एक लड़की होते हुए स्लम में रहकर मेरा पढ़ाई करना आसान नहीं था

Posted by Vinita Rav in Hindi, My Story, Society
October 15, 2017

मैं दिल्ली के एक छोटे कस्बे जिसे आम तौर पर स्लम एरिया के नाम से जाना जाता है वहां से हूं। मेरी कॉलोनी का नाम इन्दिरा कॉलोनी है जो पंजाबी बाग एरिया में है। स्लम में रहने की बात को आज जितनी आसानी से स्वीकार करती हूं, सालों पहले ये करना मेरे लिए बेहद मुश्किल था। बचपन से ही घर और आस-पड़ोस के लोगों ने दिमाग में बैठा दिया था कि किसी को भी पता चला कि मैं एक झुग्गी में रहती हूं तो टीचर और साथियों से वो इज्ज़त नहीं मिलेगी जो बाकियों को मिलती है। इसलिए असलियत को जितना हो सके छुपाते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी और किसी को कानोकान खबर न होने दी।

एक रात पहले चाहे कुछ भी हाल हो, अगले दिन चमकते हुए चेहरे और चमकते हुए जूते (जो पापा तेल से चमकाते थे) के साथ स्कूल पहुंच जाती।

पढ़ाई में ठीक-ठाक ही थी, पर पैसों की कमी की वजह से ट्यूशन बराबर नहीं हो पाती थी। कॉमर्स से आर्ट्स में आ गई क्यूंकि अकाउंट्स की समझ नहीं थी और बिना ट्यूशन के यह और भी मुश्किल था। कहने का मतलब यह कि मेरी चॉइस से ज़्यादा मेरी मजबूरी ने मुझे आर्ट्स में बैठा दिया था। घर में इसको लेकर काफ़ी बवाल भी हुआ क्यूंकि पापा को लगता था कॉमर्स या साइंस नहीं है तो जॉब कैसे लगेगी! जॉब तो अब भी नहीं है, पर चूंकि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. कर रही हूं इतिहास विभाग से, तो दुःख कम हो गया है।

स्कूल से यहां तक का सफर आसान नहीं था, किसी के लिए भी नहीं होता, खास तौर पर जब आप बिना किसी जॉब व फाइनैंशियल सेक्योरिटी के हाई एकेडेमिक में जाना चाहें तो। पर वो एक अलग स्ट्रगल है, जब आप अपने हमउम्र को भी उसी चक्की में पिसते हुए देखते हैं, तो आप भी डरना छोड़ ही देते हैं। पर नहीं कहानी इतनी भी सरल नहीं।

दरअसल, पढ़ाई के दौरान कुछ ऐसे टीचर्स मिलें, जिन्होंने मुझ पर विश्वास दिखाया, आगे बढ़ने का हौसला दिया, और पीछे ना मुड़कर देखने का सुझाव भी। पर कब तक? आज भी सोचती हूं कि किस तरह लाइब्रेरी से आते हुए लेट हो जाने के लिए मुझे मोहल्ले के एक लड़के ने वैश्या कहा था। हालांकि यह ज़रूरी नहीं कि मैं किसी तरह की सफाई दूं कि मैं लाइब्रेरी से ही आ रही थी, या फिर वैश्या शब्द बुरा है, सच पूछो तो वो उस लड़के से कई गुना बेहतर है, पर ऐसी सोच का क्या करें जिन्हें लगता है कि किसी को वैश्या भर कह देना एक गाली है! जाने ये लोग कब समझेंगे कि वो भी एक प्रोफेशन है, और जब तक इस प्रोफेशन को लीगल नहीं किया जाता उनकी लेबर और पेमेंट को लेकर एक्सप्लॉइटेशन किया जाता रहेगा।

खैर, यह सिर्फ एक-दो बार नहीं, 9-10 सालों तक होता रहा, इसलिए मेरे लिए कोई नई चीज़ नहीं, बस एक नया अचंभा रोज़ होता था कि मेरे सामने खड़ा इंसान कितना गिर सकता है, फिर चाहे वो मर्द हो या औरत। और यह समझने की गलती बिल्कुल नहीं करना कि यह समस्या केवल कॉलोनी से जुड़ी थी। यहां तो मेरे माँ-बाप, भाई-बहिन सब खड़े हो जाते थे मेरे साथ, अकेली तो मैं तब पड़ती थी जब मेरे ही बीच के लोग मुझ पर ऊंगली उठाते थे, मेरे कैरेक्टर पर सवाल उठाते थे, मेरी ज़ुबान से परेशानी जताते थे। हालांकि उन्हें मुझसे ज़्यादा गालियां आती थी पर चूंकि मैं एक स्पेसिफिक सोसाइटी से हूं तो मैं बिगड़ी हुई हूं वाली मनोवृति ने कभी भी मेरा पीछा न छोड़ा।

अब मैं एक अलग घर में रहती हूं घरवालों से दूर, इसलिए नहीं कि अब इस मनोवृति का सामना करने की हिम्मत नहीं है, बल्कि इसलिए क्यूंकि एक कमरे के मकान में देर रात तक पढ़ाई कर पाना थोड़ा मुश्किल था। एक बड़े घर को किराये पर लेने का सपना देख रही हूं पर ऐसा इसलिए नहीं क्यूंकि उस मोहल्ले में खराबी है, आप पर छींटाकशी करने वाले लोग तो आपको संसद में भी मिल जायेंगे, कितना भागेंगे। इसलिए ताकि अपने माँ-बाप को एक खुले, सारी सुविधाओं से लैस एक घर का अनुभव करवा पाऊं।

अब मेरे आस-पास ऐसे लोग हैं जो मेरी हिम्मत बढ़ाते हैं, और मेरे सपनों को बेबुनियाद नहीं बताते, बल्कि जहां हो सके मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चलते हैं। ऐसे लोगों को पाने से पहले मैंने न जाने कितनो को खोया है जिसका मुझे दुःख भी है और संतोष भी। बस मन को यही सवाल व्याकुल कर देता है कि न जाने कितनी विनीता अब भी इसी मनोवृति से रोज़ लड़ रही होगी।

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