साइकिल, सड़क और प्यार

Posted by Chandrakant Shukla
October 26, 2017

Self-Published

 

अब साइकिल लिख दिया है तो कुछेक तो कहेंगे कि ‘तुम ससुर हो हि सपाई’… लेकिन ऐसा कुछ है ही नहीं, मैं सिर्फ प्यार मोहब्बत की ही बात कर रहा हूं.. आज जब प्यार व्हाट्सएप के लास्ट सीन, फेसबुक के लाइक, इंस्टाग्राम के पाउट पोज़ में कहीं उलझा सा हो… अपने बॉयफ्रेंड के साथ चिली पनीर खाते हुए लड़की बोले- कि ओ बाबू, ये तो बहुत तीखा है, और बाबू बोले कि बेबी-बेबी पानी पी लो… तो लगता है कि साला गजब का इश्क है, जो चिली पनीर और चिल्ड वॉटर के बीच ही झूल रहा है । फोन रखते वक्त लव यू ना बोलो तो दिक्कत, व्हाट्सएप पर लड़की फोटो भेजे और लड़का होंठो पर दिल रखा इमोजी ना भेजे तो दिक्कत.. मतलब चल क्या रहा है बे.. ? ऐसा नहीं है कि मैं प्रेम पत्र वाले मधुर प्रेम की बात कर रहा हूं, ना कतई नहीं… लेकिन आज कल इश्क वाला लव भी मेरे समझ नहीं आता, और हां ऐसा नहीं है कि प्यार सिर्फ लड़का और लड़की के बीच होता है.. उनसे जुड़ी हर चीज़ के बीच भी इश्क होता है, कनेक्शन होता है… आज यूं ही कमरे में लेटा था, सिर के नीचे मुड़ा हुआ तकिया लगा हुआ था.. और आंखें कमरे में चल रहे पंखे को देख रही थीं.. तो याद आया कि अमां हमको भी तो एक ज़माने में प्यार हुआ था, उस दौरे में जब हम एक हल्का फुल्का सा बैग लेकर स्कूल जाते थे, पहले तो बेमन जाते थे लेकिन जब किसी की आंखों में खुद को देख लिया था… तो 100 परसेंट अटेंडेंस वाले स्टूडेंट भी हम ही थे.. पढ़ाकू तो हम घंटा नहीं थे । बस उतना पढ़ लेते थे जितने में हमारी प्रिसिंपल के सामने पैरेंट्स की पेशी ना हो । स्कूल जाते थे साइकिल से, आज की तरह नहीं कि हाईस्कूल की लड़की भी ‘व्हाय शुड बॉयज़ हैव ऑल द फन’ कहते हुए स्कूटी से फर्राटा भरके जाती है । हम जाते थे साइकिल से, और हमारी जो वो थीं वो आती थीं पइंया-पइंया, काहे से बगलेहे में रहती थीं स्कूल के, और हम उनके घर के पास लगे ट्रॉन्सफॉर्मर के पास इस हिसाब से छिपते थे कि उनके बप्पा-मम्मी ना देख लें, फिर जब वो आती थीं.. तो धीरे-धीरे चलते थे और जब देख लेते थे कि स्पीड ज्यादा हो रही है और मोहतरमा पीछे छूट गई हैं.. तो साइकिल की चेन जो चार पांच बार उल्टा पैडल मार देव तो उतर जाती थी, ये ही जुगाड़ करके रुक जाते थे.. फिर जब मैडम आगे निकल जाती थी, तो उनके बगल से तेजी से साइकिल निकाल के चले जाते थे, उस वक्त साइकिल से कलाबाज़ियां दिखाना हर लड़के का पहला शौक हुआ करता था, लगता था कि हाथ छोड़ के साइकिल चला देव तो वो स्टाइल है.. और मैडम खुश होंगी.. लेकिन असल में सब था अखंड चूतियापा… जो मुझे लगता है कि हम सबने किया होगा । अच्छा कुछ सहेलियां मैडम की ऐसी थी जो सिक्योरिटी के मामले में एसपीजी को फेल कर देती थीं.. खुद साइकिल से आती थी लेकिन साइकिल से उतर के हमारी मैडम के साथ पैदल उनके घर तक जाती थीं.. कि कहीं हम बात ना कर लें, उनसे.. और स्कूल के टीचर्स बड़े वाले क्रांतिकारी, जो स्कूल के गेट से 100 मीटर दूर आकर खड़े हो जाते थे, अब मैडम का घर स्कूल से बमुश्किल 300 मीटर दूर उस पर भी इतने पहरे, प्रपोज का घंटा करते हम… स्कूल में भी मैडम हमारी क्लास में नहीं थी, तो समझ लेव कि कितनी दिक्कत वाला प्यार था हमारा… एक दिन का किस्सा बताते हैं… हंसेव तो समझ लियो कट्टी है तुमसे… ठंड के दिनों में नहाना, सियाचिन पर जाने जैसा था, तो हमने तय किया कि स्कूल नहीं जाएंगे.. लेकिन एक मित्र की सुबह सुबह साइकिल हो गई पंचर बोले यार आज बाइक से स्कूल छोड़ दो, हमको लगा चलो इसी बहाने शायद मैडम दिख जाएं.. गए स्कूल, मैडम भी दिखीं, लेकिन मोहतरमा ने एक गलती कर दी कि वो मुस्कुरा दिहिन, फिर का था, हम जल्दी घर गए… डियो वियो मार के, बालों में हेयरजेल कायदे से पेल के साइकिल उछालते-फंदाते-कुदाते हम स्कूल पहुंच गए.. हम सोच रहे थे कि आज तो पक्का इम्प्रेस… और मैडम थोड़ा और मुस्कुरा दी थीं.. तो लगा कि बस आजा स्कूल आना सार्थक.. एक बात और जिस दिन मैडम स्कूल नहीं आती थीं.. उस दिन वक्त काटना कितना मुश्किल होता था.. ये तो हम लिखकर बता ही नहीं सकते, लेकिन छुट्टी के वक्त मैडम अपने गेट पर ज़रूर मिल जाती थीं… तो दिन भर की उदासी दूर हो जाती थी… इस पूरे कालखंड में हमारी साइकिल ने बड़ा साथ दिया, बाइक तो बेवफा थी.. अक्सर उन्हीं के घर के सामने बंद होती थी और फिर घंटों में स्टार्ट होती थी… हमारी साइकिल को भी उनके घर के सामने वाली सड़क से इश्क था.. ना चाहते हुए भी हमको दिन में एक आध बार वहां जरूर घुमा लाती थी, सपना तो बस इतना सा था कि अपनी मैडम को साइकिल में आगे बिठाकर कहीं बढ़िया सी जगह की सैर करवा दें… बाइक पर तो मैडम बैठीं.. लेकिन मेरी साइकिल का ये सपना अधूरा रह गया.. जिसका हमको बहुत बड़ा मलाल भी है, बाकी प्यार के गवाह तो खत भी हैं और एक नहीं कई हैं.. खतों की कहानी फिर कभी बताऊंगा फुर्सत से.. आज साइकिल की याद आई तो उसकी बात कर ली… और मेरा इतना साथ देने, मेरे इश्क को परवान देने के लिए मेरी साइकिल को दिल से थैंक्यू… अगर आपके इश्क में आपकी साइकिल ने भी आपका साथ दिया है… तो इस पोस्ट को शेयर करके अपनी साइकिल को धन्यवाद देना ना भूलें..
चन्द्रकान्त शुक्ला, उन्नाव वाले

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