मिंडा कंपनी पर जबरन सीवर की सफाई करवाने का आरोप, 3 मज़दूरों की मौत

Posted by Sunil Kumar in Caste, Hindi, Human Rights
October 4, 2017

गुरूग्राम (गुड़गांव) का पोस्टमार्टम हाउस ‘स्वच्छता दिवस’ के एक दिन पूर्व यानी 1 अक्टूबर, 2017 को लगभग शाम तीन बजे को सुनसान पड़ा था। वहां दो-चार लोग ही बैठे थे तभी अचानक सैकड़ों की संख्या में, कुछ पैदल और कुछ गाड़ियों से भीड़ वहां पहुंची। उस भीड़ में नौजवान, बुजुर्ग, महिलाएं और छोटे बच्चे थे। इनमें से किसी के भी शरीर पर ‘स्वच्छ’ कपड़े नहीं थे, किसी के भी शरीर की चमड़ी ‘स्वच्छ’ यानी गोरी नहीं थी, जिससे यह कहा जा सके कि हां ‘साहब’ लोग हैं। ना ही उस भीड़ में आए किसी बच्चे के लाल गाल और ‘साफ-सुथरे’ दिख रहे थे, जिन्हें झट से गोद में लेकर दुलारा जा सके या कान मरोड़ कर उसके साथ शरारत की जा सके। वह इस तरह भी नहीं दिख रहे थे जिनसे यह पूछा जाए कि आपके डैडी क्या करते हैं, आपके स्कूल का नाम क्या है, आप किस कक्षा में हो?

 

दरअसल हुआ ये था कि गुड़गांव के मिंडा ग्रुप की कंपनी जय ऑटो कॉम्पोनेन्ट के प्रबंधन ने तीन मज़दूरों(राजकुमार, रिंकु और नन्हे) को सफाई के लिए ज़बरदस्ती बिना किसी सुरक्षा के सीवर में उतारा और ज़हरीली गैस के कारण उन तीनों की मौत हो गई।

 

1)- मृतक मजदूर नन्हे की पत्नी पूनम बच्चों के साथ 2)- मृतक मज़दूर रिंकू की पत्नी आरती बच्चों के साथ (बाएं से दाएं)

बाईं फोटो में  दिख रही मृतक नन्हे की पत्नी पूनम एक बेंच पर बैठी रो रही थी, उसके साथ तीन बच्चे थे जिनकी उम्र 2 से 7 वर्ष के बीच थी। इन बच्चों को यह भी नहीं पता था कि उनके पिता किस ‘स्वच्छता अभियान’ के तहत क्यों और कैसे मरे। मां को रोते हुए देख उनको यह लग रहा था कि कोई बड़ा दुख उनके ऊपर आया हुआ है।

इसी तरह रिंकू की पत्नी आरती अपने दो बच्चों के साथ रो रही थी। वह उसी दिन अपने गांव सिमरा चौराहा, ज़िला हरदोई से आई थी। आरती बताती हैं कि वह पति रिंकू और दो बच्चों के साथ गुड़गांव के खांडसा गांव में राजकीय स्कूल के पास किराए के मकान में करीब 8 साल से रह रही थी। तीन माह पहले वह गांव चली गई क्योंकि रिंकू जो भी कमाता था यहां किराए और खाने में खर्च हो जाता था। वह चाहती थी कि कुछ समय गांव में बच्चों को लेकर रहे जिससे कि कुछ पैसों की बचत हो पाए। आरती की ज़िंदगी से एक अन्धेरे कुंड ने उनकी रोशनी को छीन लिया।

पूनम के चार बच्चे हैं और वह लखीमपुर खीरी ज़िले के गौला गोकरनाथ गांव की रहने वाली हैं। वह अपने पति नन्हे और बच्चों के साथ गांव खांडसा, सेक्टर 37 में किराए के मकान में रहती थी। उनके पति नन्हे घर से करीब 200 मीटर की दूरी पर ‘जय ऑटो कम्पोनेन्ट लिमिटेड’ में  9 सालों से स्वीपर का काम करते आ रहे थे। दशहरे के दिन 30 सितम्बर, 2017 को वह 7 बजे सुबह पर ड्यूटी गए थे। पूनम ने बताया कि हमें 11 बजे सूचना दी गई कि वो गड्ढे में गिर गए हैं जिससे उन्हें चोट आई है। 12 बजे जब वह कंपनी गेट पर पहुंची तो पता चला कि उनके पति की मौत हो चुकी है। वह कंपनी प्रबंधन से बातचीत करना चाहती थी लेकिन काफी प्रयास के बावजूद प्रबंधन ने उनसे कोई बात नहीं की और ना ही गेट खोला।

