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हिंदी मीडियम स्टूडेंट्स के साथ LSR में क्यों होता है इतना भेदभाव

देश में बेहतरीन शिक्षा संस्थानों की जब भी लिस्ट बनती है तो शायद लेडी श्री राम कॉलेज(LSR) हर बार टॉप कॉलेजेस में शामिल होता है। इंफ्रास्ट्रक्चर, टीचर्स या फिर एल्युमनाई हर मामले में LSR  काफी आगे नज़र आता है। बाहर से देखने-सुनने पर सबकुछ काफी शानदार नज़र आता है लेकिन अंदर से सबकुछ वैसा नहीं है।

LSR में लगभग सभी क्लासेज़ अंग्रेज़ी मे होती हैं। कोर्स के ट्रांसक्रिप्ट (जिसमें कोर्स के सब्जेक्ट और मार्क्स का डिस्ट्रिब्यूशन लिखा होता है) पर भी कोर्स का माध्यम अंग्रेजी ही लिख दिया गया है। मैंने जब स्टूडेंट्स से बात की तो 5 में 4 ने बताया कि टीचर्स को पता है कि क्लास में हिंदी मीडियम स्टूडेंट भी हैं लेकिन उनकी ज़रूरतों को शायद ही कभी ध्यान में रखा जाता है।

थर्ड इयर हिंदी मीडियम की स्टूडेंट श्रेया बताती हैं “क्लास में बहुत ध्यान लगाने के बाद थोड़ा बहुत समझा आता है। पर अगर मैम सवाल पूछ लेती हैं तो कुछ नहीं बोल पाती मैं।”

हर अंडरग्रैजुएट स्टूडेंट्स को सिलेबस के हर टॉपिक के तीन से पांच रीडिंग्स (किसी किताब या अलग-अलग किताबों को मिलाकर तैयार किया गया ज़रूरी पाठ्यसामग्री) दिये जाते हैं। इसके साथ ही पूरे सिलेबस के लिए डिपार्टमेंट के द्वारा तैयार किए गए दो दस्तावेज़ भी स्टूडेंट्स को दिए जाते हैं। लेकिन हिंदी मीडियम स्टूडेंट्स को रेफरेंस के नाम पर मुश्किल से एक किताब मिलती है जिसमें सारे टॉपिक कवर भी नहीं हो पाते।

पॉलिटिकल साइंस थर्ड इयर की छात्रा दिया बताती हैं लाइब्रेरी में बड़ी मुश्किल से 2-3 किताब मिलती है। उसके अलावा हमें बैठकर इंग्लिश के टेकस्ट्स खुद ट्रांसलेट करने पड़ते हैं।

क्लास छोड़कर प्राइवेट हिंदी ट्यूशन लेना भी अच्छा विकल्प नहीं है, क्योंकि अटेंडेंस के नंबर मिलते हैं, और इग्ज़ाम देने के लिए एक मिनिमम अटेंडेंस का भी प्रावधान है। हर दिन पांच लेक्चर और एक ट्यूटोरियल क्लास होने के हिसाब से वो हफ्ते में 30 घंटे क्लास में बैठे होते हैं। इतने के बाद प्राइवेट ट्यूशन के लिए जाना या शायद सोचना भी सबके लिए प्रैक्टिकल नहीं है।

एक टीचर का कहना है-

कॉलेज में भाषा एक बड़ी समस्या है। अंग्रेज़ी किताबों और दस्तावेज़ों का ट्रांसलेशन ज़रूरी है, और एकबार ट्रांसलेशन करने के बाद उनका एक रिकॉर्ड भी रखना ज़रूरी है ताकि हर साल इसपर समय ना लगाया जाए। इंग्लिश टीचर होते हुए भी मुझे हिंदी की कॉपीज़ चेक करने के लिए दी गई हैं। ये एक गंभीर समस्या है जिसे दूर करने के लिए सही इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए।

किसी भी कोर्स में औसत ग्रेड प्वाइंट 7 है जबकि मैंने जितने भी हिंदी स्टूडेंट्स से बात की उनके ग्रेड 5 या उससे कम ही थे। उचित पाठ्यसामग्री ना मिल पाने के कारण इंटर्नल्स में भी हिंदी मीडियम स्टूडेंट्स के मार्क्स कम ही आ पाते हैं। यहां सनद रहे कि ये सारे स्टूडेंट्स अपने स्कूल में काफी अच्छे मार्क्स लाते थे।

मेनका बताती हैं, मेरा एडमिशन इंजिनियरिंग में हो गया था लेकिन जो सब्जेक्ट यहां पढ़ रही हूं उसके बारे में 10वी में पढ़ा था और तब से मुझे ये काफी अच्छा लगता है, इसलिए मैं इंजिनियरिंग छोड़कर यहां यह सब्जेक्ट पढ़ने आ गई।

लेकिन जबसे मेनका ने ये कोर्स शुरू किया है उसके मार्क्स भी काफी कम हो  गए हैं।

लेक्चर्स इंग्लिश में होने ज़रूरी हैं क्योंकि यहां अलग-अलग राज्यों से स्टूडेंट्स आते हैं और उनकी पकड़ हिंदी पर अच्छी हो ये ज़रूरी नहीं। लेकिन अगर इन स्टूडेंट्स को एडमिशन के वक्त ये बताया जाता है कि उनके इग्ज़ाम देने का माध्यम हिंदी हो सकता है तो उसकी तैयारी और पढ़ाई के लिए कॉलेज में उचित इंफ्रास्ट्रक्चर का भी इंतज़ाम करना चाहिए। इन स्टूडेंट्स को ध्यान में रखकर एक अकादमिक प्लान बनाया जाना चाहिए। हो सकता है शायद हर टीचर क्लास के अंत में 10 मिनट हिंदी में एक्सप्लेन करें तो कुछ फायदा हो।

फिलहाल अच्छी बात ये है कि LSR  की 2017-18 स्टूडेंट यूनियन ने इस मसले को सुलझाने की पहल की है। स्टूडेंट्स की समस्या सुलझाने के लिए एक ट्रांसलेशन कमिटी का गठन किया गया है। इस कमिटी का उद्देश्य व्हाट्सएप क्लास ग्रुप पर अपडेट्स और पाठ्यसामग्रियों को स्टूडेंट की भाषा में उनतक पहुंचाना होता है।

इस समस्या को सुलझाने का हर पहल काबिल-ए-तारीफ है। उम्मीद है कि कमिटी की गठन के जैसे हीं कॉलेज में भविष्य में और भी उपाय निकाले जाएंगे। हो सकता है इन छोटे छोटे प्रयासों को साथ लाकर हिंदी मीडियम स्टूडेंट्स की परेशानियों को कम किया जा सकेगा।


*नोट- निजता को ध्यान में रखते हुए सभी स्टूडेंट्स के नाम बदले गए हैं।

फोटो प्रतीकात्मक है,  क्रेडिट- Getty Images

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