हम इस देश के कॉमन पीपल, हमारा काम बस लाइक, कॉमेंट और शेयर करना

Posted by Bagesh Kumar in Health and Life, Hindi, Society
October 18, 2017

शुरुआत कहां से की जाये यह हमेशा से मेरी सबसे बड़ी दिक्कत रही है, इसलिए बात को सीधे सबके सामने रख देता हूं। सबसे पहली बात यह है कि आज सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में हमे अपनी बात कहने और दूसरों की बात नहीं सुनने की बहुत ही अच्छी सुविधा है। चूंकी, हम इतने ज़्यादा मशरूफ हैं अपने ख्यालों में कि सामने वाला क्या कह रहा है इससे कुछ मतलब ही नहीं। अगर बात अपने मतलब की है तो फेसबुक पर लाइक, कमेंट मिल जाता है और ज़्यादा लोगों के मतलब की है तो एक-दो शेयर भी, बस इसमें अपना काम खत्म। कोई सवाल नहीं, कोई तर्क नहीं, बस यही काम रह गया है लाइक, कमेंट और शेयर। आज एक तरह के पोस्ट को; कल दूसरे। रोज़ नए मुद्दे; रोज़ लाइक, कमेंट और शेयर। कई बार मैं खुद भी यही करता हूं इसीलिए ‘हम’ शब्द पर ज़ोर दे रहा हूं।

कुछ दिनों से उन सभी समाचारों के बारे में सोच रहा हूं जिन्हें लाइक, कमेंट और शेयर किया था और शायद भूल भी गया था। शुरुआत कहां से करूं वापस सोचने लगा। खैर, बात करते हैं उन समस्याओं के बारे में जो शायद इस देश की सबसे गंभीर समस्या है जैसे स्वास्थ्य, भोजन, सफाई और राजनीतिक रूप में रोटी, कपड़ा और मकान।

रोटी के आभाव में या आधार के आभाव में झारखण्ड में एक मासूम बच्ची की जान गई इसपर नेताओं और सरकारी अधिकारीयों का आधिकारिक बयान आना बाकी है। रोज़ जितनी खबरें मौत की आती है शायद उतनी कोई और खबर नहीं आती। मीडिया भी एक तरह की खबरें दिखा के उन्हें कब्रों में छोड़ आती है।

थोड़ा और पीछे जाएं तो शायद आपको ओडिशा और असम की वो ख़बरें याद आए जिसमें एम्बुलेंस के आभाव में लाश को कंधे और साइकिल पर उठा के ले जाते दिखाया गया था। सबसे दुखद, एक साथ कई नवजात बच्चों की मौत सिर्फ एक अस्पताल में वो भी ऑक्सीजन की कमी से। फिर शायद आपको यह भी याद आए कि किस तरह से सफाई कर्मचारियों की मौत गटर में उतरने से हुई। यह ख़बरें हमे अन्दर तक झकझोर देती हैं और हम दुहराते हैं लाइक, कमेंट और शेयर। यह जिसके मतलब की खबर है वो पढ़ते हैं और लाइक, कमेंट और शेयर करते हैं और जिन्हें नहीं है वो आगे बढ़ जाते हैं या स्किप या स्क्रोल कर देते हैं। बहरहाल, खबरें हमारी स्क्रीन पर होती हैं तो एक नज़र तो जाती ही है।

आज़ाद हुए 70 साल हो गए। चाँद और मंगल पे कदम रख दिए और आज भी जान जाती है तो भूख से। जान जाती है या जान ले ली जाती है इसपर सवाल उठाने की ज़रूरत है।

क्या यह ज़रूरी नहीं है कि पहले आप जनवितरण प्रणाली यानी राशन में चल रहे खामियों को दूर करते, बजाय आधार को ज़रूरी करने के? क्या यह ज़रूरी नहीं है कि जो 22 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं उनकी जान भुखमरी से नe जाए? क्या मजबूरी है जो गरीब के हिस्से का अनाज बिना आधार के नहीं दिया जा सकता? यह ढर्रा, जो लोगों को उनके हक से वंचित करता है, आज़ाद भारत में और कब तक चलेगा?

इतनी सस्ती जान है लोगों की कि कोई अच्छे कपड़े पहन ले या मूंछें रख ले तो भी लोग जान से मार देते हैं तो किसी को कुछ खाने के शक में मार दिया जाता है। एक तरफ जिनका काम जनता की जान बचाने का है वो खाने के लिए ‘आधार(कार्ड)’ मांगते है दूसरी तरफ उनके गुर्गे ‘निराधार’ लोगों की जान लेते हैं और फिर सरकारी नौकरी भी पाते हैं। और हमारा काम है लाइक, कमेंट और शेयर करना।

पर इससे ज़्यादा हम कर भी क्या सकते है ? जो लोग लिख रहे थे या तो उन्हें खरीद लिया गया या जान से मार दिया गया, जो किसी तरह लिख रहे हैं उनकी जान को खतरा है। और, हमारा काम है लाइक, कमेंट और शेयर करना। सबसे अहम बात यह है कि लाइक, कमेंट और शेयर करने के बाद शायद हम अपने दिमाग में फॉरगेट का बटन भी दबा देते हैं जिससे हमारी जिम्मेदारियां ख़त्म हो जाती हैं।

हमें हमेशा यह याद रखनी चाहिए कि हम बुनियादी समस्याओं को बिना सुलझाये हुए यूं ही लाइक, कमेंट और शेयर करते रहें तो इससे कुछ नहीं बदलने वाला। रोज़-रोज़ एक के बाद एक नए नियम और कानून बनाये जा रहे हैं लेकिन इससे स्वास्थ्य, भोजन और रोज़गार की समस्या पर क्या असर पड़ा ? समाज में जिनकी जान सबसे सस्ती है, वे हाशिये पे खड़ा दलित-आदिवासी और मुसलमान है या उनके लिए आवाज़ उठाने वाले लोग। उनके लिए ‘विकास’ का मतलब एक वक़्त का खाना है। उनके लिए विकास “डिजिटल’ नहीं, बल्कि ‘डिग्निटी’ है। शायद एक दिन सबके पास उनका आधार नंबर होगा लेकिन तब तक भूख कितनी मौतों का आधार बनेगा इसका कोई आंकड़ा हमारे पास नहीं होगा क्योंकि हम लाइक, कमेंट और शेयर करने के साथ फॉरगेट भी करते हैं, हालांकि इसका बटन हमारे दिमाग में है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।