किन्नर समुदाय की तो कद्र ही नहीं! कोई उन्हें साड़ी उठाने को कहता है तो कोई स्तन दिखाने को

Posted by Prince Mukherjee in Cake, Hindi, LGBT+
October 6, 2017

यह साल 2014 की बात है जब दशहरे के बाद लंबी कतार में खड़े होकर किसी तरह तत्काल कोटे के तहत स्लीपर क्लास में एक टिकट मिला। ट्रेन थी पूर्वा एक्सप्रेस जो हावड़ा से चलकर नई दिल्ली जाती है। स्लीपर कोच में भीड़ इतनी कि मानो जनरल बोगी हो। इसी दौरान कुछ टीटी बाबू दिखाई दिए जिनके आते ही वेटिंग वाले तमाम पैसेन्जर्स ने जुगाड़ के तहत सीट पाने के लिए उन्हें घेर लिया। टीटी और यात्रियों के बीच जुगलबंदी चल ही रही थी कि किन्नर समुदाय का एक जत्था वहां पहुंच गया।

यात्रियों से दस-दस रूपये की वसूली करने के बाद उनके समूह में से एक किन्नर गेट के पास खड़ी हो गई। इसके बाद जो दृष्य मैंने और वहां मौजूद यात्रियों ने देखा वो वाकई में हैरान कर देने वाला था। टीटी बाबुओं के समूह में से एक टीटी ने उस किन्नर यानि कि ट्रांस महिला से प्रश्न किया कि क्या तुम्हारे स्तन ऑरिजनल होते हैं? जवाब में उस ट्रांस महिला ने दोनों हाथों से ताल ठोकते हुए अपना ब्लाउज़ उतारकर अपने स्तन दिखा दिए। ये मामला करीब 10 मिनट तक चला और वहां मौजूद टीटी बाबुओं ने किन्नर समुदाय को लेकर अपनी शंकाओं को मिटाते हुए कौतुहल को शांत किया।

मेरे लिए ये सब इसलिए भी एक अजीब सा दृष्य था क्योंकि मैं शायद यह सब पहली बार देख रहा था। यह सुनने के बाद भले ही टीटी पर आपको गुस्सा आए, लेकिन मुझे लगता है कि इसमें दोष केवल टीटी का नहीं है, क्योंकि इस बारे में बचपन से ही उसे शिक्षा नहीं दी गई है। थर्ड जेंडर के बारे में ना तो स्कूल, कॉलेज, समाज और ना ही मां-बाप और दोस्तों के ज़रिए ज़्यादा कुछ जानकारियां मिल पाती हैं।

हमारा उनसे इतना ही वास्ता रहा है कि रेड लाइट पर हमारी गाड़ी रुकती है और वो ताली बजाकर हमसे पैसे मांगते हैं। कभी-कभी तो हम उन्हें पैसे दे देते हैं लेकिन ज़्यादातर अपनी गाड़ियों के शीशे बंद कर लेते हैं। कभी मां-बाप बच्चों को डराने के लिए कहा करते हैं कि पढ़ाई करो वरना किन्नर पकड़ कर ले जाएंगे। इसके अलावा वो ना कहीं वर्किंग स्पेस में हैं और ना ही स्कूल या कॉलेजों में दिखते हैं। राजनीति में भी उनकी भागीदारी ना के बराबर ही होती है। हिन्दी फिल्मों में रुपहले पर्दे पर भी कुछ-एक फ़िल्में छोड़ दें तो किसी किन्नर व्यक्ति के किरदार को घटिया तरीके से ही परोसा जाता है।

ट्रेन में सफर करने के दौरान ये सब बातें आम हो चुकी हैं जब कई पुरूष, किन्नर समुदाय के लोगों को दस रूपये देकर उन्हें साड़ी उठाने या स्तन दिखाने जैसी नाजायज़ मांग करते हैं। इनमे से बहुत से पुरूष वो भी हैं जो फेसबुक पर किन्नर समुदाय के लिए कभी संवेदना व्यक्त करते दिखाई पड़ते हैं, तो कभी उन्हें मुख्यधारा में जोड़ने की बात पर विरोध प्रकट करते हैं।

देश के अलग-अलग इलाकों में पुरुषों का एक बड़ा तबका पैसे देकर किन्नर समुदाय के लोगों के साथ यौन संपर्क भी कायम करता है। ये पुरुष भी उसी सभ्य समाज से आते हैं जहां किन्नर समुदाय के लिए कोई जगह नहीं होती।

ऐसे में सिर्फ टीटी को ही कसूरवार ठहराना न्याय नहीं है। इस समस्या का समाधान क्या है ये आप लोग भी सोचिए। मुझे लगता है कि इस विषय पर जितना अधिक हम बात करेंगे उतना ही इसका समाधान निकलेगा।

जैसा कि एक ज़माने में महिलाओं के अधिकारों को लेकर कोई बात नहीं होती थी, महिलाओं के मामले सुलझते ही नहीं थे। मगर अब हालात बदले हैं, महिलाओं के मुद्दों को लेकर लोगों ने बात करना शुरू किया है। क्या पता आने वाले वक्त में किन्नर समुदाय को लेकर भी समाज की सोच में बदलाव आए, लेकिन उसके लिए पहल तो हमें करनी ही होगी।


प्रिंस  Youth Ki Awaaz Hindi सितंबर-अक्टूबर, 2017 ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा हैं।

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