पटना यूनिवर्सिटी और हमारा देश एक जैसा है, बस उम्मीद पर समय काट रहा है

Posted by anchit in Activities on Campus, Campus Watch, Education, Hindi
October 14, 2017

जिन पांच सालों में मैं पटना यूनिवर्सिटी में रहा, बहुत सीखा और अब जब शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है आइये वापस लौटता हूं उसकी तरफ। मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में यहां अपने शुरुआती दिनों का उल्लेख किया, मुझे पटना कॉलेज में अपने पहले दिन की याद ताउम्र रहने वाली है। जिस दिन वहां पहली क्लास होनी थी, उस दिन एक बजे तक कोई क्लास नहीं लगी, बहुत गहमागहमी थी और जिस क्लास में हम बैठे, उस बड़ी क्लास में सिर्फ आगे का एक पंखा चल रहा था।

पूरे हफ्ते इधर-उधर छिटपुट मारपीट होती रही पटना कॉलेज के पूरे कैंपस में और बाद में पता चला ऐसा रोज़ का किस्सा है। कॉलेज के अन्दर जो पुलिस चौकी थी, अपने पांच वर्षों में उसे समय पर काम करते हुए नहीं देखा। लड़कियों के साथ अक्सर बदसलूकी की जाती थी, गेट के शुरू में ये माहौल बहुत अजीब लगा लेकिन फिर कुछ बदला नहींं और फिर बस आदत हो गई। फिर भी आदमी उम्मीद पर जीता है।

अनुशासन बदलेगा इस उम्मीद में हमेशा जिए हमलोग। कम से कम इतना हुआ कि मेरे दाखिले के साल पटना कॉलेज को एक प्राचार्य भी मिला जो शायद पिछले कुछ वर्षों से नहीं था। बहरहाल, पुराना विश्वविद्यालय है, इतना पुराना कि अधिकतर चीज़ें पुरानी नहीं प्राचीन हो चुकी हैं। बेंच, ब्लैकबोर्ड जैसी बुनियादी चीज़ें भी बाकी विश्वविद्यालयों में जैसी होती हैं, वैसे स्तर की नहीं हैं। नुक्ताचीनी आप कह सकते हैं, पर मानकों के हिसाब से कम से कम विभागों के पास प्रोजेक्टर, कंप्यूटर और शिक्षक तो होने ही चाहिए। मुख्यमंत्री पटना कॉलेज के एक कार्यक्रम में वाईफाई के लिए वादा कर गये थे, वो इस बार पूरा हो जायेगा ये उम्मीद है।

स्वच्छ भारत का ज़माना है, डस्टबिन रखवाने के लिए बहुत जद्दोजहद लगी और शायद मेरे पासआउट होने के बाद वो रख दिए गये हैं। पीजी विभाग में लड़कों के लिए सही शौचालय, शायद अभी भी नहीं है, और जो है वो पूरी कैपेसिटी के हिसाब से कम संख्या में हैं। ये छोटी-छोटी बातें हैं, बुनियादी, जो आदमी घर बसाते हुए सबसे पहले अपने घर में जोड़ ही लेता है। कम से कम सौ सालों में ये हो जाएगा ये उम्मीद तो कर ही लेनी चाहिए।

अकादमिक ज़रूरतों की बात करते हुए मुझे अपने मिन्टो हॉस्टल के मित्र याद आते हैं जो मेरा मज़ाक उड़ाएंगे, मेरे जैक्सन हॉस्टल के मित्र जिनके कमरे के आगे का बरामदा तीन-चार साल पहले बिना बरसात भगवान को प्यारा हो गया (अब शायद सब रिपेयर हुआ है, पटना कॉलेज में भी रंगाई पुताई हुई है,शायद पिछले साल) वो मुझे गालियां देंगे और लिखते हुए मुझे भी लगेगा कि उम्मीद अपना घेरा पार कर रही है और मेरी उम्मीद फितूर से होते हुए पागलपन में बदल गई है। दिल्ली विश्वविद्यालय से कई रीसर्च जर्नल्स निकलते हैं,  वहां जे स्टोर की सुविधा है और वहां के कई प्रोफेसर दुनिया भर में लेक्चर के लिए जाते हैं। जेएनयू का कमोबेश यही इम्प्रेशन दिखता है। छात्रवृतियां, एक्सचेंज प्रोग्राम्स और इस तरह की चीज़ों के बारे में ना हमने सुना है ना ज़्यादातर शिक्षकों ने इसकी कोशिश की। अकादमिक माहौल बेहतर करने की बात करते हुए इन चीज़ों की बात नहीं करूंगा।

मेरी अब पटना यूनिवर्सिटी से बस यही उम्मीद है कि जैसे मेरा मित्र मेरे बगल में बैठकर परीक्षा देने के बावजूद मार्कशीट पर एब्सेंट दिखा दिया गया वैसा ना हो, जेआरएफ का पैसा समय पर आ जाए और हर साल नहीं तो कम से कम तीन चार साल में एक बार ही सही, पीएचडी एंट्रेंस हो जाए।

