मोदी जी जिस ‘गुजरात मॉडल’ की बात करते हैं उसे मैंने करीब से देखा है

गुजरात, में हुए दंगों को अक्सर गुजरात दंगों का नाम दिया जाता है, वास्तव में ये सही नहीं है। अगर गुजरात में हुए इस नरसंहार का अध्ययन करें तो पता चलता है कि इसके चपेट में ज़्यादातर वही शहर हैं जो अहमदाबाद के करीब 100 किलोमीटर के दायरे में आते हैं। दंगों का मुख्य प्रभाव उत्तर और मध्य गुजरात में बहुत व्यापक था। दंगों की मानसिकता और परिस्थिति को समझने के लिये गुजरात के इन सभी विस्तारों को समझने की बहुत ज़रूरत है।

अगर उत्तर गुजरात को देखें तो यहां पालनपुर, सिद्धपुर, उंझा, मेहसाणा, पाटन नाम के शहर और कस्बे हैं। उत्तर गुजरात के एक बड़े इलाके को  बनासकाठा के नाम से भी जाना जाता है। ये सभी इलाके मुख्यतः खेती और पशुपालन के रोज़गार पर निर्भर हैं वही उंझा खाने में इस्तेमाल होने वाले गरम मसालों के लिये जाना जाता है। शिक्षा की बात करें तो इन इलाकों में कोई बड़ी यूनिवर्सिटी नहीं है और आगे की पढ़ाई के लिए  विद्यार्थी अहमदाबाद या विद्यानगर शहर का रुख करते हैं।

अभी हाल ही में मेहसाणा के करीब मारूति कार का एक बहुत बड़ा कारखाना लग रहा है, इसके साथ ही कलोल, छतराल जैसे कई इलाकों में कई निजी फैक्टरियां और कारखाने हैं। मतलब ये कि विकास कुछ हिस्सों तक ही सीमित है। इन इलाकों में मुख्यतः हिंदू आबादी है जिनकी मुख्य भाषा गुजराती है। मुस्लिम आबादी की गांव से लेकर शहर तक एक सीमित आबादी है। यहां मुस्लिम समुदाय की मुख्य भाषा गुजराती के और हिंदी भी है। गुजरात के इसी उत्तर हिस्से में हिंदू धर्म का एक बड़ा धार्मिक स्थान श्री अंबा जी माता का मंदिर भी स्थिति है, चारों तरफ पहाड़ो से घिरा ये स्थान वास्तव में आदिवासी इलाके के तौर पर जाना जाता है। यहां भी गुजरात मॉडल का विकास दूर-दूर तक नज़र नही आता लेकिन प्राकृतिक सुंदरता मन को मोह लेती है।

गुजरात के पूर्वी क्षेत्र जिसकी सीमा मध्यप्रदेश से लगती है, यहां गोधरा, दाहोद मुख्य शहर है। गोधरा एक छोटा शहर है और यहां हिंदू और मुस्लिम आबादी एक ही अनुपात में हैं। गोधरा शहर के साथ इस पूरे क्षेत्र को पंचमहल के नाम से भी जाना जाता है, वैसे अब यहां कुछ फैक्टरियां और कारखाने शुरू हो रहे हैं, लेकिन मोदी जी का विकास, खासकर उस विकास से जिसे गुजरात मॉडल का नाम दिया जाता है वह अभी भी यहां पूरी तरह से नहीं पहुच पाया है। दूर दराज से आने के लिये यहां लोग मुख्यतः जीप , इको जैसी गाड़ियों का इस्तेमाल करते है, जहां गाड़ी के अनुपात से दुगनी सवारियों की मौजूदगी, इस बात का संकेत ज़रूर देती है कि ये क्षेत्र गुजरात का पिछड़ा हुआ क्षेत्र है।

अब गुजरात के उस क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना ज़रूरी है जिस से अमूमन गुजरात राज्य की पहचान होती है। शहर अहमदाबाद, मुख्य तौर पर एक व्यवसायी शहर होने के नाम से जाने जाने वाले इस शहर में कपड़ा मिल से दवाई बनाने की फैक्टरी तक हर तरह के व्यापारिक प्रतिष्ठान हैं।

शायद अहमदाबाद की मिट्टी में ही व्यापार की महक होगी जिसके कारण इस शहर का हर दूसरा नागरिक अपना व्यपार करने का दृढ़ संकल्प लेता है।

