मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए सरकार

Posted by Satyam Dwivedi
October 21, 2017

Self-Published

हाल ही में एक 26 वर्षीय पूर्व आई.आई.टी. छात्र ने 23वी मंजिल से कूदकर खुदकुशी कर ली, जिसकी वजह बताई जा रही है डिप्रेशन यानी अवसाद।
यद्यपि भारत एक युवाओं का देश जरूर है लेकिन अच्छे भविष्य की चाह में अधिकांश युवा इतने तनावग्रस्त हो जाते है कि वो खुदकुशी का रास्ता चुनकर अपनी जीवन समाप्त कर लेते हैं। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2014 में खुदकुशी काे राष्ट्रीय औसत एक लाख आबादी पर 10.6% आत्महत्याएँ थीं, जो कि बेहद ही चिंताजनक स्थिति है।
अभी तक भारत में मानसिक रोगियों की सँख्या के बारे में कोई भी आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। यह अनुमानित है कि 2005 तक भारत में 6-7% जनसंख्या मानसिक रोग का शिकार थी तथा 1-2% जनसंख्या गंभीर मानसिक रोगों यानि द्विध्रुवीय विकार से ग्रस्त थी। जबकि 5% जनसंख्या सामान्य मानसिक विकारों जैसे अवसाद तथा चिंता से ग्रस्त है। लेकिन संभव यह भी है कि मानसिक रोगियों की संख्या इससे ज्यादा हो क्योंकि भारत में मानसिक रोगों को सामाजिक कलंक की तरह देखा जाता है और यह बीमारियाँ अज्ञात ही रह जाती हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही में यह माना है कि हर चार में से एक व्यक्ति कभी न कभी अपने जीवन में मानसिक समस्याओं से गुजरता है। आवश्यक है कि हर अभिवावक अपने बच्चों पर कड़ी निगरानी रखें क्योंकि आजकल सोशल मीडिया के बढ़ते प्रयोग ने किशोरों एवं युवाओं कोे अकेलेपन की तरफ ढकेल दिया है और यही अकेलापन उन्हें मानसिक समस्याओं से ग्रसित कर देता है। इसके अलावा स्कूली स्तर पर भी एक काउंसलर की नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए ताकि समय-समय पर बच्चों की मनोदशा को समझा जा सके और उसका समय पर निदान किया जा सके।
इसके साथ ही सरकार को समय-समय पर मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करते रहना चाहिए ताकि लोग मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो एवं मानसिक स्वास्थ्य को अनिवार्य रूप से पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बनाना चाहिए ताकि विद्यार्थी वर्ग भी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो सके।

सत्यम द्विवेदी, 20
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
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