राष्ट्रवाद और सामाजिक सद्भाव का विकास

Posted by shivansh singh
October 30, 2017

Self-Published

विषुवत रेखा का वासी जो जीता है नित हांफ हांफ कर

वह भी अपनी मातृभूमि पर रखता है अनुराग अलोकिक

राष्ट्रवाद नामक शब्द जो की मानव के उच्च्तम आदर्शो सत्यम, शिवम्, सुन्दरम पर आधारित है उसके माध्यम से समाज को हीरे की तरह तराशा जा सकता है| अगर राष्ट्र की संकल्पना की जाए तो हम कह सकते है की जब किसी निर्दिष्ट भोगोलिक सीमा के अंतर्गत हम अपने पारस्परिक भेदभावों को भूल कर समूहीकरण की भावना से प्रेरित होकर एकता के बंधन में बंध जाते है तो उसे राष्ट्र के नाम से पुकारा जाता है|परन्तु खेद है की ये सोच आज के समाज से परे है|जर्मनी और इटली के एकीकरण की कहानी सामने होते हुए भी हम राष्ट्रवाद नामक शब्द के जादू से वंचित हैं |राष्ट्रवाद का अर्थ नारे लगाने और दिखावे से नही है बल्कि राष्ट्रवाद का अर्थ दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों से जाना जा सकता है – जीए तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,मरे तो गैरों की गलियों में गुलमोहर के लिए | एक बार मैं शब्द को हम में तब्दील करना,जात -पात का भेद समाप्त कर हर किसी को भ्राता,वृद्धों को माँ बाप के सामान मानना और महिलाओं का सम्मान ही सच्चे अर्थों में राष्ट्रवाद है | प्रश्न है कि राष्ट्रवाद समाप्त हो गया है और कैसे प्राप्त होगा तो उत्तर है की राष्ट्रवाद व्याप्त है इंसानियत में ,इंसान बनो राष्ट्रवाद भी स्थापित होगा और समाज के सद्भाव का विकास भी होगा|परन्तु यह समझना भी जायज है की समाज के तराजू में गरीबी का बोझ भी है और जिसके कारण यह बात कही जा सकती है की गरीबी से बड़ा कोई राष्ट्रवाद नहीं होता ,कमीज ना होने पर पाव से पेट ढकने वालों के लिए राजस्व पहले आता है न की राष्ट्रवाद पर क्या आपने सोचा है की यह स्थिति उत्पन्न क्यों हुई है,इसका प्रमुख कारण है राष्ट्रवाद की कमी,मैं शब्द का हावी होना और देश में भ्रष्टाचार होना |आज भ्रष्टाचार की ही देन है की गरीबों को उनके हक़ का पैसा नहीं मिलता और भूक सब पर हावी होती है |यकीन मानिये आज अगर  महामना यानी प्रदीप्त बुद्धि उदार ह्रदय की भावना लोगों में प्रज्वलित हो जाए तो बात कुछ और होगी |अंत  में इतना ही कह सकते है की शुरुवात हर किसी को अपने से ही करनी होगी इस सोच के साथ की –

हो गयी है पीर पर्वत सी ,पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए ||

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