दो अलग अलग लोकतंत्र

Self-Published

लोकतंत्र या जमुहरियत का सबसे मजबूत पायदान अगर किसे कह सकते है तो वह है बोलने की आजादी, जँहा हम किसी भी प्रकार के वाद विवाद पर अपनी राय बेझिझक रख सके और लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद भी इसी से होती है जँहा आपकी राय से जरूरी नही हर कोई सहमत हो लेकिन एक अमीर समाज में आप को अपनी बात कहने का उचित माहौल दिया जाता है. कहने को तो हम भी एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन पूंजीवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद से किस तरह हमारी बोलने की आजादी का गमन कर दिया जाता है, ये हम सब जानते है वही लोकतंत्र का सबसे मजबूत हथियार चुनावी प्रक्रिया में किस तरह वोट का धुविकरण किया जाता है इस से भी हम वाकिफ है, अगर सच कहा जाये तो हमारे यँहा संख्या का लोकतंत्र है, ये सारा नंबर का खेल है जँहा धर्म, जातिवाद, क्षेत्रवाद अपना असर दिखाते है.

लेकिन अगर पश्चिम के देशों को देखै खासकर यूरोप, कनाडा, अमेरिका, इत्यादि यँहा भी हमारी तरह लोकतंत्र व्यवस्था की प्रणाली मौजूद है जँहा जनता द्वारा, जनता की सरकार का चुनाव होता है लेकिन अगर पश्चिम देशो के लोकतंत्र और हमारे देश के लोकतंत्र की तुलना करें तो सबसे बड़ा फर्क नजर आता है वह बोलने की आजादी, सरकार की आलोचना की आजादी और उस से सर्वपरि सरकारी व्यवस्था के काम काज की जनता के प्रति पारदर्शिता. इन देशो में प्रेस, मीडिया पूर्णतः आजाद है और यँहा समय समय पर सरकार की आलोचना होती है, वही स्वतंत्र  लिखी किताबो से भी एक आम नागरिक अपनी आजाद अभिव्यक्ति का अहसास भी करवाता है, लेकिन इन देशों में डॉक्यूमेंट्री ओर फिल्म के माध्यमो से भी, कई सरकारी फैसलो की आलोचना की जाती है. उदाहरण के तौर पर खाड़ी देश खासकर इराक पर जब अमेरिका और उसके सहयोगी यूरोपीय देशो ने मिलकर युद्ध का ऐलान किया था, तो इन्ही देशो के भीतर इन्ही की जनता ने इस युद्ध का जमकर विरोध किया था.

वही, पारदर्शिता के संदर्भ में अमूमन अमेरिका, कनाडा, यरोप के देश, लगभग सभी लोकतांत्रिक देश एक तय सीमा के बाद अमूमन सभी सरकारी कागजो फिर वह चाहे आम हो या अति स्वदेनशील इन सभी दस्तवेजो को सार्वजनिक कर देते है जिस से सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता आम जनता में बनी रहती है, लेकिन इस पारदर्शिता के साथ जनता को इस तथ्य का अहसास होता है की लोकतंत्र में जनता ही सबसे सर्वपरि है. ओर इसी पारदर्शिता के नियम के चलते सरकारी काम काज भी हर फैसला बहुत ही जिम्मेदारी से करता है, जँहा पारदर्शिता के नियम के कारण, अक्सर हर सरकारी फैसले में जनता की मौजूदगी का अहसास हर खास को होता है.

लेकिन, इसी संदर्भ में अगर हम भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण दे, तो यँहा सरकारी व्यवस्था में जनता के पारदर्शिता का बहुत बड़ा अभाव है, खासकर सवेदनशील मामलो में जँहा अक्सर देश की अखंडता का हवाला देकर, जनता को सरकारी फैसलो से अवगत ही नही करवाया जाता. वही व्यक्तिगत रूप से 70 साल की आजादी में जँहा हमारा फिल्म उधोग इतना फला फुला है वँहा भी सरकारी व्यवस्था की आलोचना, एक तय सीमा से आगे जाकर नही की जा सकती और अगर कोई फिल्मकार इतना साहस करता भी है मसलन मणिरत्नम की फ़िल्म बॉम्बे, तो सेंसर बोर्ड से लेकर अदालत तक, इस आवाज को रोकने की पूरी कोशिश की जाती है, शायद यही वजह है की हमारे देश में आजाद फिल्मकार आलोचक फ़िल्म या डॉक्यूमेंट्री बनाने का साहस नही जुटा पाते, क्योकि अगर किसी भी तरह से फ़िल्म पर रोक लगा दी जाती है जिसके कारण फिल्मकार को बहुत बड़े आर्थिक घाटे से झूझना पड़ सकता है.

लेकिन आज यँहा लोकतंत्र पर एक आजाद छवि बाधने का मेरा एक व्यक्तिगत कारण भी है, आज कनाडा की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी ने सिख राजनीतिक और कनाडा में अभी बटोर सांसद, देश की संसद में मौजूद सरदार जगमीत सिंह को अपना नेता चुन लिया है, चुनावी प्रक्रिया द्वारा सिंह को 53% से कुछ ज्यादा पार्टी के कार्यकर्ताओं ने चुना वही बाकी के तीन प्रतिद्वंदी, मतो की संख्या में इनके आस पास भी नही दिखायी दिये, अभी फिलहाल न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी कनाडा की संसद में मुख्य विपक्षी दल है और ऐसे कयास लगाये जा रहे है की अगले चुनाव में सिंह, पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हो सकते है.

