श्रद्धा या विश्वास किसी से पूंछकर नहीं की जाती – अनीश कुमार (शोध छात्र)

Posted by अनीश कुमार
October 8, 2017

Self-Published

किसी व्यक्ति या मनुष्य का सबसे संवेदनशील पक्ष आस्था या विश्वास होता है । मानवीय संबंध इसी विश्वास या आस्था पर खड़े होते हैं । श्रद्धा रखना मानवीय गुणों में सर्वोच्च प्रवृत्ति होती है । हम श्रद्धा किसी पर भी रख सकते हैं । श्रद्धा होने के लिए जरूरी नहीं कि सामने वाले सजीव हो या निर्जीव । कभी-कभी हमारा सबसे पालतू कोई जानवर या पशु भी हमारे प्रति इतना श्रद्धावान हो जाता है कि वह हमसे परे हो ही नहीं सकता । यही श्रद्धा आगे चलकर आस्था का नाम ले लेती है । हालांकि श्रद्धा, विश्वास, आस्था, वफादारी लगभग पर्याय माने जाते हैं । आस्था मनुष्य का मनुष्य के प्रति कट्टरता का भावबोध कराती है । मनुष्य स्वभावतः किसी न किसी के प्रति आस्थावान होता ही है । आज के समय में धर्म मनुष्य के सबसे निकट है । ईश्वर के प्रति आस्था सबसे ऊपर हो गई है । धीरे-धीरे मनुष्य आस्था के प्रति इतना कट्टर हो जाता है कि उसके बारे किसी भी प्रकार की गलत खबरें या उसकी आलोचना सुनना पसंद नहीं करता । धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति हिंसा का रूप धरण कर लेती है । यह प्रवृत्ति आगे चलकर वैश्विक स्तर पर पहुँच जाता है ।

भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता की वकालत करता है । यही विशेषता भारत को दुनिया से अलग करता है । भारत में सभी धर्मों, संप्रदायों को समान अधिकार व महत्व दिया गया है । बावजूद इसके वर्तमान समय में देखें तो दूसरों के आस्था के साथ खिलवाड़ जमकर हो रहा है । समस्या तब ज्यादा भयावह हो जाती है जब मनुष्य दूसरों की आस्था के साथ खिलवाड़ करना शुरू करता है । इनमें सोशल मीडिया अपर प्रसारित खबरें इस परकर के मुद्दों में आग में घी डालने का काम करती हैं । बरहाल मीडिया से ये हमेशा यह अपेक्षा की जाती रही है कि वह खबरों को या इन मुद्दों को निष्पक्ष भाव से कहेगा या दिखाएगा किन्तु स्थिति आज इसके उलट दिखाई देती है । ज़्यादातर मीडिया तो कारपोरेट घरानों या रईसों के अंडर में काम कर रहे हैं, जो स्वतंत्र रूप से इस पर कार्य भी कर रहे हैं तो उन्हें आस्था के नाम पर डरा-धमकाकर चुप करा दिया जाता है ।

अंत में एक बात समझ में यह नहीं आती की मनुष्य अपने आस्था या श्रद्धा के साथ इतना वफादार होता है तो दूसरे की आस्था को ठेस क्यूँ पहुंचाता है । मिथकीय इतिहास को लेकर ये सब सिर्फ हिंसा को जन्म दे रही हैं । वास्तविकता से इसका कितना संबंध है ये भी बुद्धिजीवी लोग भलीभाँति जानते हैं । कभी-कभी राजनीति भी इसमें मिलकर रोटियाँ सेंक लेती है । सरकारी तंत्र तो इसका पूरा फायदा उठाता ही है ।

॥ जोहार ॥ जय संविधान ॥

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