satta ke bezuban khel!

Posted by Nitika Pant
October 6, 2017

Self-Published

एक कार्यशाला स्थल का दृष्य…..

मेज़बान और मेहमान का फासला एक टेबल का मात्र खेल है. ऐसे में वह गीत याद आता है, ‘which side are you on?’ और यह कहानी शुरू होती है.

‘साहब’ अंदर आते हैं, तो सब खड़े हो जाते हैं, मजबूरन मुझे भी अपनी कुर्सी का मोह त्यागना पड़ता है!

ख़ैर टेबल के पीछे कौन और आगे की पंक्तियों में कौन बैठेगा इसकी जद्दोदाहत शुरू होती है. कौन कहाँ बैठेगा, किस पोज़ में बैठेगा और कौन rosette लगाएगा? कैंडल जलाने में कौन मद्दत करेगा? दीप जला और और पारी शरू हो गयी, कौन बोलेगा, कितनी देर बोलेगा की होड़ लग गयी. कौन किस तरह बैठा, किस तरह अपने ‘जूनियर’ को इशारे से बुलाया, इन सब नज़ारों में अब खोने लगी थी मैं. लाइट  जलाने के लिए कौन स्विच दबाएगा? आँखों से ‘साहब’ ने बहुत इशारे किये, लेकिन अफ़सोस इशारे पहचानने में वक़्त लग गया और दुसरे साहब को मजबूरन ‘उसको’ आवाज़ लगानी पड़ी! तब तक एंकर साहिबा ने ‘स्विच’ on कर दिया! इशारा हुआ तो ‘वो’, काजू, चिप्प्स, बिस्कुट, काजू की बर्फी और चाय ले आया. बस फिर क्या था, दस्तक्खान बिछ चुका था, तो इंतज़ार किस बात का था, ‘साहब लोग’ शुरू हो गये!

चाय के बाद कुछ लोगों को टेबल के ‘उस’ तरफ बुलाया गया, क्यूंकि पद पहचानने में दिक्कत हो रही थी, सब एक से नज़र आ रहे थे साहब को, और यह उन्हें मंज़ूर नहीं था! हाथ के इशारे से, आँख के इशारे से, कुर्सी में बैठने के और बोलने के अंदाज़ से सत्ता पुरजोर तरीके से अपना परचम लहरा रही थी. एक साहब के उठने से पहले ही उनको दिए गये गुलदस्ते को ‘उसे’ दे दिया, शायद अपनी गाडी में रखने के लिए! खुद उठाना तो शान में गुस्ताखी होती न!

कार्यशाला के खत्म होते होते उस तरफ और इस तरफ की खाई गहरा चुकी थी, कभी न पटने वाली, कभी न समझ में आने वाली. आखिर में फिर कुर्सी से मुझे भी उठना ही पड़ा!

यह था सत्ता का बेज़ुबान खेल!!

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