फिल्म माचिस देखकर समझिए 1984 के पंजाब की आग को

एक माचिस का डिब्बा अपने आप में कितनी ही तीलियों की पनाहगार बनता है और हर तीली के साथ एक छोटा सा अंगार जुड़ा होता है जिसे थोड़ी सी भी चिंगारी मिल जाये तो आग लग जाती  है। इसी तर्ज पर 1984 के पंजाब के हालात बयान किये जा सकते है जहां पंजाब, एक अंगार की तरह है और पंजाबी नागरिक एक तीली की तरह, और बिगड़ते हालात आग का काम करते हैं। इस समय में पंजाब का बिखरता समाज जहां अशांति का माहौल था, कानून चरमरा गया था, एक तरफ पुलिस की वर्दी और दूसरी तरफ अपने रास्ते से भटक गये नौजवान, एक दूसरे पर गोलियां बरसा रहे थे, दोनों तरफ पंजाब ही लहू लुहान था। शिक्षा, सुरक्षा, रोज़गार जैसे सारे संसाधन खत्म किये जा रहे थे जिससे एक सुखद जीवन और समाज की रचना हो सकती है। इस टूट रहे समाज को अगर कोई शीर्षक दिया जा सकता है तो वह माचिस से बेहतर नहीं हो सकता।

पंजाब के इसी बिखरते समाज को, मशहूर फिल्मकार गुलज़ार ने अपनी फिल्म माचिस में पूरी ईमानदारी से दिखाया है। फिल्म में सवांद ओर कैमरावर्क बेहतरीन है, कमर्शियल सिनेमा से हटकर बनी ये फिल्म अपने गीत संगीत के लिये आज भी जानी जाती है। 1996 में आई ये फिल्म, शुरुआत से ही दर्शक को सोचने के लिये मजबूर करती है।

फिल्म का पहले दृश्य में कुछ पुलिसकर्मी जेल के कुएं से एक कैदी की लाश निकाल रहे हैं कुएं में बिखरा हुआ अंधेरा और निकाली जा रही लाश अपने आप में पंजाब के दिशाहीन समाज को बयान करती है। वहीं पुलिस के मुख्य अफसर का अपने जूनियर अफसर वोरा से दो बार पूछना की एम्बुलेंस को फोन कर दिया ? अपने आप में ऐसी कानून व्यवस्था को बयान करता है जहां खाखी को खाखी पर ही भरोसा नहीं है।

दूसरे दृश्य में यही अफसर अपने जूनियर वोरा को कहता है कि इंसानी जिस्म की, दर्द सहने की एक क्षमता होती है जिसके आगे इंसानी दिमाग मौत के डर से भी बेखौफ हो जाता है। यहां एक दर्शक समझ सकता है कि उस कैदी को पुलिस ने किस तरह टॉर्चर किया होगा जिसके कारण उसने खुदकुशी करने का इरादा किया।

फिल्म का अगला सीन फ्लैशबैक में ले जाता है। इसी क्रम में एक गीत दिखाया गया है ‘छोड़ आएं हम वो गलियां, इस फिल्म का ये मशहूर गीत तीन भागों में है। चार नौजवानो पर फिल्माया गया ये गाना अपने पहल और दूसर भाग में ज़िंदगी से भरपूर है। तीसरे भाग में ऑपेरशन ब्लू स्टार, इसके पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 का सिख कत्लेआम, को ज़िंदगी से भरपूर ये सभी नौजवान हथियार उठाने का कारण बता रहे हैं।

अगले दृश्य में फिल्म की कहानी शुरू होती है जहां दो पंजाबी नौजवान जसी ओर किरपाल, घर के आंगन में हॉकी खेल रहे हैं, इंग्लिश भी बोलते हैं, यानी कि पढ़े लिखे हैं। इतने में घर पर पुलिस दस्तक देती है जो किसी जिमी नाम के आरोपी को ढूंढ रही है और इत्तेफाक से जसी के कुत्ते का नाम जिमी है, इसी जानकारी के आधार पर पुलिस जसी को अपने साथ ले जाती है। 15 दिन के बाद भी जब जसी की कोई जानकारी नहीं मिलती तब किरपाल एक वकील को संपर्क करता है।

इस वार्तालाप से ये बताया गया है कि कानून और पुलिस में फर्क है, जहां आफ्सपा लगा हो वहां कानून को दरकिनार कर दिया जाता है।