आपसी सूझ बूझ का सबसे बड़ा प्रतीक अहमदाबाद शहर से कुछ किलोमीटर दूर अमूल दूध उद्योग का मुख्य डेयरी है, जिसे एक सहकारी संस्थान चलाता है, जिसकी बुनियाद आम लोगों ने ही रखी थी। अहमदाबाद शहर में हिंदू आबादी ज़्यादा है लेकिन पुराने शहर में मुस्लिम आबादी का अपना अलग वर्चस्व है, भाषा गुजराती ही मुख्य है लेकिन एक मेट्रो शहर के तर्ज पर उभर रहे अहमदाबाद में हिंदी भी काफी ज़्यादा बोली जाती है। गुजरात यूनिवर्सिटी, निरमा यूनिवर्सिटी, IIM, गुजरात विद्यापीठ, जैसे कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान हैं यहां।

अगर 2000 की शुरुआत तक भी गुजरात के विकास पर एक नज़र डालें, तो यह प्रदेश बहुत विकसित था, बिजली, सड़क, शिक्षा, उद्योग, हर जगह ये प्रदेश शिखर पर था। वहीं इस प्रांत की सुरक्षा के अनुरूप एक तथ्य हमेशा से कहा जाता था कि यहां मध्य रात्रि में भी एक महिला अकेले सड़क पर, बिना किसी भय के चल सकती है। वास्तव में जिस विकास का ढोल मोदी जी, गुजरात मॉडल के नाम पर बजा रहे हैं वह विकास मोदी जी के आने से पहले भी यहां गुजरात में मौजूद था। 2001 से 2014 तक तकरीबन 13 साल के राज में मोदी जी अगर चाहते तो कुपोषण, दूर दराज के इलाकों में सरकारी स्कूल का गिरता स्तर, बेरोज़गारी, गरीबी को दूर करने का प्रयास पूरी ईमानदारी से कर सकते थे।

लेकिन आज ऐसा कोई भी काम कहीं भी गुजरात में दिखाई नही देता। अमीरी ओर गरीबी का फर्क आसमान ओर ज़मीन की तर्ज पर दिखाई दे रहा है। अहमदाबाद शहर का ही उदहारण दिया जा सकता है जहां एक इलाका विकास का प्रतीक है वहीं दूसरा इलाका गरीबी को दिखाने के लिये अपने आप में बहुत बड़ा उदाहरण है। गरीबी और अशिक्षा को हटाना इसलिये भी ज़रूरी है क्योंकि यही दो मुख्य कारण है जो साम्प्रदायिक भावना में बहकर दंगो को अंजाम देते हैं।

वास्तव में, गुजरात के उत्तर और मध्य भाग में, साम्प्रदायिक तनाव हमेशा बरकरार रहता है। यहां गांव, कस्बे, शहर हर जगह हिंदू और मुस्लिम आबादी दोनों अलग-अलग होती है और अमूमन हिंदू और मुस्लिम रिश्ता व्यवसाय तक ही सीमित रहता है। यहां मैंने व्यक्तिगत रूप से नहीं देखा कि किसी पारिवारिक समारोह में हिंदू और मुस्लिम परिवार दोनों के बीच समरसता हो। अगर होगा भी तो बहुत कम।

मोदी जी के 13 साल के गुजरात शासन में ये तनाव और बढ़ा है, और जहां साम्प्रदायिक तनाव हो वहां विकास का झंडा कैसे लहराया जा सकता है?

लेकिन आज एक आम गुजराती समझ रहा है की गुजरात जो पहले से विकसित था वह और विकसित हुआ है लेकिन जहां विकास नदारद था वहां आज भी जनता विकास को एक टकटकी नज़र से देख रही है। वास्तव में आज एक गुजराती नागरिक ये कहने से नहीं झिझक रहा कि गुजरात के विकास की आड़ में मोदी जी के खुद का विकास ज़रूर हुआ है। गुजरात की राजनीति को एक पायदान बनाकर, वह आज देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं, लेकिन 2014 में मोदी जी के अमूमन हर भाषण में गुजरात मॉडल का ज़िक्र जरूर होता था लेकिन एक जगह मोदी जी ने अपने 56 इंच के सीने का भी जिक्र किया था, अगर आप गुजरात मॉडल को 56 इंच के सीने से जोड़कर समझने की कोशिश करेंगे, तब आप समझ पाएंगे की इन सभी तथ्यों का इशारा किस ओर था विकास, सुरक्षा, सभी को समान अधिकार या कुछ और।

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