बनारस की परंपरा पर गर्व करने की आड़ में कहीं इस शहर के साथ अन्याय तो नहीं कर रहे हम

अपने गांव अपने कस्बे या शहर पर गर्व करने के बजाय उससे प्रेम करें, एक सच्चे दोस्त की तरह। आपके फर्ज़ी गर्व से शहर गांव कस्बे में जन्म लेनी वाली पीढ़ी भारी कीमत चुकाती आ रही है।

हम गंवई बैकग्राउंड से आते हैं। शहरों की बात करें तो हमारा अधिकतर समय बिता है इलाहबाद और बनारस में। दोनों शहरों से हमें प्रेम है। इन दोनों में गांव से नज़दीक बनारस है। इलाहबाद को छोड़ आज बनारस की बात करते हैं।

हां, तो यदि हम बनारसी होते तो हमें इसलिए गर्व होता कि वहां की फूहड़ होली वर्षों से चलती आ रही है। खुद तो शामिल हो जाते हैं पर नहीं चाहते हैं कि घर का कोई सदस्य शामिल हो। बनारसी होते हम तो इसका कारण हमेशा से चली आ रही परम्परा को बताते और फिर शहर से प्रेम ना करते तो गर्व करते।

गांव-गांव श्मशान होने के बाद भी पूरे देश से लोग यहां शव जलाने आते हैं। क्या वे आकर एहसान कर रहे हैं? कुछ हद तक कर भी रहे हैं पर उसकी कीमत उनके एहसान के मुकाबले काफी ज़्यादा है। ऐसा सदियों से होता आ रहा है इसलिए आते हैं, एक परम्परा चलती आ रही है जिसपर हमें गर्व हो जाता है। भले ही गंगा का पानी अधजली शव के अवशेषों से दूषित हो जाए। हवा में कार्बन ही कार्बन भर जाए पर हम गर्व करके ही दम लेते हैं।

हमको बनारसी होने पर कभी-कभी इसलिए भी गर्व हो जाता क्योंकि यहां की सड़कों पर जगह कम मंदिर, मस्ज़िद और दरगाह ज़्यादा हैं। इनके खिलाफ कोई नहीं बोला सो हम भी नहीं बोल सकते आखिर परम्परा की बात है। यही परम्परा चलती आ रही है और हम निभाने में गर्व महसूस करते हैं। हमारे शहर की सड़के चौड़ी नहीं हो पाती फिर भी गर्व से हम चौड़े हुए जाते हैं।

कैंट से सिगरा पहुंचने में आधा से एक घंटा लग जाए तब भी हमें अपने शहर की खिंचाई नापसंद ही आती है। पिछले तीन सालों से वीआईपी जनों की गाड़ियों का काफिला देखते ही हम गौरवान्वित हो जाते हैं। बिजली, पानी, निवेश की चिंता छोड़ दिये हैं। क्यों? क्योंकि यह क्षेत्र प्रधानमंत्री जी का क्षेत्र है। वो यहां से लड़ गए और हम गर्व में कभी ना उपराने के लिए डूब गए।

हमें गर्व है महामना पर जिन्होंने यहां BHU बनवाया। शायद गर्व ही है प्रेम नहीं। प्रेम होता तो BHU की बेहतरी के लिए लड़ रहे स्टूडेंट्स का साथ देते। यह ना कहते की बाहरी लड़के आकर महामना की बगिया को बदनाम कर रहे हैं।

गर्व ऐसी चीज़ है जो भंगुर है, शायद कांच की तरह, टूटने का खतरा बना रहता है तभी तो उसको हम सहेज के रखते हैं ताकि धक्का ना लगे जबकि प्रेम में जगह होता है शिकवा और शिकायत का। दौर चलता है रूठने और मनाने का।

गर्व के बजाए सच्चे दोस्त की तरह अपने गांव अपने कस्बे या शहर से प्रेम करिये। दोनों खुशहाल रहेंगे, शहर भी, आप भी।

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