मुसलमानों पर हो रही हिंसा के खिलाफ हिंदू समाज क्यों मौन है

Posted by priyank samagra in Hindi, Society, Staff Picks
October 18, 2017

कुछ सवाल सभ्य विचारशीलता या राजनीतिक उपयुक्तता की मर्यादा के बाहर जाकर ही पूछे जा सकते हैं। ऐसा ही सवाल है – क्या हिंदुस्तान में मुसलमानों के खिलाफ हो रही हिंसा (व्यक्तिगत एवं सामाजिक), के लिए पूरा का पूरा हिंदू समाज उत्तरदायी है? इस तरह के सवाल करने पर आजकल यह अनिवार्य  हो गया है कि सवाल करने की मंशा स्पष्ट कर दी जाए। यह प्रश्न पूर्ण रूप से वैचारिक है और मात्र प्रश्न है, किसी भी प्रकार से इसे आरोप की श्रेणी देना अनुचित होगा।

इस प्रश्न का सामान्य उत्तर जो प्रायः दिया जाता है वो है, कुछ संगठनों या व्यक्तियों द्वारा किये जा रहे कृत्य के लिए एक पूरे समाज को कैसे उत्तरदायी माना जा सकता है? यह उत्तर तभी तक तार्किक लगता है जब राज्य-सत्ता के अपने संस्थान और सत्ताधारी वर्ग, दो समुदायों के विवाद में या दो भिन्न समुदायों के व्यक्तियों के विवाद में किसी एक समुदाय के प्रति अनुराग न रखते हों, राज्य-सत्ता व्यक्तियों को व्यक्तियों के संवैधानिक स्वरूप में स्वीकार करती हो। यदि राज्य-सत्ता का उपयोग एक राष्ट्र-राज्य के निर्माण में भी किया जा रहा हो तो किन्हीं समुदायों की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं अन्य भागीदारियों और भूमिकाओं को क्षति न पहुंचाई जा रही हो।

इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि हिंदुस्तान में पंचायतों से लेकर संसद तक के चुनावों में व्यक्तियों की भूमिका और भागीदारी को जान-बूझकर और व्यवस्थित ढंग से खत्म किया गया है और उन्हें धार्मिक और जातीय पहचानों के आधार पर वर्गिकृत कर एक छद्म सामूहिकता प्रदान की गई है।

इसे राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक कहे जाने वाले संगठनों ने चतुराई एवं परिष्कृत ढंग से किया है। इस विषय में किसी विशेष संगठन को दोषी कहना या मानना भूल होगी क्यूंकि हिंदुस्तान के सभी राजनीतिक दल किसी न किसी रूप में सत्ता का पर्याप्त उपभोग कर चुके हैं और यही उनकी कार्यनीति रही है। अतः ऐसा कहना कि कुछ व्यक्ति या कुछ संगठन द्वारा किये गए कृत्य पूरे समाज का उत्तरदायित्व नहीं तो यह अनुचित होगा। क्यूंकि ये व्यक्ति या संगठन, किसी न किसी रूप में सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े हुए हैं, और उसी समाज के नाम पर हिंसा फैला रहे हैं। प्रश्न है कि जो समाज स्वयं को इनकी हिंसा के लिए उत्तरदायी नहीं मानता, क्या वो इनके खिलाफ पूरी ताकत से खड़ा होता है? क्या वह समाज यह कहता है कि हिन्दुओं के नाम पर मुसलमानों को मरने वाले हिंदू नहीं हो सकते? एक या दो घटनाओं को नज़रंदाज़ किया जा सकता है। सतत हो रही घटनाओं और बयानबाज़ी को नहीं, यदि नज़रअंदाज़ किया गया तो उसके अहितकारी परिणाम होंगें ही।

अपनी गौरवशाली सभ्यता और संस्कारों की रक्षा के लिए हिंदू समाज को इस हिंसा का विरोध करना ही होगा। और इसके प्रतिउत्तर में एक आध्यात्मिक समाज की रचना के लिए नेतृत्व प्रदान करना होगा।

विकास के लोभ में सहिष्णुता का विनिमय नहीं किया जा सकता। विकास की अनिवार्यता लोगों की समृद्धि के लिए है, सामाजिक वैमनस्यता बढ़ाकर और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर अस्थिरता पैदा कर हथियार खरीदने के लिए नहीं। ऐसे विकास का क्या नैतिक आधार हो सकता है जो समाज को कई धडों में बांट दे, हिंसा को बढ़ावा दे, और, बच्चे कुपोषित रहें, अशिक्षित रहें, अस्वस्थ रहें? ऐसे विकास का भी कोई नैतिक आधार नहीं हो सकता जो कुछ संपन्न और ताकतवर परिवारों के हितों की भर पूर्ती करे। क्या ऐसा विकास हिंदू संभ्यता के अनुरूप है? यदि नहीं तो फिर हिंदू क्यों मौन हैं?

एक उदाहरण रोहिंग्या मुसलमानों का भी है। कुछ हज़ार शरणार्थियों को हिंदुस्तान जैसा बड़ा मुल्क शरण देने से इनकार कर देता है। पहले साधुओं, आश्रितों, अतिथियों को भोजन कराकर स्वयं भोजन करने के संस्कार वाला हिंदू समाज क्यों मौन है? हिंदुस्तान अपनी सभ्यता के विचारों और संस्कारों को खो कर कैसे हिंदू राष्ट्र बन सकता है? क्या संस्कारों और सामाजिक सरोकारों को तक पर रख कर किसी विवादित स्थान पर पत्थरों का मंदिर बना लेने से हिंदू राष्ट्र की स्थापना हो जाएगी? ऐसे बहुत से प्रश्न हैं जो हिंदुस्तान को पुण्यभूमी मानने वालों को उद्वेलित करने चाहिए और उन्हें इनके उत्तरों के लिए हिंदू समाज में (अहिंसक) विमर्श को प्रारंभ करना चाहिए।

इन परिस्थितियों में ‘मौन’ विनिमय का साधन नहीं बनना चाहिए।

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