2002 के दंगे और गुजरात में मोदी का उदय, मैंने दोनों करीब से देखा है

2001, के आखिर में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बन चुके थे लेकिन अपनी ज़मीनी सियासत की नामौजूदगी के चलते, ये गुजरात राज्य में अपनी पहचान बनाने में लगे हुए थे और इसी तरह राजनीतिक लोगो से भी इनकी सार्वजनिक मुलाकात में शालीनता की पहचान थी कही भी किसी भी तरह से विवाद से बचने की कोशिश की जा रही थी, ये अक्सर अपने से बड़े उम्रदराज नेता के पैर छूते हुए नज़र आते थे इनमें केशुभाई पटेल भी शामिल थे। मैंने पहली बार नरेंद्र मोदी को 2001 में ही अहमदाबाद  में गुरुनानक जयंती के दौरान गुरुद्वारा साहिब में देखा था जहां ये सिख समुदाय को गुरु पूरब की बधाई देने आए थे और अपने बधाई संदेश में इन्होंने बादल परिवार के साथ अपने मधुर रिश्ते का वर्णन भी किया था। शब्दों में सरलता, शालीनता, जज़्बात, सूझबूझ का पूरा प्रमाण दिया था।

साल 2001, में आए भूकंप के कारण, यहां हिंदू-मुसलमान दोनों समुदाय एक-दूसरे की सहायता करने में लगे हुए थे। वैसे, गुजरात के इतिहास में साम्प्रदायिक दंगों का अलग ही इतिहास रहा है। मैं भी इसका गवाह रहा हूं, बचपन में बांह टूट जाने से, अहमदाबाद के पुराने शहर में इलाज के बाद मैं मेरे माता-पिता के साथ रिक्शे में आ रहा था तभी एक समुदाय के दंगाइयों का गुट हथियारों से लैस होकर हमारा पीछा कर रहा था लेकिन रिक्शा चालक की सूझबूझ से हम बच गएं।

26 फरवरी 2002, गुजरात के गोधरा शहर में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के कोच को , लोगों के झुंड ने घेर कर आग लगा दी। खबर आ रही थी कि पूरी ट्रेन में उसी कोच को जलाया गया जहां अयोध्या से कारसेवक लौट रहे थे। दूसरे दिन इस घटनाक्रम को बहुत ज्यादा उत्तेजित तस्वीर और शब्दों के साथ, खबर बनाकर गुजराती अखबारों में प्रकाशित किया गया। यहां, विश्व हिंदू परिषद के नेता के हवाले से खून के बदले खून के नारे छापे गये थे। इस खबर को और भड़काऊ बनाने के लिए लड़कियों के साथ हुए बलात्कार को हेडलाइन बनाया गया था लेकिन इस खबर का श्रोत क्या था? इसके बारे में कही भी जानकारी नहीं दी गई थी।

गोधरा में ट्रेन में लगाई गयी आग, जज़्बाती रूप से पूरे गुजरात को घायल कर रही थी। अखबारों के माध्यम से बताया गया कि तारीख 28 फरवरी 2002 को विश्व हिंदू परिषद, ने गोधरा में ट्रेन जलाने के विरोध में गुजरात बंद का आह्वान किया था। मैं उस दिन ट्रेन में सफर कर रहा था, जब ये ट्रेन सिद्धपुर उत्तर गुजरात पहुंची तब आगजनी की घटना को ट्रेन के भीतर से देखा जा सकता था।इसी तरह का माहौल गुजरात के विभिन्न शहरों में था।

अहमदाबाद, पहुंच कर देखा कि एक रेस्टोरेंट को जला दिया गया था, यहां के लोकल लोग इस आगजनी को देख रहे थे लेकिन जब मैंने एक अंजान शख्स से पूछा कि आग किसने लगाई है तब जवाब यही था- ‘पता नहीं, कुछ लोग बाहर से आए थे।’ लेकिन ये आगजनी उन्हीं जगह पर हो रही थी जहां अल्पसंख्यक समुदाय के लोग व्यवसायिक रूप से जुड़े हुए थे। इस दंगे में एक विशेष घटना हुई थी कि इस बार बहुसख्यंक समाज से जुड़ा हुआ दंगाइयों का झुंड, अल्पसख्यंक बहुतायत इलाके मसलन दरियापुर, इत्यादि में नुकसान करने में भी कामयाब रहा था। ये वो जगहे थी जहां इससे पहले हुए किसी भी सांप्रदायिक दंगे में कभी भी बहुसख्यंक समाज नुकसान करने में कामयाब नहीं हो पाया था।