इस घटना में तीसरे मृतक 24 साल के राजकुमार थे। राजकुमार, गौतमबुद्ध नगर ज़िले के सबोता गांव के निवासी थे। राजकुमार का परिवार भी गरीब है, पिता नानक चन्द खेती का काम करते हैं और राजकुमार व उसके दूसरे भाई मेहनत-मज़दूरी करते हैं।

राजकुमार के चचेरे भाई रामऔतार उस कंपनी (जय ऑटो कम्पोनेन्ट) में चौकीदारी का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि राजकुमार करीब छह साल से कंपनी के मेंटेनेंस विभाग में अस्थायी रूप से काम कर रहे थे। कंपनी प्रबंधन ने राजकुमार को ज़बरदस्ती सीवर के अन्दर उतारा जिससे उनकी मौत हो गई। इस घटना में राजकुमार को बचाने गए रिंकू और नन्हे की भी असमय मृत्यु हो गई और विनेश व अरविन्द बेहोश हो गए।

जय ऑटो कम्पोनेन्ट कंपनी में 17-18 सफाई मज़दूर हैं जो वाल्मिकी समुदाय से हैं। ये सभी मज़दूर बारह-बारह घंटे की दो शिफ्ट में काम करते हैं। इन सफाई कर्मचारियों का मुख्य काम कंपनी की तीन मंजिला ईमारत और उसके टॉयलेट को स्वच्छ बनाए रखना होता है। इनके काम में सीवर सफाई का काम शामिल नहीं है।

सफाई विभाग के सुपरवाईजर दीप कुमार ने बताया, “कंपनी प्रबंधक ने हमें सीवर सफाई के लिए पहले भी कई बार कहा लेकिन हमने यह कहते हुए मना कर दिया था कि यह हमारा काम नहीं है। 30 दिसम्बर को छुट्टी का दिन था, हम गए नहीं थे तो प्रबंधन ने इन लोगों पर दबाव बनाकर सीवर सफाई के लिए उतार दिया। इस काम के लिए प्रबंधन ने किसी तरह की सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की थी और ना ही सेफ्टी बेल्ट या कोई सुरक्षा का उपकरण दिया था। यहां तक कि कई सालों से काम कर रहे मज़दूरों को स्थायी तक नहीं किया गया है, मज़दूरों से 8000-8500 रू. मासिक वेतन में काम कराया जाता है।”

इसी कंपनी में कुछ समय पहले ऋषिपाल सफाई कर्मचारी थे उन्होंने बताया, “वह कंपनी में सात सालों से काम कर रहे थे और 2017 में होली पर घर गए थे। घर से आने में दो-तीन दिन देर हो जाने पर कंपनी ने उनको बिना किसी मुआवजे या नोटिस दिए नौकरी से हटा दिया।”

जय ऑटो कम्पोनेन्ट कंपनी, मिंडा ग्रुप की कंपनी है जिसकी हरियाणा, दिल्ली और नोएडा सहित देश के अन्य हिस्सों में भी कई ब्रांच हैं। इस ग्रुप के कंपनियों के दर्जनों नाम हैं। यह कंपनी ऑटो क्षेत्र की बड़ी कंपनियों जैसे- होन्डा, सुज़ुकी, यामाहा, टोयोटा, मारूति, बजाज, महिन्द्रा व हीरो जैसी कंपनियों के लिए पार्ट्स बनाती है। चार पहिया और दो पहिया वाहनों के कई पार्ट्स के प्रोडक्शन पर इस कंपनी का एकाधिकार है। इस कंपनी का सलाना टर्न ओवर करीब 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 2700 करोड़ रू) है।

इस कंपनी की फैक्ट्री दिल्ली के जहांगीरपुरी इंडस्ट्रियल एरिया के राजस्थानी उद्योग नगर में है, जहां पर यह कंपनी मज़दूरों को न्यूनतम वेतन भी नहीं देती है। यहां तक की पी.एफ. का पूरा पैसा भी मज़दूरों के वेतन से ही काटा जाता है और यहां मज़दूरों से एक माह में सौ घंटे से भी अधिक ओवर टाइम कराया जाता है।