पटना यूनिवर्सिटी के पूर्ववर्ती छात्रों पर बहुत बात होती है, लेगेसी की बात, वर्तमान पर कोई बात नहीं करता। कितने शिक्षक हैं यहां जिनके बच्चे (कम से कम मानविकी संकायों में) यहीं पढ़ते हैं? कितने हैं जो ऐसा चाहते हैं? सालों में कोई बौराया हुआ, सब जगह से ठुकराया शिक्षक पुत्र यहां पहुंचता है। गौरवशाली इतिहास का गान करता हुआ हर आदमी कर्तव्य निवृत हो जाता है। बच्चे बाहर जाते हैं, यहां कोई नहीं टिकता, टिक जाए तो फंसा रहता है चक्करघिन्नी में। छात्रसंघ चुनाव नहीं होते या कोई गंभीर विमर्श के लिए स्पेस नहीं है जैसी बाते कहते हुए बंदी के बावजूद शराबी घोषित कर दिया जाऊंगा। पर आदमी उम्मीद तो कर ही सकता है।

हम इतिहास को याद करें, युवा आगे ले जायेगा देश ये अमूमन हर भाषण में प्रधानमंत्री कह देते हैं, सो आज भी गुजरात वाला एक आध पन्ना गलती से इधर चला आया होगा। लेकिन पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाला हर छात्र जानता है कि वो इतना प्राचीन हो चुका है और उसके आसपास इतना इतिहास है, जैसे आज़ादी के समय के नल, उससे भी पुरानी छतें जो कभी भी आप पर आकर विद्यमान हो सकती हैं। IIM के लोग भी यहाँ आ जाएँ तो क्या कमाल करेंगे ये देखने वाली बात है।

आजकल देश में मजमा बहुत लगता है। बहुत आसान हो गया है, जनता टैक्स देती है, सरकार उसी का पैकेज घोषित कर गरीबों की मसीहा बन जाती है। विश्वविद्यालय में भी मजमा लगा है फिलहाल। शिक्षक आईकार्ड टांगे रेलिंगे और दीवारें बनवा रहे हैं। जो थोड़ी बहुत अकादमिक कार्यविधि होती थी सब निरस्त है। और कोई तो चाहिए जो उम्मीद जगाये, जो सपना दिखाए, इतना रंगापुता जाता है सबकुछ , सच्चाई छिपती भर है, वो भी क्षणिक।

बहरहाल प्रधानमंत्री ने बहुत सब्जेक्टिव भाषण दिया, ऐसे ही हमलोग परीक्षा में आंसर लिखा करते थे। गोलमोल कुछ-कुछ भारीभरकम कह जाते और मतलब से अपने को क्या मतलब। यहां के गुरुजन और स्टाफ बड़े दयालु हैं, सब खुले ह्रदय से मान लिया जाता है। अपने जेब से क्या जाता है, छात्रों का क्या, हमलोग तो बस उम्मीद में जीते हैं।

कल फिर यूनिवर्सिटी खुलेगी, पटना कॉलेज में मार वाले हालात बनेंगे, किसी लड़की को परेशान किया जाएगा, कुछ शिक्षक आएंगे, कुछ शिक्षक नहीं आयेंगे, कुछ स्टाफ रूम में ही बैठे रह जायेंगे।

जर्जर होती धरोहर इमारतें कुछ नष्ट होंगी, नया निर्माण इनको कुरूप करेगा और चूंकि हमारे पास विकल्प नहीं होंगे, और इतने पैसे कि किसी “ढंग के कॉलेज” में हम जा सकें, हम यहीं आएंग क्योंकि मगध विश्वविद्यालय में तीन साल का ग्रेजुएशन पांच साल में होता है। कुछ अलग नहीं होगा, शताब्दी वर्ष तो बीत जाएगा, फिर सब जर्जर यानी कि दूसरे शब्दों में रोज़ जैसा सामान्य, और उम्मीद?

मैं जिन पांच सालों में वहां रहा, कुछ दिन ऐसे होते थे जब बाहर से ना यहां के पढ़े हुए ना यहां जूझे हुए लोग आते थे और कहते थे सब बेहतर होना चाहिए। एक पत्रकार मित्र बड़े-बड़े लेख लिखता, तसवीरें खींचता और खुश होता, हालांकि वो भी यहां कभी नहीं पढ़ा और यहां के टीचर्स से कनेक्ट करता। मुझे कुढ़ होती, छोटी सी इस यूनिवर्सिटी में कई-कई दुनिया हैं, कई कई संघर्ष हैं, हमें अब राजेंद्र बाबु याद नहीं हैं, ना दिनकर का निर्भय स्वरुप। यहां की इमारतों का सौन्दर्य हम डर से बचें तो दिखे।

सबसे बड़ी उपलब्धियों में बिना गड़बड़ी के मार्कशीट का मिल जाना, बिना पिटे क्लास तक पहुंच जाना और एक डिग्री हासिल कर लेना बहुत रहा।

इतिहास और संग्रहालयों से परे भविष्य देखते बच्चों के लिए बकौल मेरे एक और प्रोफेसर, एक ही सहारा था। ग्रैजुएशन के प्रथम वर्ष में जब मुझे राजनीति कम समझ आती थी, पूरे साल कॉलेज ना आई लड़की के टॉप कर जाने पर मैं उद्वेलित हो गया था। प्रोफेसर साब बोले, यहां सब रामभरोसे होता है। देश का भी यही हाल है। एस्केप खोजते हुए घाट पर चला जाता अपने आखिरी सालों में, गालिब पढ़ता वही, कोई उम्मीद बर नहीं आती और तेरे वादे पर जियें हम।

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