वो कौन लोग थे जो 1990 में ज़बरदस्ती मेरा स्कूल बंद करवा देते थे

आज चेहरे के बालों ने सफेद रंग को अपना लिया है, ज़िंदगी अपनी ही रफ्तार से चलती जा रही है। शायद आजकल मैंने ज़्यादा बोलना और ठहाके मार के हंसना भी बंद कर दिया है, लेकिन कभी-कभी जब मन खुशियों की बुलंदियों को छू रहा होता है तब मैं घड़ी की सुई पीछे घुमाने की कोशिश करता हूं और अपने बचपन में जाकर ही रुकता हूं खास कर मेरा स्कूल बहुत प्यारा था। अहमदाबाद के जनतानगर का मेरा प्रेरणा हिंदी हाई स्कूल। चाहे क्लास में यादव सर ने हमें मुर्गा बना कर ही बाहर खड़ा कर दिया हो लेकिन फिर भी हंसी रुकती नहीं थी और हम दोस्त वहां भी सर से मार ही खाते थे। लेकिन हमारा रिकॉर्ड था कि कभी भी घर से स्कूल के सिलसिले में कोई भी शिकायत आई थी और ना ही स्कूल से कोई शिकायत घर पर भेजी गई थी। लेकिन एक बात जो मुझे अब चुभती है वो यह कि 1990 में हमारा स्कूल जबरन बंद करवाया जाता था, आखिर वो कौन थे जो स्कूल बंद करवाते थे ?

मैं हिंदी माध्यम में ही पढ़ा हूं और मेरे दोस्त सारे या तो उत्तर भारत से थे या फिर किसी हिंदी भाषित राज्य से, हम स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चों की तरह ही हमेशा एक दूसरे को अपने पहले नाम जैसे नरेन्द्र, प्रकाश, दिलीप, बाबाराम, प्रदीप, हरबंश से बुलाते थे कभी भी कोशिश नहीं की नाम के पीछे लगे कुमार, यादव, झा, शर्मा, सिंह को जानने की। मेरी यादों में मेरा बचपन, मेरे दोस्त और मेरा स्कूल बहुत खूबसूरती से सज़ा हुआ है।

लेकिन सन 1990 के सितंबर में एक छात्र के आग लगाकर खुदकुशी की कोशिश करने की दुखद खबर आई। उस समय 12 साल के बच्चे के लिये अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल था कि जिंदगी, मौत और खुदकुशी क्या होती है?

लेकिन दूसरे दिन सुबह-सुबह हम फिर उसी उत्साह से अपना दिन शुरू कर रहे थे और मोदी मैडम इंग्लिश के विषय में हमें पढ़ा रही थी कि अचानक से यादव सर आए और हमें कहा जाओ बच्चों आज तुम्हारी छुट्टी कर दी गई है।

अब स्कूल में अचानक से छुट्टी मिलना मतलब मानो करोड़ों की लौटरी लग गई हो। हम सब बाहर आए और बजाय ये जानने के कि स्कूल क्यों बंद हुआ है, हम सब ने प्लान किया कि अब से आधे घंटे बाद क्रिकेट के मैदान पर मिलते हैं और वहीं टीम बनाकर खेलेंगे। वह दिन तो हंसी खुशी बीत गया लेकिन दूसरे दिन फिर यादव सर गुजराती के पीरियड में आए और कहा कि स्कूल की छुट्टी हो गयी है। लेकिन उस दिन हम उत्साहित नहीं थे क्रिकेट खेलने के लिये। ये सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा, कभी भी किसी भी पीरियड में स्कूल के बंद होने की जानकारी मिल जाया करती थी।

लेकिन अभिभावकों के दबाव के चलते, थोड़े दिनों बाद से ही स्कूल अपने समय अनुसार चलना शुरू हो गया था। लेकिन एक दिन अचानक, यादव सर ने हमें स्कूल के बाहर इक्ट्ठा कर लिया खासकर कक्षा 9वीं और 10वीं के विधार्थियों को। स्कूल का मेन गेट बंद कर दिया गया था और उस तरफ कुछ युवा खड़े थें शायद उनकी उम्र 18-22 साल की रही होगी।

उसी भीड़ में से एक युवा मेन गेट पर चढ़कर खड़ा होकर कहने लगा “आज से स्कूल बंद, जब तक हम नहीं कहते कोई भी तुम में से स्कूल नहीं आयेगा। अगर, कोई भी आया और स्कूल अपने समय से खोला गया तो हम बाहर खड़े होकर पत्थर मारेंगे जो तुम में से किसी को भी लग सकता है, समझ लो आज से स्कूल नहीं आना है।”

वह तो इतना कह कर चले गए, यादव सर भी नज़रे झुका कर खड़े थे और हम भी किसी से कोई सवाल नहीं कर रहे थे। फरमान हो चुका था बस अब इसे मानना था। स्कूल से हम सब ने अपना अपना बैग उठाया और चल दिये अपने अपने घर को। परिवार से बात करने के बाद भी हमें यही कहा गया कि कल से स्कूल कुछ दिनों के लिये नहीं जाना है।

अभी भी मैं ये सवाल नहीं कर रहा था कि क्यों स्कूल बंद हुआ है ? यही तो बचपन का आनंद है कि उस वक्त ज़िंदगी गहरे सवाल नहीं पूछा करती। लेकिन मेरे उस समय का भी और आज का भी बस यही सवाल है कि वह कौन थे जो स्कूल बंद करवाने आए थे? अब जब उन्हें खोजने की कोशिश करता हु तो अक्सर नाकामयाबी ही मिलती है लेकिन उनके नाम कुछ हमारी तरह ही रहे होंगे और आज वह भी सफेद बालों से ढक गए होंगे।

शायद वो लोग मंडल कमीशन के विरोध में खड़े हुए थे इसी सिलसिले में कई जाने भी गई थी, तोड़-फोड़ भी हुई थी लेकिन मेरे जीवन के कई खूबसूरत दिन जो मेरे भविष्य की नींव रख रहे थे वह यूंही व्यर्थ व्यतीत हो गए और उन दिनों का महत्व और भी बढ़ जाता है खासकर अब जब उन सहपाठियों का पता भी नहीं है कि वो जीवन के किस कोने में कहा होंगे। इस व्यथा में उन दिनों स्कूल के जबरन बंद होने का गम तो सदा ही बना रहेगा।


फोटो प्रतीकात्मक है

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