समकालीनता व साहित्य का परिप्रेक्ष्य

Posted by अनीश कुमार
October 2, 2017

Self-Published

समकालीनता व साहित्य का परिप्रेक्ष्य

राष्ट्र की परिभाषा किसी बंधन व स्वतन्त्रता से परे होती है । जिस प्रकार कोई बालक अपने माँ-बाप के सबसे नजदीक रहते हैं । वहीं माँ-बाप उस उस बालक के प्रथम गुरु व अन्य भूमिकाओं में सबसे पहले आते हैं । माँ-बाप उसकी पूरी दुनिया के समान होते हैं । राष्ट्र उस देश में रहने वालों के किए माँ-बाप के समान होता है । माँ-बाप कभी अपने बच्चों के बीच असमानता का भाव नहीं लाते हैं । उसी प्रकार कोई भी राष्ट्र कभी भी किसी व्यक्ति से अलग नहीं हो सकता है । उसकी दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं । राष्ट्र हमारे सामने कई रूपों में सामने आता है । जैसे प्रकृति, जल, जमीन, हवा या अन्य रूपों में । ये सारी चीजें कभी भी कसीस के साथ भेदभाव नहीं करती हैं ।

राष्ट्र के निर्माण में सभी मनुष्यों की अपनी-अपनी भूमिका अलग-अलग रूपण में सामने आती है । किसी राष्ट्र का गौरव उस राष्ट्र में निवास करने वाली समस्त जनता के संपूर्णता व एकता तथा अखंडता पर निर्भर करता है । पिछले कुछ महीनों से राष्ट्रवाद पर एक बहस छिदी हुई है । भिन्न-भिन्न लोगों के भिन्न-भिन्न मत हैं । कुछ लोग सतही ज्ञान के द्वारा दिशाहीन व्याख्या करने में लगे हुए हैं । मनुष्यों के राष्ट्र की सीमा व गौरव सर्वोपरि होता है । आज के समय में राष्ट्रवाद कई रूपण में बादल गया है । जैसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भाषाई राष्ट्रवाद, साहित्यिक राष्ट्रवाद, राजनैतिक राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय राष्ट्रवाद इत्यादि ।

इसी बीच शिक्षा के विभिन्न संस्थानों में एक नए प्रकार की बहस व मुद्दा हमारे सामने दिखाई दे रहा है । इसकी गूंज धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं । इसे हम शैक्षिक राष्ट्रवाद का नाम दें तो बेमानी न होगी । पिछले कई वर्षों में विश्वविद्यालय व अन्य शैक्षिक संस्थानों में इसकी चर्चा व उसका असर देखने को मिल रहा है । भिन्न-भिन्न क्षेत्रों व भाषा प्रदेशों के विद्यार्थी या शोधार्थी इस पर एकमत नहीं दिखाई दे रहे हैं । इसे राजनीति से जोड़कर देखने की कवायद जारी है । राष्ट्र के भीतर रहते हुए हम बिना राजनीति के ऊपर बात किए रह ही नहीं सकते । आज शैक्षिक संस्थानों में राजनीतिक मुद्दों व समकालीन मुद्दों को लेकर परिचर्चाएं व संगोष्ठियाँ आयोजित की जा रही हैं । किसी ने तो यह भी कह दिया कि आज विश्वविद्यालय के छात्र सरकार के साथ विपक्ष कि भूमिका निभा रहे हैं ।

इन सभी क्षेत्रों में हिन्दी पत्रकारिता का भी महत्वपूर्ण योगदान है । पत्रकारिता अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम होता है । कहा भी जाता है कि जब आपकी बात कोई न सुने तो पत्र या अखबार निकालो । भारतीय संविधान के अनुसार सभी को अखबार, पत्र-पत्रिकाए निकालने व अपनी बात कहने का अधिकार पूरा अधिकार है । हम अतीत में जाकर देखें तो पत्रकारिता का असर व्यापक तौर पर दिखाई देता है । सभी बड़े क्रांतिकारियों ने अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समाज में क्रांति लाने का कार्य कर रहे थे ।

“हो सकता है आप में

प्रतिभा दूसरों से कम हो

पर हार न मानने की सोच

आपको उनसे अलग बनाती है ।”

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.