आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग यानि शूद्रों के खिलाफ धार्मिक प्रपंच

Posted by Surendra Ambedkar in Caste, Hindi, Society
October 8, 2017

भारतीय समाज ही नहीं बल्कि समस्त विश्व मे मनुष्य को सामाजिक प्राणी स्वीकारा गया है, आर्थिक प्राणी नहीं। यानि मनुष्य की पहली पहचान उसकी सामाजिक हैसियत और स्तर माना जाता है, जिसका आधार है सामाजिक स्थिति। समाज का ढांचा अक्सर धर्म और उसकी रीति रिवाज़ों पर टिका होता है। यानि धर्म के पैरामीटर पर तौलकर ही सामाजिक हैसियत मापी जाती है। यानि मनुष्य के जीवन को प्रभावित करने वाले सशक्त तत्व हैं धर्म, सामाजिक स्तर और सम्पत्ति।

इनमें धर्म सर्वोच्च सत्ता है जिसके आधार पर सामाजिक स्तर और धन सम्पत्ति खुद बखुद चलकर आते हैं। यही कारण रहा कि धर्म को ठगी का, लूट का साधन बनाए रखा है चंद स्वघोषित धर्म के ठेकेदारों ने।

इन्हीं के पाखंडों की वजह से यहां का समाज सम्पत्ति के बजाय धर्म को ज़्यादा महत्व देता रहा है। आपने आज भी देश के पूंजीपतियों को मन्दिर में घण्टा बजाते देखा होगा, या फिर बाबाओं के पैरों में लोटते हुए भी। मन्दिर में करोड़ों का मुकुट, धन संपदा चढ़ावे में देना, या बाबाओं को चेक, नकद और ज़मीनें दान करना यह दिखाता है कि धर्म न केवल सर्वोच्च सत्ता है, बल्कि यह पूंजी का साधन भी है। हर धार्मिक अनुष्ठान, रीति रिवाज़, व्रत त्योहार, कर्मकांड को हिंदू समाज मे धर्म की तथाकथित ठेकेदार जाति द्वारा पेशा बना लेना भी इसका उदाहरण है। इससे सिद्ध होता है कि धर्म, सामाजिक हैसियत और धन प्राप्ति का साधन भी है।

हमारे दैनिक जीवन के कार्यों के लिए हम अपने धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक प्रभाव की मदद लेते हैं। लेकिन इनमें भी सर्वोच्चता धर्म की ही रहती है। लेकिन इसी धर्म ने शूद्र समाज को जातीय सज़ा लिख डाली, बिना किसी गुनाह के। तो ऐसे में क्या धर्म सभी के लिए एक समान व्यवहार रखता है ?
नही , बिल्कुल भी नही!

क्योंकि धर्म टिका है श्रुति, स्मृति, पुराण, वेद और आरण्यक आदि पर। स्मृतियों में एक पुस्तक है -मनुस्मृति। और इसमें हर मामले में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को विशेषाधिकार लिखा गया है ,जबकि शूद्र को न शिक्षा का हक,न शक्ति का और न ही सम्पत्ति का हक दिया गया। वह इस दुनिया में सिर्फ उपरोक्त तीनों की सेवा के लिए ही अपना जीवन खर्च करेगा ।

जिस समाज का मूल ढांचा इस तरह की विषमता, अन्याय और ठगी से निर्मित किया गया हो, क्या शूद्रों को उनका हक सही से मिल सकेगा?

क्या उनके पास मौजूद धन उन्हें धार्मिक सिरमौर बना सकेगा ? क्या सामाजिक हैसियत में कोई शूद्र, धार्मिक महत्व प्राप्त कर ब्राह्मण बन पायेगा ? अगर आर्थिक स्थिति ही कमज़ोरी और ताकत का आधार है तो मन्दिर में काबिज़ स्वघोषित धर्म के ठेकेदार यह क्यों नही लिखवाते कि “शूद्रों का नही, गरीबों का प्रवेश निषेध है।” क्यों धर्म की सत्ता का शंकराचार्य आज भी वीवीआईपी ज़ेड प्लस सुरक्षा का आनन्द भोग रहा है ? 56 से ज्यादा धर्म के ठेकेदार इस सुविधा को लेकर आम जनता के टैक्स के पैसे को क्यों बर्बाद कर रहे हैं ?क्यों लोग घर के आभूषण बेच बेचकर भी तीर्थों , मंदिरों में जाना चाहते हैं ? क्यों हमारे राजनीतिक रहनुमा अपने हिस्से की ग्रांट को सबसे ज़्यादा मंदिरों में उड़ा रहे हैं ?

क्योंकि यहां हर चीज़ का आधार धर्म है। सदियों पहले इसी धर्म के आधार पर समाज के कमेरे वर्ग को शूद्र घोषित करके उनसे मानवीय हक भी छीन लिए। ऐसा किसी ने आर्थिक आधार पर नहीं किया बल्कि जन्म से जाति का निर्धारण करके धार्मिक मोहर लगा दी थी। बाबा साहब जानते थे कि समाज ने जो हक शूद्रों से छीने, वे राष्ट्र के ज़रिये वापस दिए जा सकते हैं। यही कारण रहा कि अन्यायपूर्ण धर्मग्रन्थों को दरकिनार कर के राष्ट्रीय स्तर पर एकता के लिए संविधान बनाया गया जिसमें संवैधानिक उपचारों के माध्यम से पिछले ज़ख्मों को भरने का प्रयास किया गया, लेकिन सनातन ठगों ने पुरानी आदत के कारण रोना शुरू कर दिया। आज शूद्रों के पास मेहनत से कमाया धन वैभव पाखण्डियों की आंख की किरकिरी बना हुआ है।

यही कारण है सनातन ठग संविधान से प्राप्त आरक्षण की मरहमपट्टी को छिनने पर उतारु हैं। ये सरासर नीचता, निकृष्टता और अधमता नही तो क्या है ??
गरीब होना और नीच होना दो अलग अलग स्थितियां हैं। गरीब से अमीर बना जा सकता है मगर शूद्र से ब्राह्मण नहीं। तो सुन लो आरक्षण खत्म करने के पझधरों ! हमें जो ज़ख्म धर्म , समाज और जातीय व्यवस्था ने दिए हैं , वो हर किस्म की गरीबी से दर्दनाक, शर्मनाक और खतरनाक हैं ।

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