सोनागाछी की महिला सेक्स वर्कर्स के लिए क्यों खास थी ये दुर्गा पूजा

Posted by Prashant Pratyush in Culture-Vulture, Hindi
October 3, 2017

इस वर्ष के दुर्गा पूजा की कई स्टोरी में इस बात को बहुत प्रमुखता से उठाया गया कि पूजा की मूर्तियां बनाने में कारीगर कई परंपराओं का पालन करते हैं, इनमें से एक है दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए वेश्यालयों से मिट्टी लेकर आना। जिसे देवदास फिल्मों में संजय लीला भंसाली ने बखूबी दिखाया जिसका अंत डोला-रे-डोला गाना के बाद हो गया। कमोबेश हर मीडिया रिपोर्ट में इस बात पर काफी चर्चा दिखती है कि देवी पूजा की नींव समाज के कथित तौर पर सबसे घृणित पेशे की मदद से रखना और जिस धर्म में लंबे समय से स्त्रियों को कई परंपराओं से दूर रखा जाता हो, जिस काल में सती प्रथा जैसी परंपरा है, वहां विधवा का जीवन नरक से कम न हो वहां इसकी रवायत कैसे पड़ी?

यह दुर्गा पूजा से जुड़ी परंपराओं के एक पक्ष का मूल्यांकन है। इसका एक दूसरा पक्ष यह भी है कि इसबार कई वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद कोलकाता के रेड लाइट एरिया सोनागाछी की सेक्स वर्कर महिलाओं को दुर्गा पूजा के पंडाल सजाने और विधिवत रूप से पूजा करने का अधिकार मिला। न्यायलय के फैसले के बाद इसबार बड़े स्तर पर पूजा का आयोजन किया गया।

जिसकी चर्चा श्रुति सेनगुप्ता अपनी डॉक्यूमेंट्री “six sacred Days” में करती है। सोनागाछी की सेक्स वर्कर महिलाओं ने 2013 में हाईकोर्ट में अपने दुर्गा पूजा मनाने के अधिकार के लिए हलफनामा दायर किया था। जिसमें सेक्स वर्कर महिलाएं दुर्गापूजा करने के अपने अधिकार की मांग कर रही थी। इसी डॉक्यूमेंट्री में महिला समन्वय कमिटी की सदस्य भारती डे बताती हैं “सेक्स वर्कर महिलाओं ने जब यह याचिका दायर की तो कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अपने क्षेत्र के राजनेताओं से बात करने पर भी सहायता नहीं मिली और अनुमति लेने के लिए एक जगह से दूसरे जगह घुमाया गया। तब इन महिलाओं ने हाईकोर्ट के तरफ रूख किया। पर हाईकोर्ट ने पूजा की अनुमति तो दी पर घर में ही पूजा करने का अधिकार मिला। फैसले के अनुसार उनका यह आयोजन एक छोटे सामुदायिक हॉल तक ही सीमित था।”

सेक्स वर्कर महिलाओं ने सामुदायिक हॉल में ही दुर्गा पूजा का आयोजन शुरू किया। लोगों ने इसमें अपनी सहभागिता भी दिखाई, जिसके बाद इन महिलाओं ने खुले में पंडाल बनाने और पूजा करने के लिए प्रयास किये। दरबार महिला समन्वय समिति की सचिव काजोल बोस बताती है “हमने हर साल की तरह पिछले साल उच्च न्यायालय में अपील नहीं की थी इसलिए बीते साल पूजा में आयोजन नहीं किया जा सका था। इस बार उच्च न्यायालय ने हमारे पक्ष में फैसला सुनाया और हम बड़े स्तर पर पूजा का आयोजन कर रहे है।”

इस बार का दुर्गा पूजा का आयोजन यहां कि सेक्स वर्कर महिलाओं के लिए इसलिए भी खास थी क्योंकि सेक्स वर्कर महिलाओं ने इस बार पंडाल में राज्य मत्स्य पालन विभाग और दरबार महिला समन्वय समिति की मदद से शेफ भूमिका में थीं। इस फैसले का महत्व उन महिलाओं के लिए अधिक है जो सेक्स वर्कर की ज़िंदगी छोड़ना चाहती हैं। दुर्गा पूजा के सार्वजनिक उत्सव के लिए सेक्स वर्कर महिलाओं को लंबा संघर्ष करना पड़ा है और यह आयोजन उनके सामाजिक स्वीकार्यता का रास्ता भी खोल रहा है।

भारतीय लोकतंत्र की यह खूबी है कि वो विविधता में एकता को बनाये रखने के लिए संघर्षरत है और सांस्कृतिक विविधता के बीच एकता बनाए रखने के लिए लोगों में लोकतांत्रिक चेतना के विकास की कोशिशें निरंतर कर रहा है।

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