बचपन से पुरुषों के लिए मेरे अंदर जो सवाल हैं उसी की किताब है ‘खुरचन’

Posted by Annu Singh in Books, Hindi, My Story, Sexism And Patriarchy
October 23, 2017

जीवन में कुछ दृश्य, कुछ घटनाएं, इस तरह से हमारे मन-मस्तिष्क में बैठ जाते हैं कि भले ही आप उन्हें समझने, विश्लेषित करने, अभिव्यक्त करने में सक्षम ना हों पर वो आपके दिल दिमाग से जाते नहीं है। लेकिन वे घटनाएं आपके मन में कुछ भावनाएं उत्पन्न करते हैं’ हमेशा अभिव्यक्ति के मार्ग ढूंढते रहते हैं। कई बार वे चित्र के रूप में अभिव्यक्त होते हैं, कई बार कविता के रूप में तो कई बार कहानियों की शक्ल ले लेते हैं।

मेरी पुस्तक ‘खुरचन’ भी उन्हीं घटनाओं, दशाओं से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति का परिणाम है। यह एक कहानी संग्रह है, जिसमें उन्नीस छोटी–बड़ी कहानियां हैं। इन कहानियों के कथानक, इन कहानियों के पात्र का जीवन, उन्हीं अनुभवों की अभिव्यक्ति के परिणाम हैं जिनकी मैं चर्चा कर रही थी। इन कहानियो के पात्र, उनका देश-काल वही है जिन्हें हम अपने इर्द –गिर्द देखते हैं, जिनके साथ हम जीते हैं तथा इसी देश–काल का हम हिस्सा होते हैं।

इन कहानियों के ज़्यादातर पात्र पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों के हैं जिनकी भाषा भोजपुरी है। इसलिए कहानियों में पात्रों के मध्य होने वाले संवाद भोजपुरी में हैं, उनके लोक गीत, सुख के गीत, दुःख के गीत, सभी भोजपुरी में हैं।

‘खुरचन’ उस क्षेत्र की आंचलिकता को समेटने के साथ–साथ वहां के जीवन दर्शन को भी स्वयं में समेटे हुए है। ज़्यादातर कृषक परिवार हैं जो कृषि कार्य में होने के कारण प्रच्छन्न बेरोज़गारी के शिकार हैं। अभाव तथा आर्थिक संपन्नता किस प्रकार स्त्री- पुरुष के संबंधो को प्रभावित करते हैं उसे बयान करती यह पुस्तक स्त्रियों की मनःस्थिति को प्रमुखता से बयां करती है।

ये स्त्री पात्र कोई भी हो सकती है, एक अल्हड़ लड़की, एक विवाहित लड़की, एक उपेक्षित वृद्धा। कहानियों के पात्र एवं घटनाएं अपने देश और काल में व्याप्त सामंतवादी, जातिवादी, जड़तावादी सामाजिक परिस्थितियों एवं उसके जीवन दर्शन को आपके सामने रख देता है। ये परिस्थितियां किस तरह से भिन्न-भिन्न उम्र की स्त्रियों को प्रभावित करते हैं, ‘खुरचन’ उसी की अभिव्यक्ति है। कुछेक कहानियां अर्ध शहरी क्षेत्रों में रहने वाले निम्न मध्य-वर्गीय महिलाओं की मनोदशा को अभिव्यक्त करती हुई भी दिखाई देंगी।

कहानियों को पढ़ते हुए आपको कई बार यह महसूस होगा कि जिस परिदृश्यों को यह किताब हमारे सामने रख रही है उनमें नया क्या है? यह तो सदियों से है, पर उसी क्षण आपके मन में यह भी प्रश्न उठेगा कि सदियों पुरानी परिस्थियां जो समाज के एक वर्ग का जीवन त्रासद कर देती है आज भी उपस्थित क्यों है? अभी तक तो उन्हें समाप्त हो जाना चाहिए था? ये समस्याएं क्यों हैं? इनका समाधान क्या है? आदि आदि।

