बेटीयों के अच्छे दिन कब ?

Posted by Pravin Patil
October 11, 2017

Self-Published

‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा देनेवाली केंद्र की BJP सरकार से अब यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि, बेटियों को कहा? और किसके नजर से छुपाकर पढ़ाना चाहिए ? क्यों की आवारा किस्म की नजर तो हर लड़की पर होती है, फिर चाहे वो लड़की सर से लेकर पैरो तक भी क्यों ना ढकी हो।
हाल ही में ( 21 सितम्बर  ) वाराणसी के बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में एक महज 23 साल की लड़की महाविद्यलय के अपने काम से सायकल पर जा रही होती है , जहा श्याम 6 बजे के करीब कॉलेज गेट के सामने कुछ सड़क छाप लड़के उसके कपड़ो के अंदर हात डालकर उसका विनय भंग करते है , इस घिनोने अपराध के बाद वो लड़की पासके सिक्योरटी गार्ड से इसकी शिकायत करती है , लेकिन वो इसपर एक्शन लेने के बजाय उस लड़की को ही नसीहत देने लग जाता है। सिक्योरटी गार्ड का ऐसा बर्ताव करना ये बेहद शर्म की बात है। दिल को आहत करनेवाली इस घटना के बाद उस लड़की पर क्या बीती रही होगी ? उसके आत्म सन्मान को कितनी ठेस पहुची होंगी ? इसका दर्द एक नारी ही समज सकती । क्यों कि मर्दो के समाज में इस दर्द को समझने की अपेक्षा करना वैसा ही है जैसे सोने का नाटक कर रहे आदमी को नींद से जगाना ?

कुछ समय बाद थाने में इसकी एफआयआर होकर छात्रों का आंदोलन शुरू हो जाता है, जहा पुलिस कैंपस के अंदर आकर लाठी चार्ज तक करने से पीछे नई हटती । पुलिस को गर्ल्स होस्टल में आने की परमिशन किसने दी ? और प्रदर्शन कर रहे छात्राओ पर लाठी चार्ज क्यों ? प्रदर्शन करने के लिए बाहरी छात्र अंदर कैसे पहुचे ? इन सबके पहले विद्यालय प्रशासन कहा था ? इसका खुलासा होना जरूरी है ।
अब तो छात्राए भी डर के मारे BHU को छोडकर वापस अपने घर जा रही ही। इसका जिम्मेदार कौन?
इस आपबीती के बाद भारतीय परमपरा के अनुसार शुरुवात होती है हमारे राजनीती के अतिसक्रियता की । BHU-VC का कहना है कि प्रधानमंत्री का दौरा ध्यान में रखते हुए इस घटना को अंजाम दिया जा रहा जो महाविद्याल को बदनाम कर रहा है ? अब ये महाशय जो प्रशासकीय विभाग के उच्च पद पर रहते हुए भी राजनीतिक समीकरण समजाते है तो ये सामान्यों के समज से परे है । शायद 5 सितम्बर को हुए शिक्षक दिवस पर इनके सन्मान में कुछ कमी रही होंगी, जिसका खामियाजा अब इन छात्रों को विद्यालय प्रशासन की करवाई में देरी और सुरक्षा में होनेवाले नजरअंदाजसे भुगतना पड़ रहा है ।
अंत मे इस हादसे के बाद, हम कबतक ऐसे हालातो से लड़ते रहेगें ? स्त्री पुरुष समानता जमिनी स्तर पर कब आएगी । और मानसिक बदलाव आने में कितना समय लगेगा ? लड़कीयों के पहनावे पर टिपणी करवाले और कपडो को लेकर इसपर समजदारी की भाषा बोलनेवाले आखिर लड़को  के नजरिए की बात क्यों नही करते ? जरूरत है लड़को के नजरो में बदलाव लाने की और एैसे आवारा सड़कछाप लडको पर सख्त करवाई करने की ।

Pravin Patil

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