कुछ दिन बाद, लड़खड़ाता जसी घर की गली में मिलता है, एक नौजवान को अपाहिज कर दिया जाता है जो चलने में असमर्थ है। यहां जसी की हालत देखकर पड़ोसी दो बहुत गंभीर डायलॉग कहता है ” पहले जैसे डाकू आते थे ने घोड़ो पर चढ़कर ओर हाथ में बंदूक लेकर, वैसे ही आज पुलिस और नेता आते हैं” और  ” आंतकवादी खेतो में पैदा नही होते हैं” जसी की तरफ इशारा करके कहते है “ऐसे पैदा होते है आतंकवादी ।” किरपाल से जसी की हालत देखी नहीं जाती और वह पुलिस से बदला लेने की ठान लेता है जिसका आगे परिचय सनातन से होता है जो पंजाब में सरकारी व्यवस्था के खिलाफ हथियार बंद लड़ाई का एक मज़बूत और अहम हिस्सा है।

फिल्म कई मोड़ लेती है और इसी बीच सनातन ओर किरपाल के बीच, पंजाब के हालात पर सवांद दिखाये गए हैं जो इस फिल्म का सबसे मज़बूत हिस्सा है। सनातन, आज़ादी पर सवाल उठाता है कि एक आदमी पर आज़ादी लाने का सहरा नही बांधा जा सकता। वही सनातन, 1947 ओर 1984 में दो बार अपने परिवार के मारे जाने का दर्द बयान करता है और आगे जो सबसे महत्वपूर्ण है सनातन कहता है शिक्षा, सुरक्षा, रोज़गार, दवाईयां, ऐसी कौन सी चीज़ है जो एक आम इंसान को मुहैया है ? कुछ भी नहीं, ये सवाल सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, अगर एक दर्शक हमारी विफल हो रही व्यवस्था को समझ सकता है तो वह ये ज़रूर समझता कि ऑपरेशन ब्लूस्टार ओर उसके बाद पंजाब के हालात क्यों खराब है। आखिर में सनातन कहता है कि वह ये लड़ाई किसी अपने आनी वाली पीढ़ियों के लिए नहीं कर रहा बल्की खुद के लिये लड़ रहा है।

फिल्म को ज़रूरत से ज़्यादा लंबा कर दिया गया है और कहानीकार ने बेवजह फ़िल्म को एक प्रेम कहानी का जामा पहनाने की कोशिश की है, यही वजह है की फिल्म ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुई। कहानी का अंत जसी ओर किरपाल द्वारा पुलिस की ज़्यादतियों से परेशान होकर, आत्महत्या से होता है और इसी तरह फिल्म असंवेदनशील हो चुके हमारे समाज को भी दिखाती है।

80 ओर 90 के दशक के पंजाब की हालत, जसी ओर किरपाल की मौत से भी ज़्यादा भयावह थी, जिसका सबूत है जसवंत सिंह खालड़ा, मानव अधिकार कार्यकर्ता, जिन्होंने सिर्फ अमृतसर, तरनतारन ओर मजीठिया के शवगृह से सैकड़ों की तादाद में लावारिश लाशों की जानकारी की थी जिनको पुलिस ने लावारिश कहकर जला दिया था। फ़िल्म में सनातन एक डायलॉग कहता है कि पुलिस किसी को भी आंतकवादी कहकर मार सकती है और अपनी-अपनी तरक्की का रास्ता खोज सकती है।

पता नहीं पंजाब के काले दौर में कितने एनकाउंटर हुएं, कितनो को पुलिस ने लावारिश कह कर मार दिया, लेकिन इसी अंतराल में कितने पुलिस वालों को कितनी तरक्की दी गई और इसकी वजह क्या थी, इसकी जानकारी कभी भी सार्वजनिक नहीं की गई।

एक फिल्म समाज का आइना ही होती है और इसकी कामयाबी और नाकामयाबी समाज की मानसिकता को भी दर्शाती है। इसी श्रेणी में फिल्म अब तक छप्पन का रेफरेंस देना भी ज़रूरी है। इस फिल्म में पुलिस की ज़्यादतियों का सबसे भयंकर हथियार, एनकाउंटर को बेहताशा दिखाया गया है। फिल्म के एक सीन मुख्य किरदार साधु, अपने अफसर के कहने पर दो अंजान लोगों को गोली मारने से भी नहीं हिचकिचाता।लेकिन ये फिल्म बॉक्स आफिस पर लगभग कामयाब रही है। इस फिल्म की कामयाबी एक बात सोचने पर तो मजबूर करती ही है कि क्या आज हमारे समाज में पुलिस द्वारा हो रहे एनकाउंटर को स्वीकृति मिल गयी है ? अगर हां, तो हमें फिल्म अब तक छप्पन के साथ साथ फिल्म माचिस को भी एक बार ज़रूर देखनी चाहिये।

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