अगर, इस घटना का थोड़ा सा भी अध्धयन करे तो ये चुनाव अपने आप में विशेष है क्योंकि कुछ।लाख की आबादी वाले सिख समुदाय, कनाडा में भी अल्पसंख्यक समुदाय है वँहा इस तरह एक सिख का चुनाव किसी पार्टी के सर्वपरि पद के लिये होना, अपने आप में विशेष है, जँहा काबिलयत के आधार पर हो रहा चुनाव, एक अमीर लोकतंत्र की बुनियाद रखता है, वही अगर इसी संदर्भ में हम हमारे देश की राजनीती देखै, खासकर प्रांत के चुनावो का विश्लेषण करें तो, अक्सर प्रांत का मुख्यमंत्री उसी प्रदेश के एक अमीर समाज से होता है, मसलन कश्मीर में एक मुस्लिम मुख्यमंत्री ही होगा तो पंजाब में एक सिख, खासकर जट समुदाय से ही मुख्यमंत्री चुना जायेगा, वही बाकी के सभी प्रांत में जँहा हिंदू समाज बहुसंख्यक है वहाँ अक्सर एक उच्च जाति के हिंदू नागरिक का ही मुख्यमंत्री बनना तय होता है, इस दृष्टिकोण से हम कह सकते है की हमारे समाज के पिछड़े ओर गरीब वर्ग को कभी भी सत्ता में अहम भूमिका नही दी जायेगी, मसलन हमारा लोकतंत्र जो चुनाव द्वारा सत्ता का रास्ता खोलता है वहाँ पूंजीवाद, जातिवाद ओर क्षेत्रवाद का ही पहरा है ओर इसी दृष्टिकोण से चुनाव में वोट का धुर्वीकरण होता है तो कही भी गलत नही होगा.

अंत में, इस साल के शुरूआत में पंजाब में विधानसभा के चुनाव हुये थे जँहा प्रवासी पंजाबी नागरिक ने इस चुनाव में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था और बादल परिवार से ओर कांग्रेस की राजनीती से अलग, आम आदमी पार्टी पर अपना पूरी जोर आजमाइश की थी लेकिन चुनावी नतीजो ने कांग्रेस को पूर्ण बहुमत से पंजाब विधानसभा में अपने दम पर सरकार बनाने के लिये हामी भर दी थी, कांग्रेस के चुनावी वादों में पंजाब के नोजवान को नशे से मुक्ति।दिलाने के लिये ओर नशे के कारोबार में।मौजूद सभी गुन्हेगारो को सख्त से सख्त कानूनी सजा दिलवाना, ये दोनों मुद्दे अहम थे लेकिन आज जब सरकार को बने हुये लगभग 6 महीने का समय हो गया है तब एक तस्वीर ने पंजाब के सभी नागरिकों को सोचने के लिये मजबूर कर दिया है की क्या चुनाव सिर्फ वादों तक ही सीमित है ? ये तस्वीर 24 साल के एक नोजवान की है जो नशे की चपत में बुरी तरह से फस चुका है और जब नोजवान के पिता ने पुलिस में नशे तस्करो के खिलाफ शिकायत लिखाई जँहा उन सभी नशे तशकरो का नाम भी बताया गया जँहा से इनका नोजवान बेटा नशे खरीदता है, फिर भी पुलिस किसी भी तरह की कार्यवाही करने में असमर्थ दिखाई दे रही है वही नशे के तस्कर खुलेआम नशा बेच रहे है, आखिर में जब कोई उपाय नही बचा तब मजबूर बाप ने अपने ही बेटे को अपने ही घर में लोहे की चैन से बांधकर कैदी बना दिया. यँहा सोचने की जरूरत है की इस नोजवान का गुन्हेगार कोन है ? उसका अपना पिता, या वो पुलिस जी नशे के तशकरो को पकड़ने में असमर्थ है या हमारी सरकारी व्यवस्था जिसे हम खुद चुनाव के द्वारा चुनते है, कही हमारे देश के लोकतंत्र का मतलब ये तो नही की चुनाव के वादे बस वादे ही रह जाते है, जँहा जनता को अगले पांच वर्षों के लिये उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है, आज जिस तरह से ये नोजवान को अपने ही घर में कैदी बनाया गया है ये हालात पंजाब के हर गावँ के है, ऐसे बत्तर हालात।में हम सोच सकते है बोलने की आजादी तो दूर की ही बात है, आज हमारा घर हमारी कैद बन रहा है, हमारी विचारधारा एक दायरे तक ही सीमित होती जा रही है, यँहा सोचने की जरूरत है की हमारे देश का लोकतंत्र किस दिशा।में बढ़ रहा है और निकट भविष्य में इसके अंजाम क्या होंगे ?

आज कनाडा में जगमीत सिंह को एक राष्ट्रीय पार्टी अपना।मुख्य उम्मीदवार नियुक्त कर रही है वही हमारे देश में नशे के चलते नोजवान को अपने ही घर पर बंदी बना लिया जाता है, ये महज दो देशों की अलग अलग घटनाये नही है, यँहा दोनों ही देश लोकतांत्रिक है लेकिन एक जगह जिंदगी आजाद है वही दूसरी तरफ जिंदगी को।कैद किया जा रहा है, हमें सोचना होगा ऐसा क्यों है और साथ साथ ही उन कारणों को भी तराशना होगा जिस से एक पूर्ण लोकतंत्र के रूप में हमारे देश की छवि का उभार नही होता.

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.