भूख से बिलखती जिंदगी और विकास का दावा

Posted by Mukesh Singh
October 12, 2017

Self-Published

आज देश बड़ी तेजी से विकास के पथ पर चल पड़ा है। अब तो बहुत जल्द देश की पटरियों पर बुलेट ट्रेन दौड़ने वाली है। मध्यमवर्ग के लोगों का हवाई सफर का सपना भी सच हो रहा है। शहर अब समार्ट सिटी बन रहें हैं। लोगों के हाथों में अब बड़ी मोबाइलें आ गई हैं। जिससे इंटरनेट बैंकिंग और सरल हो गई है। और फिर जीएसटी की तो बात ही निराली है। इस एक कर प्रथा ने तो उद्योगपतियों की सारी परेशानियां ही समाप्त कर दी है। और यही वजह है कि सत्तारूढ़ दल और उनकी सरकार देश में चल रही है इस विकास का सारा श्रेय स्वयं लेकर अपनी पीठ खुद ही थपथपाने में लगे हुये हैं। वैसे कुछ मामलों में वे तारीफ के हकदार भी हैं। पर इन सब के बीच खुदको देश का प्रधान सेवक कहने वाले प्रधानमंत्री जी को अब देश के सबसे निचले तबके अर्थात गरीबी पायदान से नीचे के लोगों के बारे में सोचने की जरूरत है। क्योंकि अब भी इस देश की लगभग 29.5% जनसंख्या गरीबी रेखा के निचले स्तर पर जिंदगी गुजार रही है। आज भी हर साल इस देश में लाखों लोग सिर्फ भूख की वजह से मर रहें हैं। आंकड़ों की मानें तो भारत में तकरीबन 19 करोड़ लोग हर रोज भूखे पेट सोने को मजबूर हैं जबकि प्रतिदिन 3000 बच्चे भूख से मर रहें हैं। हमारे देश में बच्चों में कुपोषण और उनकी मृत्यु दर का स्तर भी बेहद चिंताजनक है। मीडिया रिपोर्टस् पर अगर भरोसा करें तो देश की आबादी के छठे हिस्से को आज भी पर्याप्त पोषक पदार्थ नहीं मिल पा रहा है। तो वहीं देशभर के लगभग 30.7 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट हैं और 58 प्रतिशत बच्चों की ग्रोथ 2 साल से कम उम्र में ही रुक जाती है। यह बड़ी चिंताजनक बात है कि हमारे देश में चार में से हर एक बच्चा कुपोषण का शिकार है। और ऐसे हालात में भी हम विकास के नाम पर झूठी डींगें हांक रहें हैं। और कंक्रीट के जंगलों को विकास बताकर उसका श्रेय लेने को हो हल्ला मचा रहें हैं।

यह अच्छी बात है कि देश में विकास की गति तेज हो रही है। जीडीपी भी पहले के मुकाबले अब अच्छी छलांग लगा रही है। किंतु इन सबके साथ हमें यह भी समझना होगा कि देश में जब आज भी 19 करोड़ लोग भूखे पेट सो रहें हैं तो हमारा विकास का दावा आज भी अधूरा है। जिस देश में करोड़ो लोग गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। जहां आज भी बड़ी संख्या में लोग भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। जिस देश में सड़क और बिजली अभी भी हर गांव तक नहीं पहुंच पाई है। उस देश के विकास के खोखले दावों पर अकड़ने वालों को जमीनी हकीकत से भी रूबरू होना चाहिये। बुलेट ट्रेन के नाम पर इतराने वाले नेताओं व कार्यकर्ताओं को अब आदिवासी बहुल, जंगल से सटे व नक्सल प्रभावित इलाकों का दौरा करना चाहिये और देखना चाहिये कि वहां की आबादी किस हाल में जी रही है। अगर विकास का वास्तविक अर्थ समझना है तो हमें झुग्गी-झोंपड़ियों का रूख करना होगा क्योंकि इन झोंपड़ियों में बसने वाले लोग भी हमारे अपने हैं। वे भी इस देश का हिस्सा हैं जो बकायदा वॉट करते हैं और देश के विकास के लिए सरकारों को चुनते हैं। किंतु सरकारें गद्दी संभालते ही उन्हें भूल जाती हैं और विकास की फुलझड़ियों में उनकी समस्याएं और जरूरतें कहीं दूर छुट जाती हैं। फिर सुर्खियों में रहने के लिए अगर कोई सरकारी योजना शुरू भी कर दी जाती है तो भी वह अधिक कारगर नहीं हो पाती और देश में गरीबों की हालत जस की तस बनीं रहती है।  जैसे मनरेगा,आवास योजना, अनुदान योजना, पेंशन आदि योजनाएं लोगों को थोड़ी राहत जरूर देते हैं लेकिन उनका जीवनस्तर सुधारने में ये योजनाएं कारगर साबित नहीं हो पा रही हैं। इतना ही नहीं बल्कि जनवितरण समेत आवास व आम लोगों से जुड़ी तमाम योजनाएं आज भी बिचौलियों के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाई हैं। इस कारण योजना के असली हकदारों तक उनका लाभ अपेक्षा के अनुरूप नहीं पहुंच पा रहा है। जिस कारण गरीबों की हालत अब भी बहुत बुरी है। और वे विकास के दावों से पूरी तरह अछूते हैं। और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ग्रामीण इलाकों में लोगों के बीच पानी के लिए हाहाकार मचना। हमारे देश में आज भी लोग नदी-नालों और कुओं का पानी पीने को विवश हैं। तो वहीं देश के कई गांवों में पानी के लिए आज भी लोगों को मीलों दूर जाना पड़ रहा है।

