बिमल रॉय की मधुमती

Posted by Syedstauheed
October 29, 2017

Self-Published

बिमल राय  की ‘मधुमती’ मधु  और आनंद की पुनर्जन्म की कहानी है। कथाक्रम को पूरा करने के लिए दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला के किरदारों को अलग अलग समयकाल में गढ़ा गया। इस अवधारणा में आनंद और मधु की प्रेमकथा का सुखातमक समापन देवेन्द्र और राधा में हुआ। मधु,माधवी और राधा के पात्रों से वैयजंतीमाला प्रमुखता से उभर कर आई हैं। उम्दा अभिनय के लिए उन्हें ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार मिला था ।

आनंद एवं मधु की रूहानी प्रेमकथा जो कभी प्रकृति की गोद में सांसे ले रही थी, त्रासद रुप से इन्हीं फिज़ाओं में सिमट गई। हरित – नैसर्गिक प्रदेश में पल रहे प्रेम को विकास के ठेकेदार (पूंजीवादी खलनायक) की नज़र लगी। खलनायक को बर्दाश्त नहीं कि मधु उसे ना चाह कर किसी और को महत्त्व दे। वह पूंजीवादी व्यवस्था का प्रतिनिधि है, टिम्बर कंपनी का मालिक होने के नाते प्राकृतिक संपदा एवं भोले-भाले पहाड़ी संरक्षकों का शोषण करता है। पान राजा जैसे लोग कंपनी के अनैतिक नीतियों के विरूध हैं। मधु पान राजा की सुंदर कन्या है, पूंजीवादी पाश से अनभिज्ञ प्रकृति की गोद में उन्मुक्त गुनगुनाती है। मधुमती को बिमल राय की बडी कमर्शियल ‘हिट’ फिल्म के तौर पर देखा जाता है। हिंदी सिनेमा में नैसर्गिक पर्यावरण की छ्टा( कैमरे में कैद दिलकश नैसर्गिक नज़ारा) ‘मधुमती’ से निखर कर आई ।

एक सर्द भीगी रात में देवेन्द्र (दिलीप कुमार) और उसके साथी को लेकर एक कार दुर्गम पर्वतीय रास्तों से गुज़र रही है। देवेन्द्र अपनी धर्म-पत्नी को रिसीव करने रेलवे स्टेशन जा रहा है, लेकिन भारी बारिश की वजह से देवेन्द्र की कार को बीच रास्ते में ही रूकना पड़ता है। मौसम सामान्य होने के इंतज़ार में दोनों साथी करीब की एक पुरानी हवेली में आश्रय लेते हैं, हवेली में आकर देवेन्द्र को कुछ ऐसी वस्तुओं व चिन्हों का सामना होता है जो पूर्वजन्म की याद दिलाते हैं। हम देखते हैं कि हवेली से देवेन्द्र की पिछले जन्म की यादें जुड़ी हैं, इस पुरानी जगह पर आकर उसे अपना गुज़रा ज़माना याद आता है।

कथा फ़्लैशबैक में एक दास्तान बयान करती है। बात तब की है जब देवेन्द्र पूर्वजन्म में राजा साहब की शामगढ़ टिम्बर स्टेट(कंपनी) में आनंद (दिलीप कुमार) के रूप में मैनेजर(प्रबंधक)था। प्रकृति प्रेमी आनंद को नैसर्गिक वातावरण से प्रेम है,शामगढ़ व उसके आसपास के हरित व विहंगम दृश्य के बीच वह जीवन के सबसे सुहाने दिन गुज़ार रहा है। फ्लैशबैक में चलती कथा पर्वतीय सुंदरी ‘मधुमती’(वैजयंतीमाला) को प्रस्तुत करती है। वह कहानी का आकर्षण बिंदु है। मधु सुंदर आकर्षक व्यक्तित्व की मल्लिका है और बहुत अच्छा गाती भी है। आनंद वादियों में गूंजती मधुमती की मदमस्त आवाज़ ‘आ जा रे परदेसी’ का सच जानना चाहता है, आखिर वह कौन है जो रह-रह कर यूं आवाज़ देता है ? आवाज़ के पीछे ओझल व्यक्तित्व को जानने वह उस ओर जाता है। उसकी उत्कट जिज्ञासा उस व्यक्तित्व को तलाश कर लेती है ,यह आकर्षक छवि ‘मधुमती’ की है। मधु (जैसा कि आनंद उसे सम्बोधित करता है) की रहस्यवादी व सुंदर व्यक्तित्व का कायल होकर आनंद उसे चाहने लगता है। उधर मधु भी आनंद बाबू के स्वच्छ निश्छल आचरण से प्रभावित होकर, प्रेम बंधन में बंध जाती है।

