मुझ जैसे अल्पसंख्यकों की पहचान को हमारी शिक्षा व्यवस्था ने सहज नहीं होने दिया

मेरी स्कूल की पढ़ाई हिंदी माध्यम से ही शुरू हुई थी। साल 1987 में पांचवी कक्षा में पंजाबी पढ़ने के अलावा बारहवीं तक सारी शिक्षा हिंदी माध्यम में ही हुई थी।तीसरी क्लास में इंग्लिश और बाद में गुजराती भी इंट्रोड्यूस किया गया। 8वी कक्षा में संस्कृत भी एक विषय में लागू हो गया था जिसे मैंने कक्षा बारहवीं तक अच्छे मार्क्स पाने के लालच में बरकरार रखा। अमूमन हिंदी और संस्कृत माध्यम के किताबों से हिंदू धर्म की ही ज़्यादातर जानकारी मिलती थी। राम के सबरी के बेर खाने की कहानी हो या कृष्ण और सुदामा का मिलन, उन किताबों में हिंदू धर्म के बहुत से अध्याय थे।

वहीं गुजराती माध्यम में भक्त सूरदास, नरसिंह मेहता द्वारा भगवान श्री कृष्ण के प्रति स्नेह में लिखी गयी कविताओं का ही ज़िक्र था। सोशल साइंस के क्लास में मुगल साम्राज्य के बारे में ज़रूर बताया जाता था पर बहुत सीमित। मसलन एक इतिहास का एक पाठ मुहमद बिन तुगलक मुझे आज भी याद है जिसके कार्यकाल में लिये गये अजीबो गरीब फैसलों ने भरी क्लास में हमे गुदगुदा दिया था और हर जगह हंसी के ठहाके ही छूट रहे थे।

सुबह की प्रार्थना में भी विधाता ओर भगवान जैसे शब्द होते थे। छठी और दसवीं क्लास में जिस स्कूल में था वहां बाहर एक बोर्ड पर अक्सर मेरे ही सहपाठी द्वारा बनाई गई भारत माता से लेकर भगवान शिव की तस्वीर चित्रित होती थी। आते-जाते अक्सर ये तस्वीरें हमारे ज़हन में मिलती जाती थी ओर इनके बारे में ज़्यादा जानने की जिज्ञासा बढ़ रही थी। यही कारण था कि 15 साल की उम्र में ही मैंने श्री भगवत गीता के सारे 18 अध्याय पढ़ लिए थे, खासकर हर अध्याय के बाद में दर्ज कहानी को पढ़ने का अपना अलग ही आनंद था। मैंने मंदिर में बैठकर भी हुनमान चालीसा पढ़ा हुआ है। शायद ये मेरी उस शिक्षा का ही प्रभाव था जो मुझे हिंदू समाज और आस्था के प्रति आकर्षित कर रही थी वही मुझे इस बात का कहीं इल्म नही था की सिख धार्मिक मर्यादा के अनुसार कही भी मूर्ती या किसी भी चित्र की पूजा की मनाही है।

ये मेरी शिक्षा प्रक्रिया ही थी कि मुझे अक्सर हिंदू धर्म और संस्कृत से अवगत करवाया जाता था जिसके कारण कहीं भी मुझे श्री भगवत् गीता या हुनमान चालीसा पढ़ने में आपत्ति नहीं हुई। लेकिन इसका एक ओर प्रभाव हुआ की मैं व्यक्तिगत रूप से सिख धर्म के बारे में ज्यादा जानने में असमर्थ रहा और जानने की इच्छा 20 की उम्र में ही हुई जब मैं अपना ग्रेजुएशन पूरा कर चुका था।

कुछ ऐसा ही अनुभव ज़िंदगी में भी हुआ। कई बार किसी गैर सिख द्वारा मेरी धार्मिक पहचानों को निशाना बनाया गया है, लेकिन तब बहुत हैरानी हुई जब एक सरदार जी ने ही मेरे लाल रंग की पगड़ी पर निशाना साध दिया। दरअसल दिल्ली जैसे शहर में बड़े-बड़े ऑफिस में काम करने वाले सिख युवक काली या सफेद रंग की पगड़ी पहने हुये ज़्यादा दिखाई देते हैं लेकिन मैं अक्सर लाल, हरी, पीले रंग की पगड़ी भी पहनता हूं। उस दिन मैंने लाल रंग की पगड़ी पहनी हुई थी और हेड फ़ोन लगा कर निगाहें मॉनिटर पर टिकाई हुई थी। वहीं दूर अपने सहकर्मियों के साथ एक सरदार जी खड़े थे जो एक दूसरे डिपार्टमेंट में थे और जिनसे कभी मेरी बातचीत नही हुई थी, वही लाल रंग की पगड़ी पर टिप्पणी कर रहे थे। जब मैंने हेडफोन उतारकर इस बात के संकेत दिये कि मैं सब कुछ सुन चुका हूं, तब वह सभी वहां से गायब हो गए। कुछ इसी तरह मेरी आफिस में क्लाइंट साइड की तरफ से आई एक महिला का नाम किसी कारणवश लिखाने की जरूरत पड़ गई तब उन्होंने अपने नाम के पीछे कौर ना लगाने के लिये साफ शब्दों में मना कर दिया था। सोचने की ज़रूरत है कि ऐसा क्यों हुआ ? शायद यहां सिख पगड़ी और कौर के इतिहास की जानकारी नहीं थी और दूसरा कॉर्पोरेट समाज का कल्चर।