मज़दूरों द्वारा हाडतोड़ मेहनत करके कमाए गए ओवर टाईम के पैसों में से भी यह कंपनी ईएसआई और पीएफ का पैसा काटती है। यहां तक कि सलाना बोनस भी नहीं दिया जाता है, वर्दी और जूते तो दूर की बात है।

जय ऑटो कम्पोनेन्ट कंपनी के गेट पर लगाए गये बोर्ड पर कंपनी के दफ्तर का पता GI-48, जीटी करनाल रोड, इंडस्ट्रीयल एरिया, नई दिल्ली 110033 लिखा हुआ है। कंपनी के पते में कहीं भी जगह का नाम नहीं है, जीटी करनाल रोड काफी लम्बी रोड है और इसमें कई इंडस्ट्रियल एरिया आते हैं। कंपनी की वेबसाईट पर पता GP-14, HSIDC इंडस्ट्रियल एरिया, सेक्टर 18, गुड़गांव, हरियाणा 122001 दर्ज है। कंपनी की वेबसाईट देखने से लगता है कि यह कंपनी मज़दूरों को काफी खुशहाल रखती है, जबकि स्थिति ठीक उलट है। कंपनी अपने को रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट का काम करने वाली मानती है, लेकिन कंपनी सीवरेज सफाई के लिए मज़दूरों को गड्ढे में उतार कर उनकी जान ले लेती है। 2700 करोड़ रू. के टर्न ओवर वाली कंपनी के पास एक भी सेफ्टी बेल्ट नहीं होती है, यहां तक कि सीवर में गिरे हुए मज़दूरों को निकालने में दो से ढाई घंटे का समय लग गया।

कंपनी द्वारा मुआवज़े की घोषणा

मुआवज़े के लिए सादे कागज़ पर बनाया गया समझौता पत्र

मृतकों के परिवारों, नगरपालिका कर्मचारी संघ हरियाणा, सीटू, एटक, सीवर वर्कर्स यूनियन और फरीदाबाद रोडवेज यूनियन के पदाधिकारियों के दबाव के बाद कंपनी के मालिक ने डीएलसी के सामने सादे कागज पर इकरारनामा किया है। इसके अन्तर्गत मृत मज़दूरों के परिवारजनों को 17 लाख रू. मुआवज़ा और परिवार के एक सदस्य को अस्थायी नौकरी देने की बात कही गई है, लेकिन इस समझौते पर ना तो कंपनी की और ना ही लेबर अधिकारी की मोहर व लेटर पैड का प्रयोग किया गया है। इस समझौते में इस बात का भी उल्लेख नहीं है कि कंपनी यह मुआवज़ा कब तक पीड़ित परिवारों को देगी। इस तरह से मालिक-प्रशासन के गठजोड़ ने मज़दूरों को एक बार फिर से छलने की कोशिश की है। दुर्घटना के दूसरे दिन कंपनी बंद होने के बावजूद भी हरियाणा के अलग-अलग हिस्सों से पुलिस बल को बुलाकर कंपनी की सुरक्षा में लगाया गया था।

मृतक परिवार के लोग आठ बाई आठ फुट के कमरे के लिए हर महीने दो से ढाई हज़ार रू चुकाते हैं, इसके अलावा दस से बारह रू./यूनिट बिजली का बिल चुकाते हैं। दस-बारह परिवारों पर एक टॉयलेट की व्यवस्था है, पानी के लिए हैंडपम्प पर निर्भर होना पड़ता है। मज़दूरों को बाध्य किया जाता है कि वह खाने-पीने की वस्तु उसी मकान मालिक की दुकान से खरीदें, जिसमें वह रहते हैं। इसके लिए उनको बाजार भाव से अधिक पैसा देकर चीज़ों को खरीदना पड़ता है।

कंपनी के अंदर सीवर में मौत की यह कोई पहली घटना नहीं है, सितम्बर माह में ही 18 तारीख को अहमदाबाद की एक कंपनी में टैंक सफाई के दौरान चार मज़दूर असमय काल के ग्रास में समा गये थे और 5 घायल हो गए थे। कुछ समय से लगातार देश के कई हिस्सों से सीवर में मज़दूरों की मरने की खबरें आ रही हैं।

पिछले दो महीनों में ही दिल्ली और एनसीआर में इस वजह से 18 मौतें हो चुकी हैं और दर्जनों लोग घायल हुए हैं। जीवन में रोशनी लाने के लिए कब तक अंधरे गड्ढे में मौतें होती रहेंगी?


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