है | ज़िन्दगी की छोटी छोटी असफलताओं पर आत्महत्या जैसे कदम और दुनिया भर में हमारा पहला नंबर एक अलार्म है | यह कार्यक्रम हमें ज़िन्दगी की छोटी छोटी हारों से कुछ सीखने का जज्बा देता है क्यूंकि अगर सफलता मंजिल है तो असफलता रास्ता और बिना रस्ते के हम मंजिल तक नहीं पहुँच सकते |

पहली वक्ता महिला मुद्दों से जुडी दीपा कौशलम ने “मैरिज ! फेलियर ऑफ़ माय ट्रस्ट” विषय पर  अपनी कहानी कहते हुए कहा कि असफलता का जश्न मनाने से ज्यादा असफलता से सफलता तक पहुँचने की प्रक्रिया को समझना आवश्यक है इस समझ से दूसरों का संघर्ष या असफलता पर उनकी ख़ामोशी समझी जा सकती है |

दूसरे वक्ता प्रसिद्द फोटोग्राफर भूमेश भारती ने “फेलियर ऑफ़ फैली एक्सपेक्टेशन” विषय पर अपने ब्याख्यान में कहा कि पारिवारिक दवाब के कारण व्यक्ति अपनी कई अच्छाइयों को निखार नहीं पाता और सामाजिक दवाब होने पर तनाव झेलता है | हमें यह समझने की जरुरत है कि ख़ुशी और सफलता में बहुत बड़ा फर्क है |

इन व्याख्यानों से पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रा जूही शर्मा ने संवाद स्थापित करते हुए कुछ सवालों पर लोगों का नजरिया जाना जैसे असफलता क्या है ? क्या महत्व है असफलता का ? बार बार असफल होने से नुकसान हैं ? कैसे हम किसी को कहेंगे कि यह पूर्ण रूप से सफल है ? इन सवालों के साथ ऑडियंस जूझती नज़र आई और कई मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर बात हुई |

कार्यक्रम का संचालन करते हुए अर्चना ग्वाडी ने बार बार इस विषय को केंद्र में रखा कि असफलता के डर से बाहर आना होना और आगे बढ़ने के लिए उस असफलता को बहुत आसानी से अपनाना होना | महात्मा गाँधी महान न बनते अगर उन्हें 7 जून 1893 को अश्वेत होने की वजह से दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन से बाहर न फेंका जाता , इस बात से उनका नजरिया बदला और उन्होंने सत्याग्रह यानि अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्वक लड़ाई लड़ना की शुरुवात की |

यह एक अलग तरह का कार्यक्रम था जो पहली बार लोगों से उनकी सफल होने की कहानी नहीं बल्कि उनकी हार की कहानियों को सुनना चाहता था उन का जश्न मनाना चाहता था |

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