महिलाओं के सामाजिक समरसता और अभिव्यक्ति का महापर्व है –छठ पूजा -प्रत्युष प्रशांत

Posted by Prashant Pratyush
October 24, 2017

Self-Published

“चार पहर रात जल थल सेवली, सेवली चरण तोहार …”

हिंदू पञ्चांग (कैलेंडर) के कार्तिक महीने (अक्टूबर/नवंबर) में बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, नेपाल के तराई इलाकों और कई जगहों पर चार दिनों तक मनाया जाने वाला और पवित्र परंपराओं को बांधे रखने वाला महापर्व है – छठ पूजा।

वैसे तो यह पर्व वर्ष में दो बार चैत्र और कार्तिक मास में मनाया जाता है, पर तुलनात्मक रूप से अधिक प्रसिद्धी कार्तिक मास के छठ की ही है। दिवाली बीतने के बाद इस चार दिवसीय पर्व की शुरूआत हो जाती है। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से शुरू होकर ये पर्व कार्तिक शुक्ल सप्तमी के भोर की अर्घ्य देने के साथ समाप्त होता है। इस चार दिवसीय पर्व की शुरूआत “नहाय खाय” नामक एक रस्म से होती है, इसके बाद खरना, फिर सांझ की अर्घ्य व अंतत: भोर की अर्ध्य के इस पर्व का समापन हो जाता है। चार दिन के इस महापर्व में पष्ठी और सप्तमी के अर्घ्य का ही विशेष महत्व माना जाता है।

सांस्कृतिक धरोहर और अपनी परम्परा को पूरी सामाजिक संलग्नता को कायम रखने वाला यह पर्व समय के साथ प्रसार पाता गया। मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों से पूर्वांचल के इलाकों में भी यह सांस्कृतिक एकता के सूत्रता का वाहक बन गया है जो बड़े धूम-धाम और उत्साह के साथ मानाया जा रहा है। पुरुषों के आंशिक और महिलाओं की सम्पूर्ण भागीदारी के इस पर्व में सांस्कृतिक प्रसार और समय के साथ अपनी सुविधा अनुसार बदलाव भी हुए है जैसे- नदी, जल-स्त्रोत और घाटों पर अधिक भीड़ और समुचित व्यवस्था के अभाव में घरों के छतों या स्वयं निर्मित जल-कुंडों में मनाया जा रहा है। पर हमेशा से शुद्धता को अधिक महत्व देने वाला यह लोक उत्सव व्याप्त पुरोहित और उसके संकीर्ण कर्मकांडों से मुक्त रहा है इस पूजा की पूरी तैयारी और समापन में शुद्धता के अतिरिक्त कोई धार्मिक नियम-कायदे या मंत्र उच्चारण के बिना ही महिलाएं सूर्य की अराधना करती है। यहां तक की अर्ध देकर अपनी भक्ति निवेदित करने में एंव छठ पूजा में स्वयं पूजा-अर्चना में शामिल होने के लिए जातिय या धार्मिक पहचान बाधक नहीं रही है। छठ व्रत के दौरान घाटों के माहौल ज्यादा सरस, ज्यादा मनोरम और ज्यादा समतापूर्ण होने के कारण ही यह सभी जातियों और धर्म के बीच सर्वमान्य रूप से लोकप्रिय और स्वीकार्य है। यह स्वीकार्यता इस हद तक है व्रर्त में शामिल नहीं होने वाला जनसमान्य में भी समर्पण भाव सहज पैदा हो जाता है। हालांकि सीमित रूप में इस महापर्व में कर्मकांड अपनी जगह बना रहा है।

जाहिर है कि छोटे-मोटे बदलावों के बाद भी इस महापर्व में सामाजिक संलग्नता में कोई कमी नहीं आई है। इस सांस्कृतिक उत्सव में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी नायाब रूप देखने को मिलती है, जो सामाजिक समरसता के साथ-साथ समाज की अर्थव्यवस्था को भी गतिशील बनाता है। पूजा की सामग्रीयां भी जातिगत के दायरे से मुक्त होकर इकठ्ठा की जाती है मसलन, मिट्टी का चूल्हा, पूजा की टोकरी, डगरा, सूप, मिट्टी के बने हाथी, मिट्टी का कोहा, अर्घ्य का दूध उन फलों का भी चढ़ावा जो मौसमी फसल चक्र में इसी समय उपजते है जैसे सिंघाड़े का फल, डाब नीबूं, गन्ना, ओल, मूली, नारियल, केड़ाव, अदरक, अलूवा सभी स्वीकार कर लिए जाते है सभी पूजन सामग्री दूसरे समुदायों के यहां से इकठ्ठी की जाती है जो घर में आकर पूजा के दायरे में शुद्धता से नियंत्रित हो जाती है। जाहिर है सामाजिक समरता के साथ ही साथ देशज अर्थव्यस्था को भी सहज गतिशीलता प्रदान करना है क्योंकि आस्था के महापर्व में समाज की क्रय-विक्रय शक्ति पूजा सामग्री इकठ्ठा करने में चलयमान हो जाती है जिसका फायदा समाज के हर जमात को होता है।

इन सबों से विलग इस सांस्कृतिक लोक आस्था का अलहदा पहलू यह भी है कि यह पर्व हर जाति, धर्म और वर्ग की महिलाओं की सम्पूर्ण भागीदारी उनके अस्तित्व को वह अवसर उपलब्ध कराता है जिसमें महिलाएं घर के दायरे से बाहर स्वयं को सामूहिक और धार्मिक रूप से अभिव्यक्त करती है। सार्वजनिक स्पेस में महिलाओं की इस तरह की भागीदारी अन्य किसी धार्मिक आयोजनों में देखने को नहीं मिलती है। जाहिर है कि वर्चस्वशाली परिस्थितियों में छठ पूजा जाति एंव धर्म के दायरों को तोड़ते हुए महिलाओं के लिए एक आशिंक स्पेस का निमार्ण करती है जो सामाजिक समरसता को बनाए रखने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के गतिशीलता में महिलाओं के सहयोग की महत्ता को भी स्थापित करता है। जो समकालीन दौर में सामाजिक सौहार्दं का बेमिसाल उदाहरण समाज और देश को देता है। अफसोस है कि समाज, देश-दुनिया महिलाओं के इन बहूमूल्य योगदानों को तरजीह नहीं के बराबर दे पाता है। जरूरत इस बात कि है कि सामाजिक समरसता और देशज अर्थव्यवस्था को गतीशील बनाये रखने में महिलाओं की भूमिका को स्वीकार किया जाए। जिस सांस्कृतिक उत्सवों में महिलाओं की महत्ती भूमिका निजी दायरे में सिमट कर न रह जाए।

खरना के दिन गुड़ की खीर, ठेकुआ, पंजरी, मौसमी फल और पारन के बाद गदौली की सब्जी आपसी मेल-जोल, जल स्त्रोत और घाटों पर आस्था के उत्सव में यह पर्व परिवार और समाज में कई मूल्यों को स्थापित करता देता है जिसकी व्यापकता के कारण इसका कुछ ज्यादा ही असर जनसमान्य के व्यक्तित्व पर पड़ता है।

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