भूख – गुमनाम अंधेरा

Posted by Shalini Gupta
October 19, 2017

Self-Published

भूख – गुमनाम अंधेरा

आधार ही क्या अब जीवन का अधार है
आधार ही से क्या अब जीवन का संचार है
बन्द किवाड़ो के पिछे से सुनाई पड़ती है सिसकती आहें

मैं भूख – एक प्रश्न करती हूॅ
एक चिंतित सोच मे धिर गई हूं
मुझमे और मौत में यह क्या अनोखा रिश्ता है….
ये कोलाहल कैसा ?
यह बेबसी क्यूं ?
पर क्या मेरा वजूद यही है ?
भूख से तिलमिलाती संतोषी मेरे विरह मे प्राण त्याग देती हे
उस की भात भात भात कहती जिह्वा अचानक लड़खड़ा कर खामोशियों के आंचल मे हमेशा के लिए सो जाती हे
कहीं दूर एक माॅ की ऑखो का तारा
उसी के ह्रदय को चीर खून की होली खेल
मुझे तृप्त करता है

क्यों इस देश के कार्यकर्ताओं को मैं दिखाई नहीं देती
क्यो मुझ से पीड़ित लोगों की गुम चीखें
उन के कानो में नहीं गूंजतीं
हाय ! क्यों मैं अधार बन गई हूं लाखों कि मृत्यू का

मे भूख अपना अधिकार माॅगती हुं
अधिकार की मैं भी संतुष्ठ रहुं तृप्त रहूं
मौत का अधार न बन लोगो की तुष्टि का अधार बनू…..

शालिनी गुप्ता

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.