देश में जहां एक ओर विकास की बातें चल रहीं हैं वहीं आज भी इस देश में लगभग ढाई करोड़ परिवारों के पास रहने को अपना घर तक नहीं है। और इन करोड़ों घरों की जो आवश्यकता है उसमें से लगभग 90 फीसद आवश्यकता कमजोर और निम्न आय वर्ग के लोगों की है।  वहीं इस क्षेत्र में सरकार द्वारा जो आवासीय योजनाएं बनाई जा रहीं हैं, वे उनके रोजगार क्षेत्र से इतनी दूर हैं कि वे रोटी की जुगाड़ में इन दूर दराज के इलाकों में मकान लेने से कतरातें हैं। और यही कारण है कि जो वहनीय आवासीय योजनाओं में गरीबों के मकान बने हैं वे दूर होने के कारण या तो खाली पड़े हैं या फिर पैसे वाले लोग दूरी की परवाह किये बगैर उन मकानों को हथिया रहे हैं। जिससे विकास की मलाई बस पैसे वालों के गले उतर रही है और गरीब आज भी रोटी,कपड़ा और छत जैसे बुनियादी सुविधाओं के लिए मोहताज है।

दरासल देश में विकास के जो मॉडल चल रहें हैं वे पूंजीवादी अर्थनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिसका सीधा असर खेती और किसानी पर पड़ रहा है। मानसून की अच्छी बरसात के बावजूद खाद की उठान कम होना और किसानों की आत्महत्या में बढोत्तरी जैसी घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि पिछले चंद वर्षों में सरकारों द्वारा अपनाई गई नीतियों ने किसानों की कमर तोड़ दी है। यही कारण है कि इन नीतियों के लागू होने के बाद से लाखों किसान अपनी जान गंवा चुके हैं। और देश में तेजी से बढ़ती विकास दर इनके जीवन के मापदंडों को सुधार नहीं पाई है। देश में अब भी बहुत से ऐसे गांव हैं जहां अभी तक कोई सड़क नहीं बनाई गई है। पुलिया के अभाव में नदी-नालों में उतर कर ग्रामीणों को गांव पहुंचना पड़ता है।

इन सबसे भी बुरी हालत देश में बच्चों की है। सरकारी जनगणना के आधार पर जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत में 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और 78 लाख बच्चे ऐसे हैं जिन्हें मजबूरन बाल मजदूरी करना पड़ता है। आंकड़ों के मुताबिक बाल श्रम करने वाले कुछ 78 लाख बच्चों में 57 फीसदी लड़के हैं और बाकी 43 फीसदी लड़कियां हैं। इन आंकड़ों में बाल श्रम में शामिल बच्चों की कुल संख्या में लड़कियों का अनुपात कम होने के पीछे भारत के पुरुष प्रधान समाज का योगदान रहा है। आपको यह जानकर और हैरानी होगी कि बाल श्रमिकों में 6 साल के मासूम भी शामिल हैं। और यह बच्चे सबसे ज्यादा बीड़ी, पटाखे, माचिस, ईंटें, जूते, कांच की चूड़ियां, ताले, इत्र और फुटबॉल के कारखानों में काम करते हैं। साथ ही इन बच्चों से कालीन बनवाए जाते हैं, कढ़ाई करवाई जाती है और रेशम के कपड़े भी उन्हीं से बनवाए जाते हैं। आज बाल मजदूरी की वजह से न जाने कितने बच्चों का बचपना खत्म हो रहा है। यह समस्या धीरे-धीरे हमारे देश की नींव को खोखली कर रही है। गरीबी, लाचारी के चलते आज भी देश में लाखों ऐसे बच्चे हैं जो बाल मजदूरी के दलदल में फंसे हुए हैं। स्कूल जाने की उम्र में इन मासूमों का समय किताबों और दोस्तों के स्थान पर होटलों, घरों, कंपनियों में बर्तन धोने, झाडू-पोछा करने और मजदूरी में बीत रहा है। जो एक राष्ट्र के रूप में हमारे लिए काफी दुर्भाग्यजनक है।

अब समय आ गया है जब विकास का श्रेय लेने वाले नेताओं,राजनैतिक पार्टियों और सरकारों को देश की इस दुरवस्था की जिम्मेदारी को भी स्वीकार करना होगा। विकास को वास्तविक अर्थों में सफल बनाने के लिए इसे देश के आखरी व्यक्ति तक पहुंचाना होगा। और इसके लिए विकास का फोकस देश के गरीब इलाकों में बेहतर आय वाले रोजगार के साधन उपलब्ध कराकर गरीबी को समाप्त करने वाली रणनीति पर होना चाहिए जिससे विकास का एजेंडा और अधिक प्रभावी हो सके। क्योंकि देश में जब तक गरीबी और लाचारी रहेगी तब तक विकास के अधूरे दावों पर इतराना देश और समाज दोनों के लिए ही घातक सिद्ध होगा।

                                                              मुकेश सिंह

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