बचपन से बारह वर्ष की उम्र तक मैं अपने गांव में रही जो उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में, बिहार से बिलकुल सटे हुए ज़िले में पड़ता है। बचपन में मुझे एक बात महसूस की थी कि मेरे घर, मुहल्ले तथा पूरे गाँव में रहने वाले लोग, जो रिश्ते में मेरे भाई, बहन, चाचा, बाबा, बुआ, दादी, सहेली कुछ न कुछ लगते हैं उनमे समानता नहीं है। हर कोई कहीं न कहीं पर-पीड़क या आत्मपीड़क की भूमिका में दिखाई पड़ता है। किसी को अपना जीवन तथा दूसरो का भी जीवन अपने हिसाब से चलाने की पूरी स्वतंत्रता हासिल थी तो किसी को सांस लेने से अधिक कुछ भी अपने हिसाब से करने की इजाज़त नहीं थी। ये दृश्य मेरे मन में कई प्रश्न उठाते, जिनका उत्तर ढूंढ पाने की उम्र न थी। इन प्रश्नों को लेकर मैं अपने से बड़ों के पास जाती, जो प्रायः या तो मुझे डांट कर चुप करा देते या फिर ऐसा उत्तर देते जो मन में दस और नए प्रश्न खड़ा करता।

कुछ समझ नहीं आता कि क्यों मेरे गाँव और मुहल्ले में रहने वाली तमाम चाचियों, दादियों और बड़ी बहनों के पति उनसे होने वाली हर बात की शुरुआत गाली के साथ ही करते हैं?

क्यों ये महिलाएं कई-कई सालों तक अपनी माओं से मिलने नहीं जाती? क्यों जब मैं कोई शरारत कर के घर से बहार भागती और माँ मुझे पकड़ने को दौड़ती तो वो दालान तक जाकर वापस लौट आती? क्यों मेरे भाई दूर दूर तक क्रिकेट खेलने जाते जबकि मुझे घर की छत और द्वार पर ही खेलने की इजाज़त मिलती? क्यों जब कोई मुझे मारता तो बहुत बुरा लगता, लेकिन मेरी चाचियां अक्सर ही मार खाती पर चाचा उन्हें बुरे नहीं लगते? क्यों दादियों का हर कोई आते-जाते मज़ाक उडाता, उपेक्षा करता लेकिन दादा की हर कोई इज्ज़त करता और डरता? क्यों मेरी सहेली जो पिछले साल तक मेरे साथ ही खेलती थी, उसे इस साल से खेलने की इजाज़त नहीं मिलती, जबकि इस साल भी मेरे और उसके भाई बैट-बॉल खेलने निकल जाते? क्यों मामा जब घर आते तो माँ मुझे ही चाय बनाने को कहती, मेरे भाई को नहीं? खेलना बीच में छोड़कर जाना मुझे भी तो बुरा लगता था।

ये सब देखकर इतना तो समझ आता कि कुछ फर्क तो है जो मुझे, माँ को, चाची को, बहनों को, दादियों को इतना परेशान करता है, फिर भी यह सर्व स्वीकृत क्यों है? इतनी चुप्पी क्यों है? ये सब कुछ सही कैसे है? इसके विरोध में कोई कुछ बोलता क्यों नहीं है? ये उनसे लड़ती क्यों नहीं हैं, मुखर क्यों नही होती जो उन्हें इतना परेशान करते हैं, इतनी तकलीफ देते हैं!

ये प्रश्न मेरे बालमन के थे, जिनका कुछ-कुछ संतोषजनक जवाब मुझे विश्वविद्यालयी शिक्षा के दौरान मिलने लगा और अभी भी मिलना जारी है। सार्त्र के दर्शन के हिसाब ‘सत्ता'(स्वतंत्र निर्णय लेने में अक्षम) से ‘अस्तित्व’ (स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम) बनने का संघर्ष जारी है। मेरे भीतर भी, मेरे बाहर भी। ‘खुरचन’ बचपन की उन्हीं सवालों, घटनाओं और क्षोभ से उत्पन्न भावनाओं की उपज है, अभिव्यक्ति है, जिनके आप सब भी कहीं न कहीं दृष्टा रहे होंगे। आप सभी से अपेक्षा है कि इसे पढ़े और अपने अनुभव ज़रूर बांटे।

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