भुखमरी और आधार कार्ड

Posted by Sandeep Anand kumar
October 18, 2017

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समाज मृत हो गया है, सामाजिक जिम्मेदारी को हम हमेशा छिपाकर उसे सरकारों और संस्था के मत्थे जड़ देते है। इसमें कोई दो राय नही की इसकी दीर्घकालीन जिम्मेदारी सरकार की ही है मगर क्या
मुझे शर्म से डूब नही मरना चाहिए अगर मेरे पड़ोसी भूख से मर जाए ।
संवेदनहिता की पराकाष्ठा है कि कोई भूख से मर जाए। एक वक्त में हर परिवार एक आदमी का खाना प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कूड़े में फैक रहा है। ऐसी तस्वीर भी अगर समाज और सरकारों को झखजोर नही पाती तो ये हमारा दुर्भाग्य है कि हम इस लोकतंत्र का एक वोट मात्र बन कर रह गए है ।
लोग अनाज न मिलने से भूख से मार जा रहे है और कुछ लोग जिन्हें मिल रहा है वो दूसरे लोग इसी अनाज को 13 से 14 रुपये बाहर व्यापारियों को बेच कर पैसा ऐंठ रहे है। ये बात सत्य है इसमें हम और आप मे से कई लोग शामिल है। हम भी जिम्मेदार है । कोई भूख से क्यो मर जाता है?
क्योकि 2 ₹किलो खरीद कर 13₹ में बेचना ही भूखमरी का मूल है।
कोई डीलर को दोषी नही मान रहा है कोई सरकार को नही तो कोई अधिकारी को नही तो कोई खुद को नही।
सबकी बात मान लेते है कि किसी की गलती नही थी मगर क्या डीलर ने उस भूखी माँ की हालत पे तरस नही आया कुछ तो अपनी तरफ से ही दे देता। कुछ दिन तो उसके गुजरबसर हो जाते या उस अधिकारी के समझ मे नही आया कि इनका राशन कार्ड क्यो नही बना जो कि राइट तो फ़ूड पर निर्भर है उसका क्या होगा ये खयाल उसे एक बार भी नही आया होगा।
रही बात सरकार की क्या सरकार ये भी निगरानी नही कर पा रही है की उसका कोई नागरिक कई दिनों से भुख से मर रहा है। आजादी के 70 सालो के बाद भी किसी को भूख से मर जाना पड़े,अगर यह हालत बदलने वाले नही तो हमे सरकारे किसी योजना का लोल्लिपोप क्यो पकडाती है।
इंसान मांगने की परिस्थितियों मैं तभी आता है जब गरीबी की पराकाष्ठा को भी पार कर गया हो और खुद्दार आदमी तो भूख से मर जाएगा मगर हाथ नही फैलाएगा लेकिन खुद्दार से खुद्दार इंसान तब हाथ फैलाने को मजबूर हो जाता है जब बात उसके बच्चो की उदर पीड़ा मिटाने की हो।
एक कोशिश आगे से हम जरूर करे कि हम किसी को अपने आस पास भूखा नही मरने देंगे और उन लोगो के खिलाफ खड़े होंगे जो लोग सम्रद्ध होते हुए भी 2 रुपये में खरीद कर 14 रुपये अपना अनाज बेच देते है।
उन लोगो की मदद की कोशिश करे जिनके आधार एकाउंट राशन कार्ड से लिंक नहीं हुए है।
आज बस ये थोड़ा सा काम करने की कोशिश करे ।
कुछ नहीं करना बस लोगो से इसकी चर्चा जमीन पर करनी हैं और लोगो मे जागरूकता लानी है।

संदीप कुमार आनंद

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