गुजरात चुनाव को समझने के लिए ज़रूरी है सौराष्ट्र को जानना

नरेंद्र मोदी, 2014 की हर आम और खास सभा में, गुजरात मॉडल का ज़िक्र करते थे, यहां गुजरात से इनका मतलब प्रांत के विकास से था, जिसका अक्सर ये श्रेय लेते हैं, अपने भाषणों में चुटकी लेने के लिये मशहूर, नरेंद्र मोदी की गुजरात मॉडल की दलील वास्तव में काम भी कर रही थी और 2014 के लोकसभा चुनाव में मो भाजपा को इतनी बड़ी जीत में गुजरात के विकास मॉडल के गुणगान की भी अहम भूमिका रही  है। लेकिन जो व्यक्ति गुजरात और गुजरात के समाज को समझता है वह ये ज़रूर अस्वीकार कर देगा की गुजरात का विकास किसी एक व्यक्ति की देन है।

गुजरात के विकास को समझने के लिये पहले गुजरात को समझने की बहुत ज़रूरत है। गुजरात को मुख्यतः तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है उत्तर-मध्य गुजरात, दक्षिण गुजरात और समुद्र के तट से सटा हुआ पूर्वी गुजरात जिसे काठियावाड़ और सौराष्ट्र  (saurashtra) के नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो गुजरात राज्य की पहचान अक्सर इसके मुख्य व्यवसायी शहर अहमदाबाद से होती है लेकिन वास्तव में गुजरात प्रदेश और इसके विकास में सबसे ज़्यादा किसी हिस्से का योगदान है तो वह सौराष्ट्र ही है, इसलिये यंहा सबसे पहले सौराष्ट्र को समझने की ज़रूरत है।

अहमदाबाद से सड़क मार्ग से निकलते ही, करीबन 50-100 किलोमीटर के बाद काठियावाड़ का प्रदेश शुरू हो जाता है, राजकोट, जामनगर, जूनागढ़, द्वारका, भावनगर, सोमनाथ, वेरावल, पोरबंदर ये सौराष्ट्र ओर काठियावाड़ के मुख्य शहर है, यहां ज़मीन भी कहीं उपजाऊ है और कहीं, सूखी नरम। गोंडल से गुज़रकर, सड़क मार्ग से अगर आप जूनागढ़ और फिर सोमनाथ जाएंगे, तो सड़क मार्ग के दोनों तरफ खेती की खड़ी फसल, ज़मीन की उपजाऊ क्षमता को अपने आप बयान करती है। यहां चावल की खेती से लेकर अमूमन हर आम फसल होती है। यहां तलाला के केसर के आम भी मशहूर हैं वही विश्वविख्यात गिर भी यहीं है।

वही काठियावाड़ या सौराष्ट्र के दूसरे हिस्से में राजकोट, जामनगर, द्वारका इत्यादि प्रदेश हैं, यहां पानी बहुत बड़ी समस्या है। बरसात के पानी को संग्रह करके रखने की तकनीक यहां बेमिसाल है, लेकिन अब नर्मदा का पानी यहां पहुंच जाने से शायद पानी की समस्या काफी हद तक सुलझ गयी है। यहां ज़मीन भी कपास की खेती तक सीमित उपजाऊ है। उद्योग में यहां रिलायंस ओर एस्सार ग्रुप की विश्वविख्यात तेल रिफाइनरी है, खाध फथर्टिलाइज़र से लेकर टाटा के नमक की फैक्ट्री भी इसी हिस्से में आती है। व्यापारिक हुनर के कारण काठियावाड़ या सौराष्ट्र को लोगों की पकड़ पूरे गुजरात के उद्योग पर है। सूरत के मशहूर हीरा उधोग में भी सौराष्ट्र के लोगों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, वहीं गुजरात के इस क्षेत्र से लोग, सेना के साथ जुड़ना भी एक मान सम्मान की बात समझते हैं ये यहां लिखना इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि अमूमन बाकी गुजरात के समाज में सेना के साथ जुड़ने की ज़्यादा प्रबल इच्छा नहीं पाई जाती।

