ताजमहल में अपना-अपना खुदा मिल जाए तो इसे बनाने वाले मज़दूरों का हाल पूछना

Posted by Murari Tripathi in Culture-Vulture, Hindi, History
October 17, 2017

ताजमहल लिखूं, मोहब्बत के निशान लिखूं
या भूखे नंगे मज़दूर किसान लिखूं…

ये मेरी एक कविता की दो पंक्तियां हैं, जिसे मैंने एक साल पहले लिखा था। इसमें मेरा इतिहास के प्रति दृष्टिकोण झलकता है। मैं इतिहास को शासकों की दृष्टि से ना देखकर आम अवाम की दृष्टि से देखता हूं।

सभी प्रकार के कट्टरपंथी, इतिहास को केवल धर्म की दृष्टि से देखते हैं। वे अपने-अपने फायदे के लिए इतिहास की मनमाने ढंग से व्याख्या करते हैं। कोई किसी राजा को हिंदुत्व का रक्षक बता देता है तो कोई प्रजा को कर के भार के नीचे दबा देने वाले मुस्लिम शासक को इस्लाम का सिपाही बता देता है।

मेरी अध्यापिका जब मुझे वास्तु कला के बारे में पढ़ाती थी, तो बताती थी कि जिस शासनकाल में जितने भव्य महल बने हों, वो आर्थिक रूप से उतना ही सम्पन्न होता था। उनके अनुसार गुप्त और मुगल शासनकाल बहुत समृद्ध थे। ऊपर-ऊपर देखा जाए तो ऐसा ही लगता है।

बाद में मैंने गहराई में जाकर पड़ताल की तो पाया कि संपन्नता तो होती थी, लेकिन वो केवल कुछ लोगों की होती थी। शासकों की विलासिता का मूल्य गरीब प्रजा चुकाती थी, इसलिए शासकों के खिलाफ विद्रोह भी होते रहते थे। ये स्वस्फूर्त होते थे, जिन्हें निर्ममता से कुचल दिया जाता था। इतिहास में ऐसे अनेक विद्रोह दर्ज हैं।

अमीर खुसरो भी कहते थे कि राजा के मुकुट में लगने वाला हीरा किसानों के आंसुओं का बना होता है। यही बात ताजमहल के संदर्भ में भी लागू होती है। ताजमहल के निर्माण ने राज्य के किसानों और मज़दूरों के लहू को चूस लिया। उनमें हिन्दू और मुसलमान दोनों शामिल थे।

आज ताजमहल के भीतर शिवलिंग खोजा जा रहा है। प्रोफेसर ‘ओक’ ये काम पहले कर चुके हैं। उन्होंने अपने शोध में ताजमहल को तेजोमहालय बताया है। हालांकि उनके शोध में तथ्यों की भारी कमी है।सतीश चंद्र जैसे प्रसिद्ध इतिहासकारों ने उनका पूरी तरह से खंडन किया है।

लेकिन कट्टरपंथियों ने आज ताजमहल की बहस को फिर से तेज़ कर दिया है। एक तरफ हिन्दू कट्टरपंथी तथाकथित ‘वाम-उदार-इस्लामिक’ गठजोड़ को गाली दे रहे हैं, वहीं मुस्लिम कट्टरपंथी मुगल शासक शाहजहां की झूठी महानता के तराने गा रहे हैं। दोनों का मतलब सिर्फ अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करना है।

जबकि सच्चाई कोषों दूर है। उस सच्चाई को ये लोग देखना नहीं चाहते हैं। जानबूझकर भी नहीं देखते हैं। जिस हिन्दू-मुसलमान की ये बात करते हैं,उसकी बहुसंख्या तब भी पीड़ित थी और आज भी पीड़ित है। मुसलमानों के नाम पर राजनीति करने वाले जब सत्ता में आते हैं तो उनके लिए कुछ नहीं करते हैं। हिन्दू के नाम पर सत्ता पा जाने वाले कहते हैं कि अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं।

इसलिए आप सबसे मेरा निवेदन है कि इनको पहचान लीजिये। इनके झांसे में आने से बचिए। ये आपकी भावनाओं का इस्तेमाल करके केवल सत्ता पाना चाहते हैं और कुछ नहीं।

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