कथा में आगे पहाड़ियों के राजा व मधु के पिता ‘पान राजा’(जयंत) का गुज़रा कल बताया जाता है, पहाड़ियों व शामगढ़ टिम्बर कम्पनी में ‘संघर्ष’ का तथ्य सामने आता है। पहाड़ी, कंपनी वालों की पूंजीवादी नीतियों व अत्याचार से त्रस्त हैं, पान राजा व पहाड़ी लोगों की कम्पनी वालों से शत्रुता है।
पहाडी लोगों का संघर्ष प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के लिए है, पूंजीवाद को मानवीय संवेदनाओं से कोई विशेष सरोकार नहीं। शामगढ टिम्बर कंपनी का
पूंजीवादी खलनायक उग्रनारायण (प्राण) आनंद-मधुमती की मधुर प्रेमकथा में एक बडी बाधा हैं । उसे यह प्रेम स्वीकार नहीं, पान राजा से पुरानी दुश्मनी का हिसाब चुकाने और इंजीनियर आनंद को मधु से दूर करने की योजना बनाता है। झूठी शान व मान के फिराक में किसी भी मूल्य पर मधु को हासिल
करना चाहता है, उसकी यह रणनीति(फिल्मों में पूंजीवादी ताकतवर खलनायक आला दर्जे का राजनीतिज्ञ रहा है।)लगभग कामयाब है, आनंद व मधु में अपरिहार्य दूरियों जन्म लेती हैं । उधर पान राजा भी किसी कंपनी(शाषक प्रतिनिधि) वाले से मधु का मिलना-जुलना ठीक नहीं मानते ,  वह इंजीनियर बाबू से उसका मिलना पसंद नहीं करते |लेकिन कंपनी का नौकर होकर भी आनंद का आचरण कंपनी वालों जैसा अवसरवादी नहीं, न ही वह भोली-भाली पहाडी लडकियों को धोखा देने वाला कपटी ‘परदेसी’ ही है । (हिन्दी फिल्मों में शहरी बाबू के झूठे मोहपाश में फंसकर भोली-भाली युवतियों द्वारा सबकुछ गंवा देने की अनेक कथाएं हैं। ) कथा के हीरो आनंद बाबू का आचरण उस श्रेणी का नहीं, उसके मन में मधु के लिए ‘निश्छल प्रेम है। मधु-और आनंद का रुहानी प्यार देखकर पान राजा प्यारी बेटी का हांथ परदेशी को सौंप कर दोनों का ब्याह पक्का कर देते हैं ।

ऐसा समझ में आता है कि अब सुखद समापन होगा, पर हमें यह भी मालूम है कि उग्रनारायण मधु को किसी मूल्य पर पाने के लिए कोई नाटकीय चाल लेगा। ऐसा हुआ भी रणनीति के तहत मधु को अगवा कर लेता है । धोखे से(आनंद का बुलावा) मधुमती को अपनी पर हवेली ले आता है । भोग-वासना के नापाक(फिल्मों में खलनायक को ज्यादातर इसी प्रकाश में प्रस्तुत किया गया) इरादे को अंज़ाम देने के लिए वह मधुमती की ओर बढता है। अस्मिता के खुले दुश्मन की साजिश में स्वयं को घिरा पाकर आत्मरक्षा में मधु खुदखुशी कर लेती है । उधर आनंद जब शहर से लौट कर आता है तो उसे मधु कहीं भी नज़र नहीं आती । गुजरी घटना से अनजान मधु को तालाश करता रहा । इस बीच उसे जानी लीवर से कंपनी के मालिक उग्रनारायण का दुराचारी आचरण पता चलता है, वह मधुमती के अपहरण व हत्या( घटनाक्रम जिसे आत्महत्या की शक्ल दे रहा है।) का दोषी है ।