सौराष्ट्र में ही समुद्र के किनारे बसे शहर पोरबंदर का भी समावेश होता है जहां हमारे राष्ट्रपिता श्री मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म हुआ था।

यहां हिंदू आस्था के प्रतीक दो वरिष्ठ स्थान हैं द्वारका ओर बेट द्वारका, जिनका तालुक भगवान कृष्ण से है। बेट द्वारका, ये समुद्र के अंदर एक छोटा सा टापू है, जो चारों दिशा से समुद्र से ही घिरा हुआ है, और यहां पहुंचने के लिये नाव का सहारा लेना पड़ता है। बहुत महत्वपूर्ण तथ्य ये है की अमूमन सभी नाविक मुसलमान होते हैं जो हिंदू यात्रियों को समुद्र पार करवाते हैं।

काठियावाड़ या सौराष्ट्र को समझने के लिये, यहां की काठियावाड़ी गुजराती भाषा को समझना बहुत ज़रूरी है, जहां अदब सत्कार है वहीं मिठास भी है, यहां फिर चाहे हिंदू हो या मुसलमान, सभी समुदाय के लोग गुजराती काठियावाड़ी भाषा ही बोलते है वहीं यहां अमूमन हर गांव में एक या इससे अधिक घर मुसलमानों के भी मिल जाते है जो खेती से लेकर हर तरह के रोज़गार में अपनी मौजूदगी का एहसास भी करवाते हैं, शायद एक भाषा को बोला जाना, समाज में आपसी भाईचारे का प्रतीक है, यही वजह रही होगी कि जब साल 2002 में गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे, तब ये पूरा क्षेत्र शांति का प्रतीक बना हुआ था, यहां शायद ही कोई गंभीर घटना घटी हो जिसने समाज के आपसी भाईचारे को चोट पहुंचाई हो।

इसी तरह इस क्षेत्र से ऊपर स्थिति गुजरात का कच्छ का क्षेत्र, अमूमन इसे कच्छ भुज कहा जाता है। कच्छ गुजरात के उन दो ज़िलों में आता है जहां मुसलमान आबादी बहुसंख्यक है। और ज़मीनी तौर पर यह एक रेतीला इलाका है और ज़मीन उपजाऊ नहीं है लेकिन गुजरात के काठियावाड़ की ही तरह, यहां के लोग वैचारिक तौर पर बहुत विकसीत है और यही वजह है कि इस क्षेत्र का नागरिक अपनी  व्यपारिक सूझ-बूझ के लिये पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। अगर पूरे गुजरात के मुख्य उद्योगपतियोंं की सूची तैयार की जाये तो उनमे सबसे ज़्यादा मोहरी व्यपारी गुजरात के इसी काठियावाड़ और कच्छ इलाके से मिलेंगे, फिर व्यपार करने की जगह अहमदाबाद या मुंबई ही क्यों ना हो।

मैं  एक साल जामनगर भी रहा हूं, जहां गुजरात के इस अमीर समाज से मुलाकात हुई थी, यहां बिल्कुल अंजान पड़ोसी, कुछ ही दिनों में इतने मिलनसार ओर मददगार हो गए थे जिन्होंने इस अंजान शहर को भी एक नवविवाहित दंपति के लिये जज़्बाती भावना से जुड़ने का एक प्रतीक बना दिया था, यही वजह है जब 2002 के दंगों को गुजरात दंगे कहा जाता है तो अमूमन मैं इस शब्दावली से सहमत नहीं होता क्योंकि सौराष्ट्र या काठियावाड़ या कच्छ जो करीबन आधा गुजरात का इलाका है वहां स्थिति बहुत सामान्य बनी हुई थी।

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