यहां समझने की ज़रूरत है कि आज कोई सिख, मुसलमान या कोई भी अल्पसंख्यक अपने धार्मिक चिन्हों की मौजूदगी के साथ, कॉर्पोरेट जगत में काम करने से क्यों कतराते हैं? और वो कॉर्पोरेट समाज के लोगों के सामने एलियन के रूप में पहचान क्यों नहीं बनाना चाहतें ? ओर उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि अपनी धार्मिक छवि के कारण वह यहां के हाई-फाई समाज में कबूल नहीं होंगे?

इसकी सबसे बड़ी वजह है हमारे समाज में अल्पसंख्यक समुदाय की आस्था के प्रति जानकारी का अभाव। इसका सबसे बड़ा कारण हमारी शिक्षा का झुकाव बहुसंख्यक समाज के प्रति होना है। शायद यही वजह थी कि मेरे हिंदी माध्यम से पढ़ने के समय सिर्फ एक बार पंजाब प्रांत के प्रति अभ्यास में पढ़ाया गया और एक बार यादव सर ने क्लास में पूछा था कि सिख समाज में मांस खाने के प्रति क्या तर्क है? आप समझ सकते हैं कि उस समय मैं एक सिख की वेशभूषा में तो ज़रूर था लेकिन मुझे कहीं भी सिख समाज और धर्म की जानकारी नहीं थी। धार्मिक चिन्हों का क्या इतिहास है इसकी जानकारी कहीं भी हमारे समाज में मौजूद नहीं है।

यही सभी कारण थे कि मैंने गुरुद्वारा साहिब जाने में 20 साल लगा दिये और ग्रैजुएशन के बाद ही अपनी सिख धर्म के प्रति जानकारी जुटाने का इरादा बनाया, 2003 में मैं सिख रीति रिवाज़ के तहत अमृतपान करके पूर्णतः सिख लिबास में आ गया था। मुझे आज भी कभी मेरी शिक्षा के प्रति कोई संदेह या आपत्ति नहीं है, इसके विपरीत एक स्नेह है कि में संत नरसिंह मेहता जैसे कई विद्वानों के बारे में जान पाया। आज भी जब उदास होता हूं तो संत नरसिंह मेहता का एक भजन “राख ना रमकंडा” ज़रूर सुनता हूं, और यही वजह है कि जब मैं किसी भी हिंदू समाज के व्यक्ति से मिलता हूं तो बातचीत करने में खुशी महसूस होती है क्योंकि मुझे शिक्षा के माध्यम से हिंदू समाज की काफी जानकारी है।

इसके विपरीत, एक सिख होने के रूप में मुझसे लोग अंजान ही रहते हैं। शायद यही वजह थी कि कुछ दिन पहले खालसा ऐड द्वारा रोहिंग्या मुसलमानो को बंगलादेश में सेवा निर्मित मुफ्त खाना खिलाना, सोशल मीडिया पर ट्रोल का कारण बन गया।

अगर लोगों को इस बात की जानकारी होती कि सिख धर्म के तहत गुरु का लंगर धर्म, आस्था, मज़हब, जात-पात, महिला पुरुष, सभी तरह के मतभेदों से ऊपर उठ कर एक समान नियम के तहत सब के लिये है, तो शायद ये ट्रोल नहीं किया जाता।

अंत में समझने की ज़रूरत है कि आज मॉडर्न शिक्षा प्रणाली के तहत, सुबह सुबह प्रार्थना के बाद अमूमन सभी बड़े स्कूलों में संक्षिप्त में मुख्य खबरें पढ़कर विधार्थियों को सुनाई जाती है। यहां शुरू से ही बच्चों को इस्लामिक आतंकवाद, सिख बब्बर खालसा आतंकवादी जैसे शब्दों से पहचान करवाई जाती है, ज़रा सोचिए कि उन बच्चों पर इसका क्या असर पड़ेगा। और जब यही बच्चे बड़े होकर किसी ना किसी तरह से समाज के निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वाह करेंगे तो उस समाज की रचना कैसी होगी ? अगर वास्तव में हमारे देश को धर्म निरपेक्ष बनाना है तो सभी आस्थाओं की एक समान जानकारी सभी पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा अन्यथा धर्मनिरपेक्षता एक शब्द से ज़्यादा कहीं भी अपना मोल नहीं तलाश पाएगा। और 1984, 2002 की तरह साम्प्रदायिक का तांडव सड़कों पर दोहराया जाता रहेगा जिसके लिए कसूरवारों में हमारी शिक्षा भी कठघरे में खड़ी होगी।

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