स्टूडेंट यूनियन के चुनावी नारों और मुद्दों दोनों को मेकओवर चाहिए

क्यों पड़े हो चक्कर में, कोई नहीं है टक्कर में। जीतेगा भाई जीतेगा, ‘फलाना’ भाई जीतेगा। सारे मंत्री एक तरफ, ‘फलाना’ भाई एक तरफ। ये सब सामान्य चुनावी नारे हैं जो कि किसी भी चुनाव में प्रयोग किए जाते हैं। पर फिर भी छात्र संघ चुनाव, वो चाहे कहीं के भी हों, नारों में थोड़ी रचनात्मकता की उम्मीद की जा सकती है। चलिए अगर नहीं करते है तो भी कोई बात नहीं, मुद्दे की बात ये है कि ‘शेर नहीं ये चीता है, अखिलेश भैया जीता है’; ‘घर घर भगवा छाएगा, राम राज्य फिर आयेगा’; ‘जय श्री राम- जय श्री राम’; ‘एबीवीपी चोर है, एबीवीपी खूनी है…’ जैसे नारों का प्रयोग किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है? छात्रसंघ चुनावों के आयोजन के असल सरोकार क्या हैं?

फोटो आभार: Allahabad University Beat

छात्रसंघ चुनावों का छात्रहितों से करीबी संबंध होना चाहिए, लेकिन ये राजनीतिक पार्टियों के हितों में कहीं अधिक घुली-मिली प्रतीत होते हैं। ऐसे में इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्रसंघ चुनाव किसी संसदीय या विधानसभा चुनाव जैसा लगता है। ऐसा नहीं है कि अब इस विश्वविद्यालय में समस्याएं नहीं रही। संसाधनों की कमी आज भी है, शिक्षक आज भी कम हैं, लाइब्रेरी से किताबों का इशू ना होना, छात्रवृत्तियों और परीक्षा परिणामों का देरी से जारी होना आज भी विश्विद्यालय की समस्या है और छात्राओं की असुरक्षा का तो पूछिये ही मत।

यूनिवर्सिटी के चारों तरफ की सड़कें पोस्टरों और चुनावी पर्चों से पटी रही। हर मिनट आपको रद्दी और फूहड़ नारों की गूंज सुनाई दे रही थी। हर कोई आपको किसी को वोट करने की सलाह दे रहा था। कोई अनहोनी ना हो इसलिए सामान्य पुलिस बल, पीएसी बल, रैपिड एक्शन फोर्स और तमाम तरह की सुविधाओं का दोहन हो रहा था। खासतौर पर गौर करने वाली बात यह है कि सड़कों पर चुनाव अभियान में लड़कियों की भागिदारी इक्का-दुक्का ही थी, अब कारण का अनुमान आप स्वयं ही लगा लीजिए।

विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं से बात करने पर पता चला कि समस्याएं तो अनगिनत हैं, लेकिन इन समस्याओं का छात्रसंघ चुनाव से कोई संबंध ना होना, छात्रसंघ की अस्मिता पर सवाल उठाता है। इन सब गतिविधियों के बीच एकबार फिर आइसा संजीदगी से अपना काम करती नज़र आई।

फिलहाल छात्रसंघ चुनावों में राजनीतिक पार्टियों का इस स्तर तक हस्तक्षेप करना छात्रसंघ के भविष्य के लिये खतरा है। पचाससाला छात्र राजनीति का दौर तो लिंगदोह ने खत्म किया, पर छात्र संगठनों का इस हद तक राजनीतिकरण कैसे समाप्त हो, ये अभी भी अनुत्तरित है।
ये ज़रूरी है कि छात्र राजनीति में छात्रों के मुद्दे प्राथमिकता पर बने रहें, तभी छात्रसंघ की प्रासंगिकता बनी रह पाएगी।

फोटो आभार: Allahabad University Beat

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