आनंद मधु के हत्यारे को सज़ा दिलाने के लिए व दोषी को उसके ही जाल में फांसने की रणनीति बनाता है, मधु की हमशक्ल ‘माधवी’ इसमें सहयोग का वायदा करती है,लेकिन उसके तयशुदा जगह व समय आने से पहले पीडित मधु की आत्मा के सामने उग्रनारायण कत्ल का जुर्म कबूल लेता है । स्वीकारोक्ति बाद वहां मौजूद पुलिस अधिकारी उसे साथ ले जाते हैं । इस तरह मधुमती और आनंद के गुनाहगार को सज़ा मिली । लेकिन प्यार का दुखद अंत आनंद के व्याकुल मन को शांत कर न सका, मधु का यूं खो जाना उसे सहन नहीं हुआ, उसकी रुहानी आवाज़ (आ जा रे परदेशी )की पुकार की ओर जाकर मधु की तरह जान दे देता है । इस तरह जीवित होकर न साथ मिल सका तो मर कर दोनों मिलते हैं  । देवेन्द्र की पूर्वजन्म दास्तान वर्त्तमान में ‘रेल दुर्घटना’ की खबर से जाकर मिलती है, देवेन्द्र की पत्नी राधा( वैजयंतीमाला) इसी गाडी में सवार थी । सौभाग्य से दुर्घटना में राधा व उसका बच्चा सुरक्षित है ।

सोचता हूं कि नैसर्गिक प्रकृति से अलग मधुमती की संकल्पना संभव थी ? शायद नहीं क्योंकि मधु का व्यक्तित्व इसी वातावरण की देन है । नैसर्गिक
दृश्यों के बीच गूंजती पुकार ‘आ जा रे परदेशी’ कथावस्तु के खास सेट-अप को पूरा करते हैं। मधुमती प्रकृति की गोद में पली-बढी, इस वातावरण से उसे विशेष लगाव है ।फिल्म  की संपूर्ण कथा इसी प्राकृतिक परिवेश में सांस ले रही है । इसी वजह से ‘वन संपदा संरक्षण’ का प्रसंग फिल्म में आया है पहाडी लोग व पान राजा(मधु के पिता) टिम्बर कंपनी की गतिविधियों के विरूध हैं ।

बिमल राय के सिने सफ़र में ‘मधुमती’ का निर्माण एक रहस्य की तरह है । गौरतलब है कि उनका सिनेमा साहित्य व यथार्थ से सदैव ही प्रेरित रहा, किन्तु ‘मधुमती’ इस धारा से थोडी अलग है । बिमल राय के सिनेमा पर नज़र डालें तो उनमें यथार्थवाद, नव-यथार्थवाद आंदोलन का स्पष्ट प्रभाव समझ में आता है, समाज व यथार्थ के तत्त्वों से प्रेरित सिनेमा ‘रजत-पटल पर साकार भी हुआ । बिमल राय की अधिकांश फ़िल्में तत्कालीन सामाजिक यथार्थ की प्रवक्ता रहीं , उनके सिनेमा में साहित्यिक कृतियों का संज़ीदा रुपांतरण मिलता है । साहित्य की महान व स्मरणीय कथाएं – देवदास, परिणीता, सुजाता, काबुलीवाला, उसने कहा था, बिराज़ बहू जैसी फिल्मों की सामाजिक अपील बिमल राय सिनेमा की विशेषता है । ऐसे में ‘मधुमती’ की कथा-वस्तु उनके सिने संसार में अलग झलकती है।

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