इन दंगो में, हर तरह की लकीर को लांघ दिया गया था नरोडा पाटिया में सामूहिक कत्ल और बलात्कार, यहां एक गर्भवती महिला के साथ ज़ुल्म को इस तरह अंजाम दिया गया जहां इनसानियत पूरी तरह से शर्मशार हो गई थी। ऐसे शब्द नहीं हैं जिनमें इस तरह की घटना की निंदा की जा सके, इसी दंगे में गुजरात के एक और शहर वडोदरा में 14 लोगों को ज़िंदा जला दिया गया। यहां दंगे में अल्पसंख्यक नेता और उनके परिवार को भी नहीं छोड़ा गया। मैंने इन दंगों के दौरान कभी नहीं देखा कि पुलिस अपनी जवाबदेही इमानदारी से निभा रही है।

इस दंगे, में औरत और बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया। जिस तरह ज़ुल्म किया गया उसका किसी को अंदाज़ा तक नहीं था। दंगे पहले भी हुए थे लेकिन पुलिस द्वारा सख्ती की वजह से जल्द ही हालात काबू में ला दिये जाते थे लेकिन 2002 में हुए गुजरात दंगे, दिनों तक नहीं महीनों तक चले थे। रुक-रुक कर आगजनी की घटना सामने आ रही थी। इस दंगे, में नरेंद्र मोदी पर इल्ज़ाम लग रहे थे कि अगर ये मुख्यमंत्री के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वाह इमानदारी से करते तो ये दंगे इतने बड़े पैमाने पर नुकसान नहीं कर सकते थे। यहां ये भी इल्ज़ाम लगे कि यहां भाजपा की सरकार इस दंगे से राजनीतिक फायदा भी उठाना चाहती थी।

ये बात ध्यान देने लायक थी कि इस घटना के एक साल बाद 2003 में गुजरात के विधान सभा चुनाव होने थे। इसी बीच नरेंद्र मोदी ने एक और दांव खेला अपने कार्यकाल के 8 महीने पहले ही मोदी ने कैबिनेट समेत इस्तीफा देकर विधान सभा को भंग कर दिया, जिससे अगला चुनाव निश्चित समय से पहले करवाया जा सके। भाजपा पर आरोप भी लगा कि ये दंगे से आहत हुये जज़्बातों को वोट में तब्दील करने के लिये ऐसा कर रहे हैं। और हुआ भी कुछ ऐसा ही  2002 के राज्य चुनाव में भाजपा को जनता ने पूर्ण बहुमत देकर विजयी बनाया दिया।

2002 के दंगे के दौरान और उसके बाद भी मोदी पर आरोप लगते रहे कि उन्होंने दंगाइयों के बहुसख्यंक गुट को पूरा समर्थन दिया था।गुजरात के साथ-साथ पूरे देश में मोदी पर दो गुटों में बहस हो रही थी एक जो मोदी को सही मानता है और दूसरा जो मोदी की गलती देख रहा था। लेकिन इनसब के बीच चर्चा कुछ भी हो विषय मोदी ही थे। यानी अपनी राजनीतिक पहचान बनाने में नरेंद्र मोदी कामयाब हो चुके थे।

अब लोग और नामी नेता सार्वजनिक रूप से इनके पैरों को नमन करते हुये दिखाई देते थे। अब नरेंद्र मोदी का किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच से श्री नरेंद्र भाई मोदी जी कहकर स्वागत किया जाता था। इनके नाम के साथ गुजराती भाषा के अनुसार बड़े भाई को सम्बोधित करने का शब्द भाई जुड़ गया था।

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